Ganga Dussehra: “गंगा केवल नदी नहीं… सनातन संस्कृति की अमर चेतना है!”

Niranjan Srivastava

Ganga Dussehra: आज गंगा दशहरा है। इसे गंगा जयंती भी कहा जाता है। हस्त नक्षत्र लगने पर ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को गंगा का अवतरण हुआ था और इस दिन गंगा दशहरा का पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि इस तिथि को गंगा-स्नान करने से दसों प्रकार के पापों (तीन कायिक पाप-हिंसा, चोरी और अनैतिक संबंध; चार वाचिक पाप-झूठ, चुगली, कठोर वचन एवं व्यर्थ प्रलाप तथा तीन मानसिक पाप-दूसरे के धन की लालसा, ईर्ष्या या द्वेष एवं अधर्म में आस्था) का हरण हो जाता है। अतः गंगा के अवतरण दिवस को गंगा दशहरा भी कहा जाता है।
गंगा अति पुण्य सलिला नदी है। कहते हैं कि इसे राजा भगीरथ के प्रयत्नों से देवलोक से पृथ्वी पर उतरना पड़ा। वेदों, उपनिषदों, पुराणों, ब्राह्मण ग्रन्थों एवं रामायण तथा महाभारत जैसे महाकाव्यों में, भक्ति के पदों, हिन्दी काव्यों एवं समकालीन हिन्दी कविता में गंगा की महिमा का बार-बार उल्लेख हुआ है।
गंगा कई नामों से जानी जाती है। गंगा के अन्य नाम हैं-सुरसरि, त्रिपथगा, भगीरथी, त्रिदश दीर्घिका, जाह्नवी, मन्दाकिनी, भीष्म-जननी, सरिद्वारा, विष्णुपदी, सिद्धगा, अलकनन्दा, स्वर्गा, स्वर्गगंगा, ऋषिकुल्या, सर्वापि, सुरनिमग्ना, विस्रोता, हैमवती, हरचन्द्रिका और खगा। लेकिन लोकप्रिय नाम गंगा ही है।
ऋग्वेद के नदी सूक्त में यमुना और सरस्वती नदी के साथ गंगा नदी का उल्लेख है। उसे ‘नदीतमे’ अर्थात् नदियों में श्रेष्ठ और शिरोमणि के रूप में सम्मानित किया गया है। उपनिषद्, विशेषकर छांदोग्य उपनिषद् और वेदांत दर्शन में गंगा को केवल एक नदी नहीं बल्कि आध्यात्मिक चेतना, ज्ञान के प्रवाह एवं मोक्षदायिनी शक्ति के रूप में दर्शाया गया है। विष्णु पुराण, ब्रह्म पुराण एवं स्कंद पुराण में गंगा के अवतरण की कथा है। वह विष्णु के चरण से प्रकट होकर, भगवान् शिव की जटाओं में समाहित हुई और राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से पृथ्वी पर आयी। भगीरथ प्रयत्न मुहावरा बन गया। नृसिंह पुराण में कहा गया है, “गंगे त्वां दर्शनात् मुक्ति:” अर्थात् हे गंगा तुम्हारे दर्शन मात्र से मुक्ति मिलती है। शतपथ ब्राह्मण एवं ऐतरेय ब्राह्मण में गंगा नदी का उल्लेख प्रमुख नदी के रूप में हुआ है। महाभारत में गंगा का उल्लेख महाराजा शांतनु की महारानी एवं भीष्म की माता के रूप हुआ है। भीष्म का एक नाम गांगेय है। श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है-“स्रोताअस्मि जाह्नवी” अर्थात् नदियों में में गंगा हूँ।”
वाल्मीकि रामायण (विशेषकर बालकाण्ड) में गंगा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इसे त्रिपथगामिनी कहा गया है। महर्षि विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को गंगा के जन्म और पृथ्वी पर उसके अवतरण की कथा सुनाते हैं। भगीरथ श्रीराम के पाँच पीढ़ी आगे के पूर्वज थे। रामचरितमानस में गंगा से जुड़े प्रसंग हैं, जिनमें केवट प्रसंग और सीता माता द्वारा गंगा मैया के पूजन के प्रसंग उल्लेख्य हैं।
तुलसी के पद में गंगा का उल्लेख त्रिभुवन तारक के रूप में हुआ है-
“भजु मन राम चरन सुखदाई।
जिहि चरनन से निकसी सुरसरि संकर जटा समाई।
जटासंकरी नाम परयो है त्रिभुवन तारन आई।।”
आधुनिक हिन्दी काव्य में भारतेन्दु हरिश्चंद्र की कविता ‘गंगा-वर्णन’ और ‘गंगा-छवि’, जगन्नाथ रत्नाकर की कविता ‘गंगावतरण’ और सुमित्रानन्दन पंत की कविता ‘नौका विहार’ के अलावा गंगा की महिमा पर मैथलीशरण गुप्त और सोहनलाल द्विवेदी की कविताएँ उल्लेख्य हैं। समकालीन कविता में गंगा बदलते समय, सामाजिक यथार्थ और पर्यावरण के संकट का प्रमुख बिम्ब बनकर उभरी है। कैलाश गौतम ने उसके खोये हुए गौरव और वर्तमान यथार्थ का वर्णन किया है-
“कह रही क्या ही गई, हैरान है गंगा
शीशे में खुद को देख परेशान है गंगा
मैदान ही मैदान है मैदान है गंगा
कुछ ही दिनों की देश में मेहमान है गंगा
गंगा की क्या बात करूँ, गंगा उदास है,
वह जूझ रही है खुद से, और बदहवास है।”
भारतीय लोकमानस एवं लोक-संस्कृति में गंगा नदी ही नहीं जीवनदायिनी माँ, मोक्षदायिनी एवं आस्था का केंद्र है। लोकगन्धी संस्कारगीतों में और लोक गीतों गंगा का वर्णन माँ और देवी के रूप में हुआ है। उन्हें सात जोड़ा शुद्ध घी की पुरी और पियरी अर्पित कर मन्नत मांगी जाती है।
प्रख्यात ललित निबंधकार कुबेरनाथ राय के दो निबंध गंगा पर हैं। फिर कभी इनकी चर्चा करूँगा। गंगा शब्द की उत्पत्ति के विषय में संस्कृत की उक्ति उद्धृत करते हैं-‘गं-गं गच्छति सा गंगा’ अर्थात् जो गं-गं ध्वनि कर चलती हो वह गंगा है। उन्होंने गंगा के लिए बड़ा ही सुंदर और उपयुक्त रूपक का प्रयोग किया है। वह कहते हैं-“गंगा गोमुख से निकलती है और इसका स्वभाव और चरित्र पयस्वला धेनु की तरह है जो अपने बछड़े के लिए रंभाती-दौड़ती घर को लौट रही है। वह बछड़ा और कोई नहीं, भारतवर्ष ही है।”
मुझे बचपन की बात याद आ रही है। रेल यात्रा में जब कभी ट्रेन किसी पुल के ऊपर से गुजरती थी तो लोग गंगा मइया की जय कहते हुए तांबे के पैसे ट्रेन की खिड़की से नीचे नदी में फेंका करते थे। लोकमानस हर नदी को गंगा की तरह ही पवित्र मानता था।

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