व्यंग्य : जीजा, फूफा और नेता

Niranjan Srivastava

satire : जीजा एक खास किस्म का दोपाया प्राणी होता है, जो हिंदी भाषी प्रदेशों में बहुतायत पाया जाता है। वह देश के अन्य भागों में पाया जाता है लेकिन दूसरे नाम से जाना जाता है। मनुष्य सामाजिक प्राणी होने के अलावा एक विवाहशील प्राणी भी है। विवाह के बाद ही वह आदमी से जीजा बन जाता है। इसका का एक कारण तो यह मालूम पड़ता है कि तमाम ग्रन्थों में स्त्रियों की प्रशंसा ही प्रशंसा की गई है। मनु के अनुसार जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहॉं देवता रमण करते हैं। ‘शतपथ ब्राह्मण’ के अनुसार पुरुष बिना पत्नी के अधूरा रहता है। सुदर्शन नामक राजा के पुत्रों को ट्यूशन पढ़ने वाले पंडित विष्णु शर्मा बड़े नीतिज्ञ थे। उनका कहना है कि गृह शब्द जो है गृहिणी से बनता है। वेदों के अनुसार स्त्री ही घर है। इसलिये यह ‘घरवाली’ भी कही जाती है। अंग्रेजी में एक कहावत है प्रत्येक नवयुवक को एक अदद पत्नी रखनी चाहिए और यदि वह अपनी ही हो, तो और भी अच्छा-‘नो लाइफ विदआउट वाइफ।’ इन्हीं सब कारणों से मनुष्य नामक जीवधारी गदहपच्चीसी पार करते ही वैवाहिकता को प्राप्त होता है। जो लोग वैवाहिकता को प्राप्त होकर घरवाली का त्याग करते हैं, वे तथागत हो जाते हैं या प्रधानमंत्री बनते हैं।

ईश्वर की असीम अनुकम्पा से नर के वैवाहिकता को प्राप्त होते ही एक नारी पत्नीत्व को प्राप्त होती है और वह नरपुंगव उसका पति और उसकी छोटी बहनों और भाइयों का जीजा बन जाता है। जीजा बनते ही वह जेब में फरमाइश की लंबी फेहरिस्त लिए घूमते रहता है कि उसे यह चाहिए, वह चाहिये, उसका ऐसे सत्कार होना चाहिए, उसका वैसे सत्कार होना चाहिये। दो-चार साल तक तो उसकी फरमाइश पूरी होती है। फिर धीरे-धीरे वह बेआबरू होने लगता है और घर से लेकर दफ्तर तक उसकी औकात दो कौड़ी की हो जाती है। आज की पीढ़ी दो कौड़ी शायद नहीं समझ पाये। ऐसा करते हैं कि कौड़ी के बदले एक रुपया कर देते हैं, जिसका सत्यनारायण भगवान की कथा में गौरी-गणेश पर या आरती में चढ़ाने के अलावा अब कोई इस्तेमाल नहीं है। वह एकाध रुपये की इज्जत ससुराल से ही खींच पाता है, वह भी बतौर फिरौती। वरना ससुराल वालों का बस चले तो वे जीजा के साथ भी वही सलूक करें, जो आम तौर पर चुनाव के मौसम में वोट मांगते नेता के साथ किया जाता है। मैं इस श्लोक में विश्वास नहीं करता कि-
      सदा वक्र: सदा क्रूर:, सदा पूजमपेक्षते।
      कन्याराशि स्थितो नित्यं, जमाता दशमो ग्रह:।।

      जैसे-जैसे वह पुराना होता जाता है भारतीय मुद्रा की तफह उसका अवमूल्यन होता जाता है। उसकी स्थिति वैसे ही हो जाती जैसे संसद सदस्यता या विधायकी समाप्त हुई नेता की। चुनाव आते ही नेताओं के हालत पुराने पड़ चुके जीजाओं जैसी हो जाती है। न जाने क्या-क्या मांग रहे हैं, पर ससुरालवालों की तरह जनता ध्यान नहीं दे रही है। आप सोचते होंगे इससे उनकी बेइज्जती और खराब होती है। पर आप गलत हैं। वह जीजा और नेता ही क्या जो बेइज्जती से घबड़ा जाय। जीजा और नेता समान रूप से नेता थेथर होते हैं, बिल्कुल हथलपक। हाथ लग गया तो ठीक वरना बेइज्जत हुए तो देह झाड़ के चल दिये। हमारे देश में, आम आदमी की इज्जत सिर्फ बतौर नव निर्मित जीजा ही हो पाती है। जीजा जब बूढ़ा होता है, तो फूफा बन जाता है। पूछ बिल्कुल नहीं, लेकिन बेमतलब ऐंठा रहता है। फूफा और कबाड़ में कोई मौलिक अंतर नहीं होता। नेता बुढ़ाता है तो पार्टी में उसकी पोजिशन फूफा की हो जाती है। काँग्रेस में सीताराम केसरी और नरसिम्हा राव, बहुजन समाजवादी पार्टी में कांसी राम और बीजेपी में आडवाणी की तरह। इनकी पोजिशन बिल्कुल मुझसे मिलती-जुलती है। सफेद बाल चुगली करते हैं कि यह शख्स बूढ़ा हो गया, अब यह कबाड़ होने की प्रक्रिया के अंतर्गत है। कवि ने ठीक ही कहा है:-
    उजरो उजरो सब भलो, उजरो भलो ना केश
    नारी रीझै ना रिपु डरै, आदर करे ना नरेश
     जिंदगी सूखे गुलाब के पौधे की तरह हो गई है। सिर्फ काँटे ही बचे हैं। फिर भी वह भौरें की तरह वसंत के आने की आशा में जड़ में अटका रहता है:-
      इहिं आसा अटक्यो रह्यो अली गुलाब के मूल।
      अहइँ बहुरि बसन्त रितु इन डारन वे फूल।।

