* हिंदी के प्रति अरुचि खतरनाक-
आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
Education Reform : अखबार टाइम्स आफ इंडिया में प्रकाशित समाचार के अनुसार मध्य प्रदेश में 50000 अभियांत्रिकी विद्यार्थियों में से केवल 281 ने हिंदी माध्यम का चुनाव किया है। स्मरणीय है कि पूरे भारत में मध्य प्रदेश एकमात्र प्रदेश है जहाँ अभियांत्रिकी और चिकित्सा / आयुर्विज्ञान की पढ़ाई हिंदी माध्यम से भी करने की सुविधा है। विद्यार्थियों की संख्या बहुत कम होने के कारण यह सुविधा बंद किए जाने का खतरा है। जरूरी है कि इंस्टिट्यूशन आफ इंजीनियर्स, इंडियन जिओ टेक्निकल कांग्रेस, प्रैक्टिसिंग इंजीनियर एसोसिएशन, इंजीनियर्स फोरम, वेल्युर्स संगठन, इंडियन अर्थक्वेक कांग्रेस जैसी संस्थाएँ हिंदी के माध्यम से अभियांत्रिकी शिक्षा को प्रोत्साहित करें।
हिंदी आम लोगों की भाषा
यह जमीनी हकीकत है कि ग्रामीण कृषक, श्रमिक तथा आदिवासी परिवारों के बच्चे अंग्रेजी भाषा को समझ और बोल नहीं पाते। उनके लिए तकनीकी शिक्षा के दरवाजे बंद रहे आते हैं। आज भी इंजीनियरिंग और मेडिकल क्षेत्र में आबादी के अनुपात में इन वर्गों का प्रतिनिधित्व नगण्य है।
अंग्रेजी के प्रति अंध मोह
अत्यंत दुखद है कि इंजीनियरिंग तथा मेडिकल व्यवसायों से संबंधित संस्थानों में अंग्रेजी के प्रति अंध मोह है। इस कारण यह संस्थाएँ हिंदी भाषा को व्यवहार में लाने अथवा हिंदी भाषा में शिक्षक को प्रोत्साहित नहीं करती हैं। देखा जा सकता है कि इन संस्थानों में दैनिक कार्यकलाप में हिंदी का प्रयोग किए जाने के बाद भी बैनरों, आमंत्रण पत्रों, कार्यक्रम संचालन तथा व्याख्यान आदि में अधिक से अधिक अंग्रेजी का प्रयोग किया जाता है।
हिंदी के प्रति उदासीनता और विरोध का आलम यहाँ तक है कि नगर में बंगालियों की प्रमुख संस्था सिद्धिबाला बोस लाइब्रेरी एसोसिएशन के आमंत्रण पत्र तथा स्मारिका आदि में अंग्रेजी को सर्वाधिक तथा उसके बाद बांग्ला को स्थान दिया जाता है जबकि हिंदी का प्रयोग नहीं किया जाता है। यह राष्ट्र का दुर्भाग्य है कि राष्ट्रीय भाषा के प्रति ऐसा परायापन व उपेक्षा का भाव व्याप्त है।
हिंदी में तकनीकी शिक्षा जरूरी
समय की माँग है कि लगभग 40 वर्ष के लंबे संघर्ष के बाद प्रदेश में तकनीकी शिक्षा हिंदी में आरंभ किए जाने के प्रति समर्थन और व्यवहार में अधिकतम विद्यार्थियों द्वारा हिंदी चयन का वातावरण तैयार किया जाए।
हिंदी की रोजगार परकता
राष्ट्र भाषा हिंदी के विरोध का एक कारण यह बताया जाता है कि हिंदी माध्यम से तकनीकी शिक्षा लेने पर रोजगार विकास तथा उन्नति के अवसर नहीं होते। इस भ्रामक धारणा का खंडन तकनीकी प्रतिष्ठानों तथा संस्थानों की व्यावसायिक गतिविधियों से अनुमानित किया जा सकता है। एक डॉक्टर अपने मरीजों को इलाज देते समय उनसे बातचीत हिंदी में करता है, उनकी बीमारी को हिंदी में तकलीफ सुनकर अनुमानित करता है किंतु उसका इलाज अंग्रेजी में लिखता है जिसे मरीज समझ ही नहीं पाता। ऐसे अनेक प्रकरण हुए हैं जब अंग्रेजी में लिखे गए दवाई के परचों पर मेडिकल स्टोर के कर्मचारियों ने गलत दवाइयाँ दी तथा अनेक बार मरीज ने दवाइययों का नाम न पढ़ पाने के कारण गलत दवाइयाँ खाईं और उन्हें इसके दुष्परिणाम भोगना पड़े।
विधि तथा न्याय के क्षेत्र में वकील मुवक्किल से प्रकरण की पूरी जानकारी हिंदी में लेता है लेकिन न्यायालय में जिरह करते समय दलील अंग्रेजी में देने की कोशिश करता है। इस कारण मुवक्किल समझ ही नहीं पाता कि वह जो बात न्यायाधीश के ध्यान में लाना चाहता है वह कही भी गई या नहीं? इसी तरह न्यायाधीश द्वारा दिया गया निर्णय भी मुवक्किल वकील समझ ही नहीं पाता तो उसका पालन किस तरह करे?
