World War 3 : तीसरे विश्वयुद्ध की आहट में पिसता भारत! ऊर्जा संकट, महंगाई और वैश्विक तनाव से बढ़ी चिंता

Nishikant Thakur

World War 3 : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले सप्ताह  जनता से अपील की कि देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए कम से कम एक वर्ष तक गैर-जरूरी सोना या आभूषण खरीदने से बचें। ईंधन की बचत के लिए निजी वाहनों के बजाय सार्वजनिक परिवहन, मेट्रो, कार-पूलिंग या इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल करें। जहां तक संभव हो, घर से काम को प्राथमिकता दें, ताकि रोजाना की यात्रा और ईंधन की खपत कम गैर-जरूरी विदेश यात्राओं और विदेशों में डेस्टिनेशन वेडिंग करने से बचें, ताकि देश की मूल्यवान विदेशी मुद्रा के भंडार को बचाया जा सके। रसोई में कुकिंग ऑयल (खाद्य तेल) का अनावश्यक इस्तेमाल ना करें, क्योंकि भारत इसका भारी मात्रा में आयात करता है। विदेशी ब्रांड्स के बजाय देशी उत्पादों और स्वदेशी सामानों को बढ़ावा दें। किसानों से अपील की गई है कि वे रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करके प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ें। प्रधानमंत्री हर देशवासियों की चिंता करते हैं। उसके लिए देश हर सुख दुःख में उनपर, उनके अपील को संज्ञान में लेकर उस पर अमल करेगा और आगामी आने वाली सर्वनाशक मंदी से उबर सकेगा। अब देश को यह सोचने पर विवश होना पड़ेगा कि आखिर यह कोरोना काल जैसी स्थिति क्यों आने वाली है? क्या इस तरह की आपात स्थिति इसलिए आने वाली है कि विश्व के कई देशों में युद्ध जारी है? हां, स्थिति तो इसीलिए भयावह होने वाली है, लेकिन इस स्थिति के लिए भारत क्यों और कैसे जिम्मेदार है और यहां की जनता का क्या कसूर है? यह स्थिति बड़ी अटपटी लगती है कि इन युद्धों में उसकी भागीदारी कुछ भी नहीं है, लेकिन उस युद्ध की विभीषिका में भारत कैसे फंस गया, उसके लपेटे में कैसे आ गया?

दूसरी ओर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और रायबरेली के कांग्रेस संसद राहुल गांधी ने कहा कि अब जो आर्थिक तूफान आने वाला है उसका झटका अदानी, अंबानी  या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नहीं बल्कि युवाओं, किसानों और  छोटे व्यापारियों को लगेगा , क्योंकि बहुत मुश्किल समय आने वाला है। पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने प्रधानमंत्री पर तंज कसते हुए कहा कार्यवाही करने के बजाय वह देश से कह रहे हैं कि विदेश यात्राओं पर न जाएं वह स्वयं पूरी दुनिया के चक्कर काट रहे हैं। इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और संघर्ष के बीच भारत ने ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति अपनाते हुए सभी पक्षों के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखा है। भारत ने किसी भी गुट में शामिल होने के बजाय राष्ट्रीय हितों और कूटनीतिक संयम को प्राथमिकता दी है। अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच भारत की स्थिति के मुख्य बिंदु ये हैं कि भारत और इज़राइल के बीच रक्षा, प्रौद्योगिकी और आतंकवाद-विरोधी सहयोग बहुत गहरे हैं। इज़राइल भारत को प्रमुख सैन्य उपकरण और हार्डवेयर प्रदान करता है। अमेरिका के साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र और क्वाड जैसे मंचों पर भी भारत की निकटता बढ़ी है। इस कारण भारत, अमेरिका और इज़राइल के साथ स्वाभाविक रूप से करीब आया है।