   ईश्वर की असीम अनुकम्पा से नर के वैवाहिकता को प्राप्त होते ही एक नारी पत्नीत्व को प्राप्त होती है और वह नरपुंगव उसका पति और उसकी छोटी बहनों और भाइयों का जीजा बन जाता है। जीजा बनते ही वह जेब में फरमाइश की लंबी फेहरिस्त लिए घूमते रहता है कि उसे यह चाहिए, वह चाहिये, उसका ऐसे सत्कार होना चाहिए, उसका वैसे सत्कार होना चाहिये। दो-चार साल तक तो उसकी फरमाइश पूरी होती है। फिर धीरे-धीरे वह बेआबरू होने लगता है और घर से लेकर दफ्तर तक उसकी औकात दो कौड़ी की हो जाती है। आज की पीढ़ी दो कौड़ी शायद नहीं समझ पाये। ऐसा करते हैं कि कौड़ी के बदले एक रुपया कर देते हैं, जिसका सत्यनारायण भगवान की कथा में गौरी-गणेश पर या आरती में चढ़ाने के अलावा अब कोई इस्तेमाल नहीं है। वह एकाध रुपये की इज्जत ससुराल से ही खींच पाता है, वह भी बतौर फिरौती। वरना ससुराल वालों का बस चले तो वे जीजा के साथ भी वही सलूक करें, जो आम तौर पर चुनाव के मौसम में वोट मांगते नेता के साथ किया जाता है। मैं इस श्लोक में विश्वास नहीं करता कि-
  सदा वक्र: सदा क्रूर:, सदा पूजमपेक्षते।
  कन्याराशि स्थितो नित्यं, जमाता दशमो ग्रह:।।
  जैसे-जैसे वह पुराना होता जाता है भारतीय मुद्रा की तफह उसका अवमूल्यन होता जाता है। उसकी स्थिति वैसे ही हो जाती जैसे संसद सदस्यता या विधायकी समाप्त हुई नेता की। चुनाव आते ही नेताओं के हालत पुराने पड़ चुके जीजाओं जैसी हो जाती है। न जाने क्या-क्या मांग रहे हैं, पर ससुरालवालों की तरह जनता ध्यान नहीं दे रही है। आप सोचते होंगे इससे उनकी बेइज्जती और खराब होती है। पर आप गलत हैं। वह जीजा और नेता ही क्या जो बेइज्जती से घबड़ा जाय। जीजा और नेता समान रूप से नेता थेथर होते हैं, बिल्कुल हथलपक। हाथ लग गया तो ठीक वरना बेइज्जत हुए तो देह झाड़ के चल दिये। हमारे देश में, आम आदमी की इज्जत सिर्फ बतौर नव निर्मित जीजा ही हो पाती है। जीजा जब बूढ़ा होता है, तो फूफा बन जाता है। पूछ बिल्कुल नहीं, लेकिन बेमतलब ऐंठा रहता है। फूफा और कबाड़ में कोई मौलिक अंतर नहीं होता। नेता बुढ़ाता है तो पार्टी में उसकी पोजिशन फूफा की हो जाती है। काँग्रेस में सीताराम केसरी और नरसिम्हा राव, बहुजन समाजवादी पार्टी में कांसी राम और बीजेपी में आडवाणी की तरह। इनकी पोजिशन बिल्कुल मुझसे मिलती-जुलती है। सफेद बाल चुगली करते हैं कि यह शख्स बूढ़ा हो गया, अब यह कबाड़ होने की प्रक्रिया के अंतर्गत है। कवि ने ठीक ही कहा है:-
उजरो उजरो सब भलो, उजरो भलो ना केश
नारी रीझै ना रिपु डरै, आदर करे ना नरेश 
 जिंदगी सूखे गुलाब के पौधे की तरह हो गई है। सिर्फ काँटे ही बचे हैं। फिर भी वह भौरें की तरह वसंत के आने की आशा में जड़ में अटका रहता है:-
  इहिं आसा अटक्यो रह्यो अली गुलाब के मूल।
  अहइँ बहुरि बसन्त रितु इन डारन वे फूल।।
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