Jammu Kashmir : आतंकी को बना दिया ‘शहीद’, भारत को बताया ‘कब्जेदार’… बच्चों को क्या पढ़ा रही थी J&K की सरकारी किताब?

Bindash Bol

Jammu Kashmir : जम्मू-कश्मीर में सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी तक पहुँची एक किताब ने ऐसा विवाद खड़ा कर दिया है जिसने पूरे शिक्षा तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस किताब का मकसद बच्चों को प्रेरित करना था, उसी में खूंखार आतंकी मकबूल भट्ट को ‘शहीद-ए-आजम’ बताया गया, भारत को ‘दमनकारी और कब्जा करने वाला देश’ कहा गया और अलगाववादी नेताओं को सम्मानजनक अंदाज में पेश किया गया।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह कोई निजी प्रकाशन की किताब नहीं थी, बल्कि समग्र शिक्षा योजना 2025-26 के तहत सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी के लिए खरीदी गई थी। यानी जिन बच्चों को संविधान, राष्ट्र और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए था, उनके सामने ऐसा साहित्य परोसा जा रहा था जिसमें पाकिस्तान की भाषा और अलगाववाद की विचारधारा साफ झलकती है।

किताब Personalities and Legends of J&K में मकबूल भट्ट को “महान क्रांतिकारी” और “शहीद-ए-आजम” बताया गया है। इतना ही नहीं, जम्मू-कश्मीर को Indian Occupied Kashmir (IOK) और Indian Held Kashmir (IHK) जैसे शब्दों से संबोधित किया गया है, जो दशकों से पाकिस्तान का आधिकारिक नैरेटिव रहा है।

यहीं बात खत्म नहीं होती। किताब में भारत को कश्मीर में “औपनिवेशिक और दमनकारी शासन” चलाने वाला देश बताया गया है और यह तक लिखा गया कि कश्मीर में भारत का चेहरा “लोकतांत्रिक नहीं बल्कि दमनकारी” है। यानी बच्चों के सामने भारत विरोधी सोच को तथ्य की तरह पेश किया गया।
विवादित सामग्री में अलगाववादी नेताओं मसरत आलम, सैयद अली शाह गिलानी, मीरवाइज उमर फारूक और शब्बीर शाह को भी सकारात्मक अंदाज में पेश किया गया है। कुछ जगह उनके बयान बिना किसी तथ्यात्मक चुनौती या आलोचना के शामिल किए गए हैं। यही नहीं, रिपोर्ट के मुताबिक किताब में ऐसे प्रसंग भी हैं जहाँ पाकिस्तान समर्थक नारों और अलगाववादी राजनीति को सामान्य रूप में दिखाया गया है।

जब मामला सामने आया तो जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई करते हुए दोनों विवादित किताबों को स्कूलों से वापस मंगाने का आदेश दिया। आठ शिक्षा अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया, संबंधित लेखकों और प्रकाशकों को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया और उनकी अन्य प्रकाशित सामग्री भी वापस लेने का फैसला किया गया। पूरे मामले की जाँच एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी को सौंपी गई है, जिन्हें 30 दिनों में रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया है।

मकबूल भट्ट कोई “रोमांटिक क्रांतिकारी” नहीं था, बल्कि भारतीय अदालत से दोषसिद्ध व्यक्ति था जिसे CID इंस्पेक्टर अमर चंद की हत्या के मामले में फाँसी की सजा मिली थी। बाद में उसके समर्थन में भारतीय राजनयिक रविंद्र म्हात्रे का अपहरण और हत्या भी हुई। ऐसे व्यक्ति को बच्चों के सामने “महान शहीद” बताना केवल इतिहास का विकृतिकरण नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की गंभीर चूक माना जा रहा है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—सरकारी स्कूलों तक भारत विरोधी नैरेटिव वाली किताब आखिर पहुँची कैसे? किस विशेषज्ञ समिति ने इसे मंजूरी दी? और क्या सिर्फ कुछ अधिकारियों के निलंबन से इतनी बड़ी चूक की जिम्मेदारी तय हो जाएगी, या पूरी खरीद प्रक्रिया की परतें भी खुलेंगी?

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