वहीं, सामरिक रूप से भारत के लिए ईरान भी बेहद अहम है। अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच के लिए भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए भारत ईरान और खाड़ी देशों पर निर्भर है। हाल ही में अमेरिका से विशेष छूट मिलने के बाद भारत ने ईरान से कच्चे तेल और एलएनजी की आपूर्ति को भी सुरक्षित किया है। भारत ने अपनी विदेश नीति में ‘डी-हाइफेनेशन’ की नीति अपनाई है। इसका मतलब है कि भारत इज़राइल, अमेरिका और ईरान के साथ अपने संबंधों को एक-दूसरे के चश्मे से नहीं देखता, बल्कि हर रिश्ते को स्वतंत्र रूप से संभालता है। भारत ने संघर्ष के दौरान किसी भी पक्ष (अमेरिका-इज़राइल या ईरान) की खुलकर आलोचना या समर्थन करने से परहेज किया है और लगातार बातचीत व कूटनीति से विवाद सुलझाने की अपील की है। भारत अपनी तटस्थता और सभी देशों के साथ अच्छे संबंधों के कारण एक संभावित मध्यस्थ के रूप में भी उभरा है। कई अंतरराष्ट्रीय नेताओं और विश्लेषकों का मानना है कि भारत की पहुंच सभी पक्षों तक होने के कारण वह पश्चिम एशिया के तनाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस प्रकार, भारत ने एकतरफा झुकाव के बजाय अपनी कूटनीतिक परिपक्वता का प्रदर्शन करते हुए सभी शक्तियों के साथ अपने हितों का सफलतापूर्वक तालमेल बिठाया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) युद्ध और ईरान संकट के कारण उत्पन्न वैश्विक ऊर्जा और आर्थिक संकट के मद्देनजर देश की जनता को ‘कोरोना काल’ जैसी स्थिति के लिए तैयार रहने  कहा है। इस बयान के पीछे के मुख्य कारण और जनता से की गई अपील निम्नलिखित कारणों से की गई है। पश्चिम एशिया के हालातों और हर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण भारत के ईंधन और गैस आपूर्ति पर गहरा असर पड़ा है, जिससे कच्चे तेल और गैस की कीमतों में भारी उछाल आया है। पीएम मोदी ने स्पष्ट किया है कि जिस तरह देश ने ‘कोरोना महामारी’ के दौरान धैर्य और एकजुटता दिखाई थी, उसी तरह अब इस वैश्विक भू-राजनीतिक संकट का सामना करने के लिए देश को सतर्क और एकजुट रहना होगा। अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव  कम करने के लिए उन्होंने नागरिकों से ‘वर्क फ्रॉम होम’ अपनाने, वर्चुअल मीटिंग्स करने और पेट्रोल-डीजल का इस्तेमाल कम से कम करने की अपील की है। लोगों को सलाह दी गई है कि वे सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग करें, घरेलू स्तर पर ही समारोह आयोजित करें और कम से कम एक साल तक सोना जैसी चीजों में अनावश्यक निवेश करने से बचें। प्रधानमंत्री ने आश्वस्त किया है कि सरकार पूरी तरह से सतर्क है और नागरिकों की सुरक्षा व जरूरी चीजों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए हर संभव रणनीतिक कदम उठा रही है।

एक सबसे बड़ी समस्या, जो विश्व का लिए घातक सिद्ध होने वाली है, वह यह कि विश्व में  सर्वाधिक शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका के राष्टपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चीन जाकर वहां के राष्ट्रपति सी जिनपिंग से मुलाकात करके संभवत: चीन जैसे देश को अपने साथ मिलाकर कोई बड़ी योजना को अंजाम देने के मंसूबे पाल रहा हो। ऐसा इसलिए भी लगता है, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के राष्ट्रपति सी जिनपिंग के कार्य और चीन की जमकर प्रशंसा की। इसी तरह अब यह भी जानकारी विश्व को दी गई है कि रूस के राष्ट्रपति भी चीन जाकर विचार विमर्श करेंगे। विश्व के इन सर्वाधिक शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति द्वारा चीन जाकर वहां के राष्ट्रपति से विचार—विमर्श करना साबित करता है कि आज अमेरिका और रूस से अधिक ताकतवर चीन बन गया है, जहां हाजिरी लगाने बड़ी—बड़ी हस्तियां पहुंच रही हैं और उन सबको मिलकर चीन उसे अपने पक्ष में करने की सहमति बना रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति का चीन दौरा खत्म होने के बाद से कयास लगाया जा रहे है कि अमेरिका फिर ईरान पर हमले शुरू कर सकता है। 8 अप्रैल को अस्थायी सीजफायर के बाद दोनों पक्षों की बातचीत के जरिये समझौते पर पहुंचने की कोशिश नाकाम रही। इससे फिर युद्ध शुरू होने का खतरा बढ़ गया है। ऐसा इसलिए कि न्यूयार्क टाइम्स ने दावा किया है कि अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान के खिलाफ हमले शुरू करने के लिए ऑपरेशन एपीजे फ्यूरी 2.0′ की योजना तैयार की है। जो भी हो, यदि इन तीनों विश्व की महाशक्तियों द्वारा और कुछ किया, तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है विश्व तृतीय विश्वयुद्ध की तरफ बढ़ रहा है। सच और झूठ चाहे कुछ भी हो, लेकिन यदि ऐसा कुछ भी होता है, तो भारत उसमें कहीं न कहीं पिसेगा जरूर। इसलिए प्रधानमंत्री की पूर्व अपील भयंकर परिणामों की ओर इशारा करता है। अपने भारत का संस्कार करुणा और उदारता का है। हमने क्षमा करना सीखा है। अपना किया तो इन देशों के लोग भुगतेंगे, लेकिन एक बार तो इन पर तरस खाना ही होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)

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