Naad Brahma : शिव सृष्टि का आदि कारण हैं। शिव का अर्थ है कल्याण, मंगल, मंगलकारी और शुभ। भगवान शिव का एक नाम नटराज है। यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि नटराज शिव का एक रूप है, जिस रूप में वे सर्वोत्तम नर्त्तक हैं। भगवान् शिव का नटराज स्वरूप बिना किसी संशय के यह तथ्य स्थापित करता है कि इस ब्रह्मांड में स्थिति समस्त जीवन, उसकी गति, उसका कंपन एवं स्पंदन तथा ब्रह्मांड से पर शून्य की स्थिति की निःशब्दता सब कुछ शिव में समाहित है।
शिव के तांडव नृत्य से हम परिचित हैं। तांडव सृष्टि में लगातार चल रहा है। सृष्टि की सारी क्रियाओं की पांच विधाएँ हैं -सृष्टि, स्थिति,प्रलय, तिरोभाव और अनुग्रह, यह ‘आनन्द तांडव’ है और इसके कर्त्ता हैं नटराज रूप परमसंवित शिव स्वयं। पंच क्रिया तांडव की पांचों भाव-भूमियों का समाहार चिदम्बरम की आनन्द तांडव की नटराज मूर्ति में कर दिया गया है। नटराज-मूर्ति की चार भुजाओं में दो प्रसारित हैं और अगल-बगल वृत्त का स्पर्श करती प्रतीत होती हैं। इनमें दाहिनी भुजा में है डमरू और बायीं भुजा में है अग्नि। डमरू और अग्नि ‘सृष्टि’ और ‘प्रलय’ अर्थात् सृजन और संहार के प्रतीक हैं। ‘आदि में शब्द था’ ऐसी श्रुतियाँ कहती हैं। शब्दों का निर्माण व्यंजनों के अर्थपूर्ण संयोजन से होता है। भगवान् शंकर (जो शिव का एक नाम है) से ही स्वर और सुर दोनों का उद्गम है। वे नादब्रह्म हैं। नाद के एक विशेष नियंत्रण की संज्ञा व्याकरण-शास्त्रीय स्वर हैं, जिनकी सहायता से व्यंजनों का उच्चारण संभव होता है और उसी नाद के दूसरे प्रकार की नियंत्रण की संज्ञा लय, सुर, ताल आदि हैं।
नन्दीकेश्वरकाशी भाग-१ में नटराज के इस आनन्द तांडव के संदर्भ में मैं एक श्लोक आया है, जिसे मैं उद्धृत कर रहा हूँ…
नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्
उद्धर्तुकाम सनकादिसिद्धान् एतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम्।
नृत्य तांडव के (अवसान) के समाप्त होने पर नटराज (शिव) ने सनकादि ऋषियों की सिद्धि और कामना के उद्धार (पूर्त्ति) के लिये (नवपंच )चौदह बार डमरू बजाया जिससे उत्पन्न ध्वनियों से शिव-सूत्रों की वर्णमाला की उत्पति हुई। पाणिनि ने इसे शिव से प्राप्त आशीर्वाद के रूप में ग्रहण कर इन्हें ‘महेश्वर सूत्र’ के नाम से निम्नलिखित रूप में सूत्रबद्ध किया…
१. अ इ उ ण्
२. ऋ लृ क्
३. ए ओ ङ्
४. ऐ औ च्
५. ह य व र ट्
६. ल ण्
७. ञ म ड ण न म्
८. झ म ञ्
९. घ ढ ध ष्
१०. ज ब ग ड द श
११. ख फ छ ठ थ च ट त व्
१२. क प य्
१३. श ष स र्
१४. ह ल्
इन चौदह सूत्रों में संस्कृत और हिन्दी भाषाओं के सभी वर्णों का समावेश है। प्रथम चार सूत्र (अ इ उ ण् -ऐ औ च्) को स्वर वर्णों तथा शेष दस सूत्रों को व्यंजन वर्णों के रूप में गणना की गई है। स्वर वर्णों को अच् तथा व्यंजन वर्णों को हल् कहा गया है।
अच्- अ, इ, उ,ऋ, लृ, ए, ओ, औ।
हल्- क, ख, ग. घ. ङ च, छ,ज,झट,ठ,ड,ढ,ण, ,
त, थ, द,ध, न, प, फ, भ, म, य, र, ल, व ष,श, ह
सामान्यतः लिपि संकेतों द्वारा व्यक्त वर्णों को अक्षर भी कहा जाता है जो भाषा विज्ञान के अनुसार शब्दांश ध्वनियों की सबसे लघु इकाई है। इन्हीं वर्णों के अर्थपूर्ण समूह से शब्दों का निर्माण होता है और शब्दो के संयोजन और क्रम परिवर्तन के कलात्मक प्रयोगों से काव्य में रसयुक्त छंद की सृष्टि होती है।