अभियांत्रिकी के क्षेत्र में सरकारी तथा गैर सरकारी दोनों प्रकार की नौकरियों में रोजमर्रा के काम में हिंदी का ही प्रयोग किया जाता है। भ्रामक धारणा यह है कि रोजगार अंग्रेजी भाषा के माध्यम से मिला। एक अभियंता निजी काम करे या सरकारी वह संबंधित दफ्तरों में बाबूओं, चपरासियों से तथा कार्य क्षेत्र में ठेकेदारों, मिस्रियों, बढ़इयों, लोहारों, पलंबरों तथा अन्य तकनीकी कर्मियों से बातचीत केवल और केवल हिंदी में ही करता है। अतः वे सब तथा स्वयं अभियंता भी अपना पेट हिंदी भाषा के माध्यम से ही भरता है। इसलिए यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि हिंदी भाषी तथा अर्ध हिंदीभाषी क्षेत्रों (मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली आदि में व्यवसाय रोजगार तथा उद्योग की भाषा हिंदी ही है, अंग्रेजी नहीं।
मानसिक दासता
दुर्भाग्य है कि भारत में मानसिक दासता स्वतंत्रता के लगभग 80 वर्ष होने पर भी दूर नहीं हुई है। विदेशी आकाओं की भाषा अंग्रेजी आज भी अंग्रेजी प्रेमियों को मालिक होने का एहसास कराती है, जबकि हिंदी बोलने पर लोगों को गुलामी की अनुभूति होती है।
अंग्रेजी राज्य में शिक्षा नीति का निर्माण करनेवाले भविष्य दर्शी लार्ड मैकाले ने अपने आलोचकों को उत्तर देते समय यह भविष्यवाणी कर दी थी कि अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा के कारण एक दिन सभी ब्रिटिश पराधीनता भोग रहे देश में एक ऐसी पीढ़ी का जन्म हो जाएगा जो अपने देश की श्रेष्ठ मूल्यों को हीन और अंग्रेजों द्वारा थोपे गए मूल्यों को श्रेष्ठ समझेंगे। दुर्भाग्य से भारत में वर्तमान समय में ऐसी ही पीढ़ी का वर्चस्व है। प्रकृति का नियम है कि हर परिस्थिति एक चक्रीय क्रम के अनुसार बढ़ती-घटती है। भले ही आज अंग्रेजी लोभी अथवा अंग्रेजी के प्रति मोहग्रस्त लोगों का वर्चस्व हो लेकिन अब समय आ चुका है जब क्रमशः भारतीय भाषाओं का उत्थान होना है और अंग्रेजी के प्रति अंधमोह से ग्रस्त यह पीढ़ी तथा वातावरण क्रमशः विनष्ट होगा। यह शुभ कार्य जितनी जल्दी हो उतना ही अधिक अच्छा होगा।
मातृभाषा में समझना सरल
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार किसी भी विषय की जानकारी मानव मस्तिष्क अपनी मातृभाषा में सर्वाधिक सरलता व सहजता से समझ सकता है तथा सर्वाधिक समय तक स्मरण रख सकता है जबकि अन्य भाषाओं में दी गई जानकारी समझने, संग्रहित करने और याद रखने में कठिनाई अधिक होती है। इस मनोवैज्ञानिक सत्य के आधार पर भी हिंदी भाषा में तकनीकी और गैर तकनीकी सभी विषयों का शिक्षण ही एकमात्र विकल्प बचता है।
उन्नत देशों में शिक्षा माध्यम मातृभाषा
संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने एक अध्ययन के बाद दिए गए निष्कर्ष में कहा है कि विश्व में सर्वाधिक पिछड़े देश वे हैं जहाँ उच्च और तकनीकी शिक्षा का माध्यम मातृभाषाएँ न होकर कोई विदेशी भाषा है। ऐसे अधिकांश देश कभी ना कभी अंग्रेजों के गुलाम रहे हैं, जिनमें से एक भारत भी है। इसके सर्वथा विपरीत विश्व के सर्वोन्नत देश वे हैं जहाँ उच्च-तकनीकी शिक्षा का माध्यम उन देशों की मातृभाषाएँ हैं। इनमें रूस जहाँ रूसी में, चीन जहाँ मंडारिन में, जापान जहाँ जापानी में, जर्मन जहाँ जर्मनी में, ऑस्ट्रेलिया जहाँ ऑस्ट्रेलियन में उच्च व तकनीकी शिक्षा दी जाती है। इस रिपोर्ट के आधार पर भी
हिंदी ही उच्च व तकनीकी शिक्षा का माध्यम हो सकती है।
भाषा से संस्कार
भाषा संस्कार की वाहिका होती है। देश में दिन-ब-दिन बढ़ते हुए अंग्रेजी भाषी अधकचरा शिक्षा संस्थानों के अनुपात में अपराधिक गतिविधियों की हो रही वृद्धि सहज ही देखी जा सकती है।
हिंदी से सुसंस्कार
हिंदी भारत की मूल भाषा है जिसका जन्म और विकास भारत में ही हुआ है हमारी सभी पर्वकथाएँ, लोकगीत, लोक कथाएँ आदि हिंदी में ही हैं। इस कारण हिंदी हमारे पारंपरिक संस्कारों और सांस्कृतिक मूल्य को धारण करती है जबकि अंग्रेजी विदेशी भाषा होने के कारण उन देशों की सभ्यता सांस्कृतिक मूल्यों तथा परंपराओं को संप्रेषित करती है। हिंदी में शिशु निर्मलता बच्चा आबोधता, किशोर उत्सुकता, तरुण उत्साह, युवा परिवर्तन, प्रौढ़ अनुभव संपन्न तथा वृद्ध संतोष का प्रतीक है। अंग्रेजी में वयस्क या एडल्ट होने का अर्थ एडल्ट्री करना है। यह एडल्ट्री ही दुराचार की जननी है। हर बच्चा चाहता है कि वह जल्दी से जल्दी बड़ा या वयस्क हो। भारत शिशु बड़ा होने के लिए संयम तथा अनुशासन की सीढ़ियाँ चलता है जबकि अंग्रेजी भाषिक शिशु चिल्ड्रन से एडल्ट होने के लिए एडल्ट्री की राह पकड़ता है यह सामाजिक-भाषिक सत्य पाश्चात्य सरकारों के लिए सर दर्द का कारण बन गया है। उन देशों में शालेय शिक्षा के स्तर पर ही बच्चों में यौन आचरण के प्रति रुचि बढ़ती हुई देखी जा सकती है जिसका परिणाम सर्वाधिक यौन अपराधों तथा हिंसक वृत्ति के रूप में में सहज दृष्टव्य है। भारत को सामाजिक हिंसा तथा यौन अपराधों से बचने के लिए अंग्रेजी भाषा के प्रति अंध मोह से मुक्त होकर भारतीय भाषाओं में सामान्य उच्च तथा तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था करनी ही होगी अन्य कोई उपाय नहीं है।
भारत में कस्बाई तथा ग्रामीण क्षेत्रों में महानगरों की तुलना में अपेक्षाकृत कम यौन अपराध तथा हिंसा होने का एक कारण अंग्रेजी भाषा का कम तथा अधिक प्रभाव होना भी है।
तकनीकी किताबों की भाषा
विद्यार्थियों द्वारा तकनीकी शिक्षा के लिए हिंदी भाषा न चुनने का बड़ा कारण तकनीकी पुस्तकों में उपयोग की जा रही भाषा का अव्यावहारिक, अति संस्कृतनिष्ठ तथा कठिन होना है। विधिक किताबों में भी ऐसी भाषा के प्रयोग ने उन्हें अव्यावहारिक बना दिया है।
तकनीकी विषयों की भाषा साहित्यिक या संस्कृत निष्ठ नहीं, सटीक-सार्थक और व्यावहारिक होना जरूरी है।
