* “26 दिन भूखा रहा, 11 किलो वज़न खोया, दिमाग़-शरीर डैमेज होने की कगार पर पहुँच गया… और मुझे ही चरित्र प्रमाण-पत्र देना पड़ रहा है?”
Sonam Wangchuk : लद्दाख की शून्य से नीचे जमती हाड़-काँपा देने वाली ठंड से लेकर दिल्ली की झुलसा देने वाली चिलचिलाती धूप तक…
एक इंसान 26 दिनों तक अन्न के एक दाने के बिना, सिर्फ़ देश के छात्रों और युवाओं के हक़ के लिए घूँट-घूँट कर अपनी सांसें और अपनी सेहत गलाता रहा। लेकिन जब वह मौत के मुहाने से लौटकर अनशन समाप्त करता है, तो मरहम लगाने के बजाय समाज और सोशल मीडिया का एक धड़ा उसकी ‘निष्ठा’ और ‘नीयत’ पर सवाल उगाने लगता है।
गहरे दुख, टूटे हुए दिल और उबलते हुए आक्रोष के साथ सोनम वांगचुक ने जब अपना वीडियो संदेश जारी किया, तो उनके हर शब्द में दर्द छलकता हुआ महसूस हुआ।
“सफ़दरजंग अस्पताल को ‘नॉर्थ कोरिया’ बना दिया गया था…”
अपनी आपबीती सुनाते हुए वांगचुक ने बताया कि किस कदर उन्हें एक तरह की “कैद” में रखा गया था।
”हर चीज़ पर पाबंदी थी। कमरे से बाहर निकलने की इजाज़त नहीं थी, कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। अपने लद्दाखी रिश्तेदारों से मिलना तो दूर, अगर मैं नेपकिन पेपर पर कुछ लिखकर बाहर संदेश भेजने की कोशिश करता, तो उसे भी ज़ब्त कर लिया जाता। मेरी पत्नी गीतांजलि की हिम्मत और सूझबूझ थी जो उन्होंने रविवार को हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, तब जाकर कागज़ों पर मुझे आज़ाद नागरिक घोषित किया गया… पर ज़मीन पर हालात नहीं बदले।”
डील या मजबूरी? क्यों और किन शर्तों पर टूटा अनशन?
सोशल मीडिया पर उठ रहे तंज़ कि “केंद्रीय मंत्रियों के हाथों ही सूप क्यों पिया? क्या कोई सौदा हुआ था?” का जवाब देते हुए वांगचुक का गला भर आया। उन्होंने साफ़ किया कि वे कभी भी केंद्रीय मंत्रियों के हाथों अनशन नहीं तोड़ना चाहते थे। वे चाहते थे कि छात्र, लद्दाख के नेता और विपक्षी सांसद वहाँ मौजूद हों।
लेकिन जब, 15-20 सांसदों को अस्पताल के बाहर 3-4 घंटे खड़ा रखकर लौटा दिया गया, छात्राओं और लद्दाख के नेताओं को भगा दिया गया, और जंतर-मंतर पर निर्दोष छात्रों पर पुलिसिया कार्रवाई और FIR का ख़तरा मंडराने लगा…
तब वांगचुक ने अपनी ज़िद छोड़ना ही बेहतर समझा।
“मैंने मंत्रियों से साफ़ कहा…
जब तक जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे सीजेपी और छात्र-छात्राओं पर कोई FIR नहीं होगी, उन्हें जेलों या NSA में नहीं सड़ने दिया जाएगा और आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवज़ा मिलेगा, तब तक अनशन नहीं टूटेगा।अगर सौदा ही करना होता, तो 26 दिनों तक भूखे रहकर अपनी जान दांव पर कौन लगाता?”
“धिक्कार है ऐसे दिमाग़ों की उपज पर…”
जब शरीर में ज़रा सी जान लौटी और फ़ोन उठाया, तो शुभकामनाओं की जगह आरोपों की बौछार देखकर वांगचुक का दिल तार-तार हो गया।
रोष और बेबसी के मिले-जुले स्वर में उन्होंने कहा…
”धिक्कार है ऐसे देश पर, जहाँ ऐसे नीच ख़यालात जन्म लेते हैं! मैं फिर भी आपको दोष नहीं देता, क्योंकि आपको ज़मीनी हक़ीक़त और उन ख़ौफ़नाक हालात का अंदाज़ा ही नहीं है जिनमें मुझे रखा गया था। मैं अभी ठीक से उठकर खड़ा भी नहीं हो पा रहा हूँ और ये बातें दिल को चीर रही हैं।”
एक आख़िरी मार्मिक अपील…
“मरहम न लगा सको, तो नमक भी मत छिड़को” बात ख़त्म करते-करते सोनम वांगचुक ने बेहद भावुक होकर देशवासियों से एक गुज़ारिश की…
“आपकी राजनीति कुछ भी हो सकती है। आपकी बीजेपी, कांग्रेस या सोनम वांगचुक से खुंदक हो सकती है। लेकिन थोड़ी सी संवेदना… थोड़ा सा दिल में दर्द तो रखिए। अगर यह सब सहना और जान दांव पर लगाना गलत था, तो मैं कसूरवार हूँ, मुझे सजा दे दीजिए। शायद मैं दोबारा कभी ऐसी गलती न करूँ कि अपनी ज़िंदगी दिल्ली की सड़कों पर दांव पर लगाऊँ। बस इतना ही कहूँगा—बोलिए तो प्यार की भाषा बोलिए, वरना ख़ामोश ही रहिए… वही मेरे ज़ख़्मों पर मरहम का काम करेगा।”