Houthis : मिसाइलों के आगे फुस्स हुआ ‘इस्लामिक नाटो’, हूतियों के बारूद ने उड़ाई ‘मक्का समझौते’ की धज्जियां

Bindash Bol

* सऊदी अरब में हूती का बड़ा हमला, एयरपोर्ट- तेल रिफाइनरी पर मिसाइलें दागीं, क्या पाकिस्तान-तुर्की बचाएंगे

Houthis : लाल सागर में आग उगल रहे यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर ऐसा जोरदार प्रहार किया है, जिसने रियाद से लेकर इस्लामाबाद और अंकारा तक सन्नाटा खींच दिया है। जिस ‘मक्का एग्रीमेंट’ और कथित ‘इस्लामिक नाटो’ का ढोल पीटकर सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान खुद को मुस्लिम दुनिया का नया सिकंदर बता रहे थे, उस कागजी शेर के पंजे हूतियों के पहले ही बड़े हमले में उखड़ गए हैं।

सऊदी के सीने पर दागीं मिसाइलें, दहल उठा तेल साम्राज्य

​ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने मंगलवार को सऊदी अरब के रणनीतिक और नागरिक ठिकानों पर मिसाइलों और ड्रोनों की बरसात कर दी। आभा, खमीस मुशैत, जाजान और नज्रान जैसे अहम शहर धमाकों से गूंज उठे।

* ​किंग खालिद एयर बेस और अभा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को सीधा निशाना बनाया गया।

* ​सरकारी तेल कंपनी अरामको की जाजान और आभा स्थित रिफाइनरियों और डिपो पर बारूद बरसा।

* ​हमलों में 73 नागरिक और सैन्यकर्मी घायल हुए, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं।

​सऊदी गठबंधन के प्रवक्ता तुर्की अल-मलिकी सोशल मीडिया पर आकर इसे ‘खतरनाक तनाव और गैर-जिम्मेदाराना हरकत’ बता रहे हैं। जवाब में जवाबी कार्रवाई की बातें तो हो रही हैं, लेकिन हकीकत यह है कि हूती लड़ाकों ने सऊदी संप्रभुता को खुलेआम चुनौती दे डाली है।

मक्का एग्रीमेंट की हवा निकली: कहां छिपा है तुर्की और पाकिस्तान?

​बड़ा सवाल यह है कि सऊदी अरब की रक्षा के नाम पर छाती पीटने वाले तुर्की और पाकिस्तान अब किस बिल में दुबके हैं?

​मक्का समझौते के तहत सामूहिक सुरक्षा का नियम तय हुआ था—”एक पर हमला, यानी सब पर हमला।”

* ​सऊदी अरब ने सोचा था कि अपनी दौलत से वह तुर्की की आधुनिक ड्रोन टेक्नोलॉजी और पाकिस्तान के ‘भाड़े के सैनिकों’ को अपनी ढाल बना लेगा।

* ​तुर्की ऑटोमन साम्राज्य का सुल्तान बनने के ख्वाब में शामिल हुआ।

* ​पाकिस्तान, जिसके पास अपनी अर्थव्यवस्था चलाने का दम नहीं, वह पेट्रो-डॉलर की भीख के बदले अपनी परमाणु ताकत और फौज की नुमाइश करने पहुंच गया।

​लेकिन जब हूतियों ने सऊदी की सरजमीं को छलनी किया, तब न एर्दोगन के बायरक्तार ड्रोन दिखे, न ही शाहबाज-मुनीर की ‘बहादुर’ फौज का कोई अता-पता मिला।

कागजी शेर साबित हुआ गठबंधन

​यह पहली बार नहीं है जब रियाद ने पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय और फिर 7 अगस्त को तुर्की-पाकिस्तान के साथ त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौते का जश्न मनाया हो। लेकिन जब हूती मिसाइलें तेल के कुओं पर गिरती हैं, तो यह तथाकथित नाटो सिर्फ बयानों में सिमट जाता है।

​क्या पाकिस्तान और तुर्की इसे केवल ‘सऊदी-हूती का आंतरिक झगड़ा’ कहकर पल्ला झाड़ लेंगे? अगर इस सीधे हमले पर भी गठबंधन की बंदूकें खामोश रहीं, तो साफ है कि मक्का एग्रीमेंट सिर्फ रियाद के पैसों को ऐंठने का जरिया था, जमीन पर इसकी औकात रद्दी के टुकड़े से ज्यादा कुछ नहीं। हूतियों ने साफ कर दिया है कि खाड़ी की जंग कागजी समझौतों से नहीं, बारूद के दम पर लड़ी जाती है।

TAGGED:
Share This Article
Leave a Comment