* उमर अब्दुल्ला ने पूरा वंदे मातरम् गाया, कांग्रेस तिलमिला उठी!
Vande Mataram : जम्मू-कश्मीर की धरती पर 3 मिनट 10 सेकंड का एक वीडियो सामने आया और इसने दिल्ली के सियासी गलियारों में भूचाल ला दिया। श्रीनगर में फिल्म फेस्टिवल के मंच पर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उनके पिता फारूक अब्दुल्ला पूरे सम्मान के साथ ‘वंदे मातरम्’ के गायन में खड़े रहे। जिस गीत को लेकर कांग्रेस लगातार शर्तें और सीमाएं तय करने में जुटी थी, उसी गीत पर उसके सबसे अहम सहयोगी ने बिना किसी हिचकिचाहट के राष्ट्रभक्ति की मुहर लगा दी। परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस तिलमिला उठी और पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल को तुरंत मैदान में उतरकर अपने ही सहयोगी को ‘इतिहास’ और ‘सेक्युलरिज्म’ का पाठ पढ़ाना पड़ा।
सहयोगियों को नसीहत या अपनी फजीहत?
केसी वेणुगोपाल ने सोशल मीडिया पर गांधी, नेहरू, पटेल और बोस की दुहाई देकर उमर अब्दुल्ला को मर्यादा में रहने की परोक्ष हिदायत दी। कांग्रेस का तर्क है कि वंदे मातरम् का पूरा पाठ भारत की समावेशी सोच के खिलाफ है और इसके केवल पहले दो अंतरे ही गाए जाने चाहिए ताकि ‘सांप्रदायिक रंग’ न चढ़े।
लेकिन बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या कांग्रेस अपने राजनीतिक एजेंडे को बचाने के लिए राष्ट्रगीत को किस्तों में बांटने पर आमादा है? जब जम्मू-कश्मीर के एक मुस्लिम नेता को इस गीत के पूरे गायन से कोई ऐतराज नहीं, तो 10 जनपथ और कांग्रेस मुख्यालय को इसमें सांप्रदायिकता की बू क्यों आ रही है?
बीजेपी का सीधा वार: ‘कट्टरपंथियों के आगे नतमस्तक कांग्रेस’
इस घटनाक्रम ने बीजेपी को कांग्रेस पर सीधा और करारा प्रहार करने का मौका दे दिया है। बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने दो टूक शब्दों में कहा कि कांग्रेस अब पूरी तरह से कट्टरपंथियों के इशारे पर नाचने वाली कठपुतली बन चुकी है। बीजेपी का सवाल तीखा और सीधा है—जब उमर अब्दुल्ला को छह अंतरों से परहेज नहीं, तो कांग्रेस का यह अति-उदारवादी चोला आखिर किसके तुष्टीकरण के लिए है?
15 अगस्त की वो ‘गलती’ और कांग्रेस की जिद
विवाद की यह आग अचानक नहीं भड़की है। इसकी पटकथा 15 अगस्त को ही लिख गई थी, जब कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम् के बीच में ही सोनिया गांधी का हाथ रोकने का इशारा करता दिखा था। उस वीडियो के बाद चौतरफा घिरी कांग्रेस ने अपनी गलती सुधारने के बजाय अपनी जिद पर अड़ते हुए बकायदा प्रस्ताव पारित किया कि वह सिर्फ दो अंतरे ही गाएगी। लेकिन उमर अब्दुल्ला ने 15 अगस्त को भी साफ कह दिया था कि पूरा गीत गाया जाना चाहिए, और 7 सितंबर को श्रीनगर में उन्होंने वही करके दिखाया।
विपक्षी कुनबे में बिखराव: कांग्रेस का साथ किसने छोड़ा?
वंदे मातरम् के मुद्दे पर कांग्रेस अब पूरी तरह से अलग-थलग पड़ती नजर आ रही है। विपक्षी खेमे के बाकी दल कांग्रेस की इस हठधर्मिता से किनारा कर चुके हैं…
* नेशनल कॉन्फ्रेंस: उमर अब्दुल्ला ने पूरा गीत गाकर कांग्रेस की लाइन को खुलेआम खारिज कर दिया।
* शिवसेना (UBT): उद्धव ठाकरे की पार्टी बालासाहेब की प्रखर हिंदुत्ववादी विरासत के चलते कांग्रेस के इस स्टैंड के साथ खड़े होने का जोखिम कभी नहीं उठा सकती।
* समाजवादी पार्टी व टीएमसी: राष्ट्रीय स्तर पर पूरे गीत के बहिष्कार का खुला समर्थन करने से साफ बच रही हैं।
* एनसीपी (शरद पवार): कांग्रेस के इस आक्रामक विरोध से खुद को सुरक्षित दूरी पर बनाए हुए है।
सवाल जो देश पूछ रहा है..
क्या कांग्रेस ने ‘वंदे मातरम्’ के दो अंतरों की शर्त रखकर खुद को एक ऐसे अंधे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां से वापसी नामुमकिन है? जब श्रीनगर के लाल चौक के करीब गूंजता ‘वंदे मातरम्’ एक कश्मीरी नेता को स्वीकार्य है, तो फिर दिल्ली में बैठी कांग्रेस के सीने पर सांप क्यों लोट रहे हैं? सहयोगियों की बेरुखी और बीजेपी के तीखे हमलों के बीच यह साफ है कि राष्ट्रगीत पर अडिग रहने की इस सियासत ने कांग्रेस को अपने ही गठबंधन के भीतर बिल्कुल तन्हा कर दिया है।
