Student Protest : छात्र आंदोलन या सियासत का अखाड़ा? ‘हमार कि तोहार’ की रार में उलझी पार्टियां

Siddarth Saurabh

* देश की राजधानी पूरी तरह डिस्टर्ब, आम लोगों की परेशानी बड़ी

Student Protest : ​छात्र अपनी मांगों और भविष्य को लेकर सड़कों पर उतरे थे, लेकिन देश के सियासी सूरमाओं ने इसे अपनी ‘पुनर्जीवित’ होने की संजीवनी बूटी समझ लिया। हालत यह है कि छात्रों के मुद्दे कहीं पीछे छूट गए हैं और मंच पर “लड़े सिपाही, नाम सरदार का” वाली होड़ मची हुई है।
​इस वक्त छात्र आंदोलन का केंद्र बिंदु छात्रों की समस्याएं नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों का वर्चस्व बन चुका है। आइए समझते हैं कि इस आंदोलन के पर्दे के पीछे कौन-कौन सा सियासी खेल चल रहा है।

​1. राहुल, केजरीवाल और ‘क्रेडिट’ की होड़

कुछ महीने पहले राहुल गांधी ने नीट पेपर लीक के सहारे छात्रों का मुद्दा उठाया। देशभर में सभाएं करने की योजना बनाई गई। मगर अचानक राहुल गांधी विदेश यात्रा पर चले गए। लिहाजा कई सभाएं कैंसिल करनी पड़ी।

​कहानी की दिलचस्प शुरुआत तब हुई जब राहुल गांधी विदेश दौरे पर थे। उनके जाते ही आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने मौके की नज़ाकत को समझा और आंदोलन को लपक लिया। आंदोलन की बागडोर जैसे ही ‘आप’ के हाथ में आई, सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई। आपका पूरा परिवार पूरी तैयारी के साथ जंतर मंतर स्टेज पर ड्रामा शुरू किया।
​लेकिन असली ड्रामा तब हुआ जब राहुल गांधी विदेश से वापस लौटे। मामला लगभग ‘चिड़िया चुग गई खेत’ वाला हो चुका था। राहुल गांधी को बात समझ में आई कि मामला हाथ से निकल चुका है। राहुल हाथ मलते न रह जाएं, इसलिए उन्होंने बिना देर किए पीएम आवास के सामने धरना देकर केजरीवाल को पटकनी देने की कोशिश की। ड्रामा का स्क्रिप्ट जबरदस्त था, इतना प्लांटेड की पूरी मीडिया में बात छा गई। छात्रों का आंदोलन अब पीछे छूट चुका था।

आप की नाराजगी: राहुल गांधी के इस अचानक धरने से आम आदमी पार्टी बुरी तरह चिढ़ गई। आप नेता संजय सिंह ने मोर्चा संभालते हुए सीधा हमला बोला और कहा कि “कांग्रेस इस छात्र आंदोलन को कमजोर कर रही है।” उन्होंने कहा कि यह बीजेपी वालों की साजिश है।

2. बीच में ‘रावण’ की एंट्री और सियार वाला डर

उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाली विधानसभा चुनाव को देखते हुए कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन  कई लोगों को काफी सुकून देने वाला था। अखिलेश यादव, चंद्रशेखर आजाद रावण  बहुत तेजी से एक्टिव हुए। रावण ने जय भीम का नारा लगाते हुए बहुत साइलेंटली आंदोलन को रेगुलेट करने लगा। संसद मार्च के दिन ठीक-ठाक उन्होंने अपना प्रेजेंटेशन दिया।
अब स्थिति यह बन चुकी है कि हर कोई इस थाली में से अपनी रोटी सेकना चाहता है। नेताओं की इस आपसी खींचतान को देखकर तो यही लगता है कि कहीं ऐसा न हो जाए— “दो कुत्तों की लड़ाई में हड्डी ले गया सियार!”

3. ‘तिलचट्टा पार्टी’, NGO और FCRA का एंगल

इस पूरे घटनाक्रम में सिर्फ नेता ही नहीं, बल्कि कई पृष्ठभूमि की संस्थाएं भी शामिल हो चुकी हैं…

​प्लेटफॉर्म की उपलब्धता..

आरोप हैं कि ‘तिलचट्टा पार्टी’ ने इन राजनीतिक चेहरों और NGO को एक तैयार प्लेटफॉर्म मुहैया कराया। इस आंदोलन में गुंडे, मवाली, देशद्रोही भी शामिल हो गए हैं। यही वजह है कि दिल्ली में तोड़फोड़ जारी है। गंदे गंदे नारे, देश विरोधी नारे, सनातन विरोधी क्रियाकलाप, देश को नेपाल और बांग्लादेश बनाने की बात आंदोलन की गूंज बनने लगी।

​FCRA कानून का विरोध…

देश के कई NGO जो विदेशी फंडिंग (FCRA) के कड़े नियमों से परेशान हैं, वे छात्रों के इस कंधे का इस्तेमाल अपनी लड़ाई लड़ने के लिए कर रहे हैं।

​निजी हिंतों का मेला…

तरह-तरह की संस्थाएं और राजनीतिक दल छात्रों के हित का मुखौटा पहनकर अपने-अपने एजेंडे सेट करने में जुटे हैं।  छात्रों का शांतिपूर्ण आंदोलन हिंसात्मक हो गया है।

​4. सियासी संजीवनी की तलाश

चाहे राहुल गांधी हों या अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव, उद्धव ठाकरे, ममता बनर्जी या तेजस्वी यादव—सवाल यह उठ रहा है कि क्या इनमें से किसी को वास्तव में छात्रों के गिरते शैक्षणिक स्तर, नौकरियों या परीक्षाओं की धांधली से कोई मतलब है?


सच्चाई यह लगती है कि चुनाव दर चुनाव हाशिए पर धकेले गए ये सियासी दल इस छात्र आंदोलन के सहारे खुद को भारतीय राजनीति में दोबारा प्रासंगिक (Reinvent) करने की कोशिश कर रहे हैं।

इस डेमोक्रेटिक सेटअप में आंदोलन होना चाहिए। विरोध होना चाहिए। मार्च होनी चाहिए। समस्याओं के समाधान के लिए लड़ाई होनी चाहिए। छात्रों के साथ पूरा देश खड़ा है। किसी को विरोध नहीं है। मगर हिंसा नहीं, देश विरोधी काम नहीं. ..!

​छात्र आंदोलन अब केवल छात्रों का नहीं रहा। यह ‘हमार कि तोहार’ की ऐसी रार बन चुका है, जहां छात्र सिर्फ मोहरे हैं और बाजी मारने के लिए देश के दिग्गज राजनेता शतरंज की बिसात बिछाए बैठे हैं। देखना यह है कि छात्र अपने इस आंदोलन को इन ‘सियासी सियारों’ से बचा पाते हैं या नहीं!

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