बोल-चाल की भाषा में रोटी और गेंद दोनों को ‘गोल’ कहा जा सकता है पर विज्ञान में रोटी वृत्ताकारी व गेंद गोलाकारी है। जन सामान्य ‘रेल’ आ रही है, कहता है जबकि रेल का अर्थ ‘पटरी’ होता है। ‘ट्रेन’ आती है जिसके लिए ‘रेलगाड़ी’ शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए। साहित्यिक पुस्तक में दिल में महबूब रह सकता है, मेडिकल की किताब में नहीं, वहाँ दिल खून प्रवाहित करनेवाला पंप है। साहित्य में सुंदरी का बदन या कमल, हिरनी या मछली जैसे हो सकते हैं आयुर्विज्ञान में नहीं।
मानक शब्द निर्धारण
तकनीकी किताबों में अलग-अलग शब्दों का उपयोग किया जाना भ्रम पैदा करता है। ‘कन्सन्ट्रेटेड’ के लिए गाढ़ा व सांद्र, ‘डाइल्यूटेड’ के लिए हल्का, पतला व तनु शब्दों का प्रयोग भ्रम पैदा करता है। कोई एक शब्द मानक हो और उसी का प्रयोग किया जाए तो भ्रम न होगा।
लोक प्रचलित शब्द उपयोगी
भाषिक शुद्धता की आड़ में अव्यावहारिक शब्दों को ठूँसना तकनीकी किताबों को अनुपयोगी बना देता है। ‘स्टील बार’ को लौह शलाका नहीं लोहे की सरिया या छड़ कहना होगा। बस, एंजिन, मोटर, रेडियो, कम्प्यूटर, प्लग, स्विच, टी.वी., ए.सी., कार, ट्रक, बस, नर्स, रेलवे, गैस, डॉक्टर, कलेक्टर, पेंट, डिस्टेंपर, बल्ब, ट्यूब लाइट आदि प्रचलित शब्द ज्यों के त्यों उपयोग करने में कोई हानि नहीं है, उनके स्थान पर अप्रचलित कठिन शब्द न ठूँसे जाएँ। ब्रिक के स्थान पर ईंट, सैंड के स्थान पर रेत (सिकता नहीं), साइल – मिट्टी (मृदा नहीं), सिल्ट – गर्द, वायर – तार, ऐरोप्लेन – हवाई वायुयान, शिप – जलयान, मोबाइल – चलभाष, ब्रिज – पुल (सेतु नहीं), आदि का प्रयोग उपयुक्त है।
कुछ शब्दों का रूपांतरण जन सामान्य खुद ही कर लेता है। हास्पिटल – अस्पताल, बैंगलो – बंगला, लैंटर्न – लालटेन, केरोसीन – मिट्टी का तेल, बॉटेल – बोतल , बाइसिकल – साइकिल जैसे शब्दों को मान्यता दी जानी चाहिए।
साथ यह कि हर तकनीकी विधा का साहित्य उसमें प्रचलित और सर्वमान्य तकनीकी शब्दों को यथावत उपयोग करते हुए लिखा अथवा अनुवादित किया जाए। ऐसा करने से भारत की विविध हिंदीतर भाषाओं में शिक्षित अभियंता, डॉक्टर आपस में बिना कठिनाई विमर्श कर सकेंगे। देश के एक प्रांत में स्वभाषा में पढ़ें युवा अन्य भागों में नौकरी या व्यवसाय कर सकेंगे। हर प्रदेश अलग-अलग तकनीकी शब्दावली बनाएगा तो ऐसा नहीं हो सकेगा।
अभियंताओं/डाक्टरों की संस्थाओं को तकनीकी शिक्षा भारतीय भाषाओं के माध्यम से दिलवाने के लिए पूरे मन से सक्रिय होना चाहिए। आज जब कई अभियांत्रिकी महाविद्यालय बंद होने की कगार पर हैं तब हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में तकनीकी शिक्षा, अंग्रेजी में कमजोर मेधावी छात्रों को आमंत्रित कर उन्हें नया जीवन दिया जा सकता है। आइए, हम हिंदी में तकनीकी किताबें लिखकर अपनी आगामी पीढ़ी का भविष्य सँवारे अन्यथा समय हमें क्षमा नहीं करेगा। राष्ट्रकवि दिनकर के अनुसार-
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा
उनका भी अपराध।
समय की अदालत में अपराधी होने की बजाय हम अपना कर्तव्य निभाएँ और हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को उच्च तकनीकी शिक्षा का माध्यम बनाकर भावी पीढ़ी का भविष्य उज्जवल करें।