Lakshmi Bhandar : बंगाल में ‘लक्ष्मी भंडार’ पर घमासान, 30 लाख फर्जी लाभार्थियों का दावा!

Bindash Bol

* बंगाल में ‘लक्ष्मी भंडार’ पर बड़ा विवाद: 30 लाख संदिग्ध लाभार्थियों के दावे से मचा सियासी तूफान

Lakshmi Bhandar :पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस समय बड़ा भूचाल आ गया, जब विधानसभा में विपक्ष के नेता  ने ममता बनर्जी सरकार की बहुचर्चित “लक्ष्मी भंडार” योजना को लेकर गंभीर आरोप लगाए। शुभेंदु अधिकारी का दावा है कि योजना के लाभार्थियों की सूची को राज्य की वोटर लिस्ट से मिलाने पर करीब 30 लाख ऐसे नाम सामने आए, जिनका रिकॉर्ड संदिग्ध है।
उनके अनुसार इन लाभार्थियों में कई ऐसे लोग शामिल हो सकते हैं जो या तो भारतीय नागरिक नहीं हैं, या फिर जिनका नाम पश्चिम बंगाल की आधिकारिक मतदाता सूची में दर्ज ही नहीं है। इस दावे के सामने आते ही राज्य की राजनीति में हड़कंप मच गया है और सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं।

क्या है पूरा मामला?

“लक्ष्मी भंडार” योजना को  सरकार की सबसे लोकप्रिय डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) स्कीम माना जाता है। इस योजना की शुरुआत 2021 में की गई थी, जिसके तहत महिलाओं के बैंक खातों में हर महीने आर्थिक सहायता सीधे ट्रांसफर की जाती है।
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, सामान्य वर्ग की महिलाओं को ₹1000 और SC/ST वर्ग की महिलाओं को ₹1200 प्रतिमाह दिए जाते हैं। बताया जाता है कि इस योजना से लगभग 2 से 2.5 करोड़ महिलाएं जुड़ी हुई हैं और इस पर हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं।

लेकिन अब विपक्ष सवाल उठा रहा है कि आखिर लाभार्थियों की सूची में इतनी बड़ी संख्या में संदिग्ध नाम कैसे शामिल हो गए?
विपक्ष ने उठाए कई बड़े सवाल
शुभेंदु अधिकारी ने आरोप लगाया कि यदि 30 लाख लाभार्थी वास्तव में फर्जी या संदिग्ध पाए जाते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि बड़े आर्थिक घोटाले का मामला बन सकता है।

विपक्ष का दावा है कि….

* क्या बांग्लादेशी घुसपैठियों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जा रहा था?

* क्या वोट बैंक मजबूत करने के लिए संदिग्ध लोगों को योजनाओं में शामिल किया गया?

* या फिर सरकारी धन को किसी संगठित नेटवर्क के जरिए गलत दिशा में भेजा जा रहा था?

हालांकि अभी तक इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और राज्य सरकार की ओर से विस्तृत जवाब सामने आना बाकी है।

कितनी बड़ी हो सकती है आर्थिक अनियमितता?

यदि 30 लाख लाभार्थियों को न्यूनतम ₹1000 प्रतिमाह भी दिए गए हों, तो यह राशि करीब ₹300 करोड़ प्रति माह और लगभग ₹3600 करोड़ प्रतिवर्ष तक पहुंच सकती है।
विशेष श्रेणी के भुगतान को जोड़ने पर यह आंकड़ा और अधिक बढ़ सकता है। ऐसे में विपक्ष का कहना है कि यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह देश के सबसे बड़े DBT घोटालों में से एक बन सकता है।

अन्य योजनाओं पर भी उठे सवाल

राजनीतिक हलकों में अब यह चर्चा भी तेज हो गई है कि क्या केवल “लक्ष्मी भंडार” ही नहीं, बल्कि राज्य की अन्य कल्याणकारी योजनाओं में भी लाभार्थियों के डेटा की जांच की जरूरत है।
“दुआरे सरकार”, “दुआरे राशन” और अन्य सामाजिक योजनाओं में करोड़ों लोग जुड़े हुए हैं। ऐसे में लाभार्थियों की सत्यता, नागरिकता और डेटा वेरिफिकेशन को लेकर बहस और तेज हो सकती है।

सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार

फिलहाल यह पूरा मामला आरोप और दावों के स्तर पर है। अभी तक किसी सरकारी एजेंसी या स्वतंत्र जांच रिपोर्ट ने इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। लेकिन इतने बड़े स्तर पर उठे सवालों ने निश्चित तौर पर पश्चिम बंगाल की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि राज्य सरकार इन आरोपों पर क्या जवाब देती है और क्या इस मामले में किसी जांच की घोषणा होती है या नहीं।

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