Political Crisis : राजनीति का मौसम बड़ा बेईमान होता है। यहां “डूबते जहाज़ से सबसे पहले चूहे भागते हैं” और जब सत्ता की हवा बदलती है तो नेताओं की निष्ठा भी गिरगिट से तेज रंग बदलने लगती है।
पंजाब में आम आदमी पार्टी के सांसद भाजपा की चौखट पर जा बैठे। उधर बंगाल में चुनावी नतीजों के बाद ऐसा लगा मानो तृणमूल की दीवार में भीतर ही भीतर दीमक लग चुकी हो। विधायक-सांसदों की कतारें टूटने लगीं और अब महाराष्ट्र से भी वही कहानी सुनाई दे रही है। खबरें हैं कि उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) के कई विधायक और आधा दर्जन सांसद भी “राम-राम जपना, पराया माल अपना” वाली राजनीति का नया अध्याय लिखने को तैयार बैठे हैं।
बंगाल में मची भगदड़ की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि महाराष्ट्र में भी राजनीतिक भूकंप की आहट सुनाई देने लगी। कहा जा रहा है कि उद्धव खेमे के करीब 20 विधायक और 6 सांसद शिंदे गुट की राह पकड़ सकते हैं। राजनीति में कहते हैं—”जहां गुड़ होगा, वहीं चींटियां जुटेंगी।” सत्ता की मिठास आखिर किसे बुरी लगती है!
इस बीच उत्तर प्रदेश में भी “बिन बादल गरजने” का दौर शुरू हो गया। पहले ओमप्रकाश राजभर ने एक्स पर ऐसा तीर छोड़ा कि राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई। दावा किया कि समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव किसी सूची के साथ अमित शाह से मिले। तस्वीर पुरानी बताई गई, लेकिन राजनीति में धुआं वहीं उठता है, जहां कहीं न कहीं चिंगारी जरूर होती है।
इतने में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य भी मैदान में उतर आए। उन्होंने दावा कर दिया कि सपा के 25-26 सांसद बगावत के मूड में हैं। अब यह दावा कितना सच है और कितना राजनीतिक शतरंज की चाल, यह वक्त बताएगा। लेकिन इतना तय है कि राजनीति में अफवाह भी कई बार आधी जीत दिला देती है।
बंगाल में अभिषेक बनर्जी पर सवाल उठ रहे हैं तो महाराष्ट्र में उंगलियां आदित्य ठाकरे की ओर हैं। राजनीति का पुराना उसूल है—”घर का भेदी लंका ढाए।” जब अपने ही नाराज़ होने लगें तो विपक्ष से ज्यादा खतरा भीतर बैठा असंतोष बन जाता है।
शरद पवार पहले ही अपने भतीजे अजित पवार के दांव का स्वाद चख चुके हैं। अब उद्धव ठाकरे भी उसी मोड़ पर खड़े दिखाई दे रहे हैं, जहां “नाव किनारे पहुंचकर भी डूब जाती है।”
सवाल सिर्फ दल-बदल का नहीं है, सवाल नेतृत्व का भी है। सांसद-विधायक तभी तक साथ रहते हैं, जब तक उन्हें सम्मान, संवाद और भविष्य दिखाई देता है। केवल भाषणों और सोशल मीडिया की तलवार से संगठन नहीं चलता। “बोया पेड़ बबूल का, तो आम कहां से खाए।”
देश में मजबूत विपक्ष होना लोकतंत्र की जरूरत है। लेकिन अगर दल अपने ही फैसलों, अहंकार और अंदरूनी कलह से कमजोर पड़ जाएं, तो इसके लिए विरोधी दलों को दोष देना आसान जरूर है, मगर उचित नहीं।
और हां… नेताओं के लिए एक पुरानी कहावत बिल्कुल मुफीद बैठती है—”समय बड़ा बलवान।” आज जो दूसरे के घर में सेंध लगने पर ताली बजा रहा है, कल उसके आंगन की दीवार भी हिल सकती है।
फिलहाल राजनीति का संदेश साफ है—अपने कुनबे को संभालिए, वरना खेल सचमुच खात्मे की ओर बढ़ सकता है।