Bankipur : चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर अब पहली बार खुद चुनावी मैदान में उतरने जा रहे हैं। जन सुराज पार्टी ने उन्हें पटना की चर्चित बांकीपुर विधानसभा सीट से उपचुनाव का उम्मीदवार बनाया है। उम्मीदवार घोषित होने के बाद प्रशांत किशोर ने इसे बिहार की जनता और जन सुराज के प्रति अपनी जिम्मेदारी बताते हुए स्वीकार किया।
यह उपचुनाव इसलिए हो रहा है क्योंकि बीजेपी के वरिष्ठ नेता नितिन नवीन के राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद यह सीट खाली हुई है। लेकिन यह चुनाव सिर्फ एक सीट का नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति की नई दिशा तय करने वाला मुकाबला माना जा रहा है।
BJP के अभेद्य किले में क्यों उतरे प्रशांत किशोर?
बांकीपुर को लंबे समय से बीजेपी का मजबूत गढ़ माना जाता है। ऐसे में प्रशांत किशोर का यहां से चुनाव लड़ना राजनीतिक जोखिम के साथ-साथ बड़ा संदेश भी है।
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज पार्टी उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकी थी। पार्टी का वोट शेयर करीब 3.34 प्रतिशत रहा और अधिकांश उम्मीदवार अपनी जमानत भी नहीं बचा सके। उस चुनाव में प्रशांत किशोर खुद मैदान में नहीं उतरे थे। बाद में उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि चुनाव नहीं लड़ना उनकी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल थी।
अब बांकीपुर से चुनाव लड़कर वह न सिर्फ उस गलती को सुधारना चाहते हैं, बल्कि यह भी साबित करना चाहते हैं कि जन सुराज केवल आंदोलन नहीं, बल्कि चुनाव जीतने वाली राजनीतिक ताकत भी बन सकती है।
जीत आसान नहीं, जातीय समीकरण भी चुनौती

करीब 3.80 लाख मतदाताओं वाली बांकीपुर विधानसभा में कायस्थ, वैश्य, राजपूत, ब्राह्मण, भूमिहार, दलित, यादव, मुस्लिम और कोइरी-कुर्मी समुदाय चुनावी नतीजों पर प्रभाव डालते हैं।
आंकड़े भी प्रशांत किशोर के सामने बड़ी चुनौती दिखाते हैं। 2025 के विधानसभा चुनाव में जन सुराज उम्मीदवार को करीब 7,700 वोट मिले थे, जबकि बीजेपी के नितिन नवीन ने लगभग 98 हजार वोट हासिल किए थे। यानी दोनों के बीच भारी अंतर था।
हालांकि इस बार प्रशांत किशोर विकास, शहरी समस्याएं, भ्रष्टाचार, स्थानीय मुद्दों और मतदाताओं की नाराजगी को चुनावी एजेंडा बनाकर मुकाबले को रोचक बनाने की कोशिश करेंगे।
सम्राट चौधरी के नेतृत्व की भी होगी परीक्षा
यह उपचुनाव बीजेपी के लिए भी कम अहम नहीं है। मुख्यमंत्री बनने के बाद सम्राट चौधरी के नेतृत्व में यह बीजेपी की पहली बड़ी चुनावी परीक्षा मानी जा रही है।
अगर बीजेपी यह सीट बचाने में सफल रहती है तो यह संदेश जाएगा कि पार्टी का पारंपरिक वोट बैंक अब भी मजबूत है। वहीं अगर मुकाबला कड़ा होता है या अप्रत्याशित नतीजा आता है, तो विपक्ष इसे सत्ता के खिलाफ जनता के मूड के संकेत के रूप में पेश करेगा।
नजर सिर्फ बांकीपुर पर नहीं, पूरे बिहार पर
बांकीपुर का उपचुनाव अब केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं रह गया है। यह प्रशांत किशोर की राजनीतिक विश्वसनीयता, जन सुराज के भविष्य और बीजेपी के जनाधार—तीनों की परीक्षा बन चुका है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या प्रशांत किशोर बीजेपी के सबसे मजबूत गढ़ में सेंध लगाने में कामयाब होंगे, या फिर बांकीपुर एक बार फिर भगवा किले के रूप में कायम रहेगा?