Jharkhand : झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर बड़ी पहचान मिली है। राज्य के 11 पारंपरिक उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication-GI) टैग प्रदान किया गया है। यह उपलब्धि न केवल झारखंड की कला, शिल्प और पारंपरिक ज्ञान प्रणाली के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि इससे हजारों कारीगरों, बुनकरों और ग्रामीण उत्पादकों की आजीविका को भी नई मजबूती मिलेगी। इनमें चार उत्पादों को GI टैग दिलाने में राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की अहम भूमिका रही है।
झारखंड की विरासत को मिला वैश्विक सम्मान
वर्ष 2026 में GI टैग प्राप्त करने वाले उत्पादों में भगैया सिल्क, कुचाई सिल्क, कोडरमा का केसरिया कलाकंद, डोकरा क्राफ्ट, दुमका चादर-बदोनी पपेट्स, मुंडा ज्वेलरी, झारखंड बांस शिल्प, तसर सिल्क एवं साड़ियां, जादुपटुआ पेंटिंग, पंछी साड़ी एवं फैब्रिक्स और झारखंड बेनाम शामिल हैं। इससे पहले वर्ष 2021 में राज्य की प्रसिद्ध सोहराय-कोहबर पेंटिंग को GI टैग मिल चुका है।

क्या होता है GI टैग और क्यों है खास?
GI टैग किसी उत्पाद की विशिष्ट भौगोलिक पहचान और उसकी प्रामाणिकता का प्रमाण होता है। इससे उत्पाद की ब्रांड वैल्यू बढ़ती है, नकली उत्पादों पर रोक लगाने में मदद मिलती है और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहतर कीमत मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
नाबार्ड के प्रयासों से मिली नई पहचान
नाबार्ड के सहयोग से भगैया सिल्क, कुचाई सिल्क, मुंडा ज्वेलरी और झारखंड बांस शिल्प को GI टैग दिलाने में सफलता मिली। संस्थान ने उत्पादों की विशेषताओं का दस्तावेजीकरण, उत्पादकों को संगठित करने, मूल्य श्रृंखला विकसित करने और GI पंजीकरण की पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रेशम उद्योग को मिलेगा नया आयाम
भगैया सिल्क और कुचाई सिल्क को GI टैग मिलने से झारखंड की पारंपरिक रेशम कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी। पीढ़ियों से चली आ रही स्थानीय तकनीक और हस्तकला अब वैश्विक बाजार तक पहुंच सकेगी, जिससे बुनकरों की आय बढ़ने की उम्मीद है।
मुंडा ज्वेलरी और बांस शिल्प को मिलेगा बड़ा बाजार
मुंडा समुदाय की पारंपरिक आभूषण कला को GI टैग मिलने से आदिवासी कारीगरों को नए बाजार और बेहतर आमदनी के अवसर मिलेंगे। वहीं झारखंड के बांस शिल्प को भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नई पहचान मिलेगी, जिससे ग्रामीण उद्यमिता और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा।

2026 में GI टैग पाने वाले झारखंड के 11 उत्पाद
* भगैया साड़ी एवं फैब्रिक्स
* कुचाई सिल्क
* कोडरमा का केसरिया कलाकंद
* डोकरा क्राफ्ट
* दुमका चादर-बदोनी पपेट्स
* मुंडा ज्वेलरी
* झारखंड बांस शिल्प
* तसर सिल्क एवं साड़ियां
* जादुपटुआ पेंटिंग
* पंछी साड़ी एवं फैब्रिक्स
* झारखंड बेनाम

‘यह झारखंड की सांस्कृतिक विरासत का सम्मान’
नाबार्ड झारखंड की मुख्य महाप्रबंधक दीपमाला घोष ने कहा कि GI टैग केवल उत्पादों को पहचान और व्यावसायिक मूल्य ही नहीं देता, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी पारंपरिक कला और शिल्प से जोड़ने का भी माध्यम बनता है। उन्होंने बताया कि नाबार्ड ग्रामीण हाट, सरस मेला, खरीदार-विक्रेता बैठक और विभिन्न विपणन मंचों के जरिए इन उत्पादों को देश-विदेश के बाजारों तक पहुंचाने के लिए लगातार काम कर रहा है।
ब्रांडिंग, निर्यात और पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा
विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग मिलने से झारखंड के इन उत्पादों की ब्रांडिंग मजबूत होगी, निर्यात के नए अवसर खुलेंगे और राज्य में सांस्कृतिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन पारंपरिक उत्पादों से होने वाला आर्थिक लाभ सीधे उन कारीगरों और समुदायों तक पहुंचेगा, जिन्होंने पीढ़ियों से इन विरासतों को संजोकर रखा है। यह उपलब्धि झारखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति देने के साथ-साथ राज्य की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर और मजबूत करेगी।