Mamata Banerjee : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद तृणमूल कांग्रेस में मची उथल-पुथल थमने का नाम नहीं ले रही। कभी अजेय दिखने वाली ममता बनर्जी की पार्टी अब भीतर से दरकती नजर आ रही है। विधायक तो पहले ही बगावत का झंडा उठा चुके थे, अब सांसदों की नाराजगी भी खुलकर सामने आने लगी है। सवाल यह है कि क्या टीएमसी सिर्फ राजनीतिक संकट से गुजर रही है या फिर पार्टी के भीतर सत्ता संघर्ष विस्फोटक मोड़ पर पहुंच चुका है?
टीएमसी से बगावत कर चुकीं काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया है कि पार्टी के 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर एनडीए को समर्थन देने की इच्छा जताई है। अगर यह दावा सच साबित होता है तो तृणमूल कांग्रेस के लिए यह अब तक का सबसे बड़ा राजनीतिक झटका होगा। हालांकि जयनगर की सांसद प्रतिमा मंडल ने इस दावे को खुली चुनौती देते हुए कहा है कि उनके नाम का दुरुपयोग किया जा रहा है और उन्होंने किसी पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।
प्रतिमा मंडल ने दो टूक कहा कि यदि वास्तव में 20 सांसद बागी खेमे के साथ हैं तो वह कथित पत्र सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा? उन्होंने बागी नेताओं को चुनौती देते हुए कहा कि जनता के जनादेश से चुनी गई हैं और 2029 तक टीएमसी के साथ ही रहेंगी। उच्च पदस्थ सूत्रों के हवाले से खबर है कि टीएमसी के कई बड़े नेता भाजपा के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं, मगर भाजपा उन नेताओं को अप्रूवल देने से बच रही है जो पहले भाजपा में थे और भाजपा छोड़ने के बाद बाहर में काफी बयान बाजी की। वैसे नेताओं में शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद सबसे आगे हैं। भाजपा में दाल नहीं गलता देख ऐसे नेता ममता बनर्जी के साथ खूब वफादारी की बात कर रहे हैं।
उधर, पार्टी संकट के बीच अभिनेता से सांसद बने शत्रुघ्न सिन्हा भी ममता बनर्जी के समर्थन में खुलकर सामने आ गए हैं। उन्होंने साफ कहा कि मुश्किल समय में ममता उनके साथ खड़ी रहीं, इसलिए वह भी उनका साथ नहीं छोड़ेंगे। वरिष्ठ सांसद कीर्ति आज़ाद ने भी भाजपा और अमित शाह पर निशाना साधते हुए कहा कि किसी भी दबाव के आगे झुकने का सवाल ही नहीं उठता।
लेकिन इन बयानों के बावजूद टीएमसी की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रहीं। राज्यसभा में पार्टी को लगातार झटके लग रहे हैं। प्रकाश चिक बराइक, सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और कोयल मल्लिक के इस्तीफों ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। सिर्फ चार दिनों में चार राज्यसभा सांसदों का जाना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि असंतोष कहीं ज्यादा गहरा है, जितना ऊपर से दिखाई दे रहा है।
लोकसभा में भी हालात कम चिंताजनक नहीं हैं। 28 सांसदों वाली टीएमसी में यदि 19 सांसद भी अलग हो जाते हैं तो दलबदल कानून की बाधा टूट सकती है और बागी गुट पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह तक पर दावा ठोक सकता है। यही वजह है कि 20 सांसदों वाले दावे ने दिल्ली से लेकर कोलकाता तक सियासी गलियारों में हलचल मचा रखी है।
सबसे ज्यादा चर्चा युवा तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और सांसद सायोनी घोष को लेकर है। सूत्रों के मुताबिक दिल्ली में भाजपा नेताओं और कथित बागी सांसदों के साथ हुई बैठक में उनकी मौजूदगी की चर्चा है। हालांकि सायोनी घोष ने अब तक न तो इन खबरों का खंडन किया है और न ही समर्थन। कोलकाता लौटने पर भी उन्होंने मीडिया के किसी सवाल का जवाब नहीं दिया। उनकी यही चुप्पी अब सबसे ज्यादा सवाल खड़े कर रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि टीएमसी में संकट सिर्फ कुछ नेताओं के इस्तीफे तक सीमित नहीं है। असली चिंता ममता बनर्जी की खामोशी है। जिस नेता को हर मुद्दे पर आक्रामक प्रतिक्रिया देने के लिए जाना जाता है, उसकी चुप्पी कई तरह के संकेत दे रही है। क्या पार्टी के भीतर सब कुछ नियंत्रण में है, या फिर टीएमसी किसी बड़े राजनीतिक विस्फोट की आहट सुन रही है? फिलहाल बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है।