अकु श्रीवास्तव
Protest : देश युवा पीढ़ी को देख रहा है। उसके आंदोलन को देख रहा है। आंदोलन की धार भी देख रहा है। 14 और 28 के ही नहीं 56 साल के जवान की ऊर्जा देख रहा है। उसकी भाषा को भी देख रहा है। पहले यह भाषा तू- तड़ाक तक ही सीमित थी। राजनीतिकों में जो आदर भाषा पहले हुआ करती थी , उसको तार- तार करने का सिलसिला नब्बे के दशक से शुरू हुआ था, अब वो जार- जार है। अब जो गाली-गलौच हो रही है, जन्तर – मन्तर पर पोस्टरों पर लिखी जा रही है, वीडियो में रिकार्ड कराई जा रही है, और खास तौर से युवा लड़कियों के साथ, ( जी हां, रिकार्ड कराई जा रही है) वह कम से मुझे तो शर्मिंदा करने वाली ही लगती है। हो सकता है कि मिलिनियल पीढ़ी जिसे जेन वाई ( 1981 से 1996 के बीच पैदा हुए लोग) कहा जाता है , मुझसे सहमत न हों, जेन जी ( 1997 से 2012 वाले) मेरी बातों को नकारे , लेकिन जेन अल्फा (2013 से 2024) तो मेरी चिंता को ” ओ शिट ” कहकर किनारे कर देना चाहते होंगे।
इस देश में विशाल जन आंदोलनों की नींव कांग्रेस और गांधी जी के समय पड़ी। उससे पहले 1857 की क्रांति हुई, जिसमें राजाओं, मुगल बादशाह, स्थानीय शासकों और उनकी फौजों की भागीदारी मुख्य थी। आम जनता गौण भूमिका में थी। क्षेत्रीय स्तर पर बहुत से आंदोलन हुए, जिनमें संन्यासी-फ़कीर विद्रोह (1763–1800), पाइका विद्रोह (1817) और वहाबी आंदोलन (1830–1860) जैसे कई प्रमुख जन, किसान और आदिवासी आंदोलन हुए थे। मगर ये देश के कुछ हिस्सों में सीमित थे। व्यापक और विशाल रूप नहीं ले पाए।

देश में बड़े जन आंदोलनों की नींव बंगाल विभाजन के खिलाफ उमड़े आक्रोश से पनपी। इसने कांग्रेस को पूरे देश में एक मजबूत संगठन के रूप में खड़ा किया। आंदोलन के तीव्र और निरंतर दबाव के कारण ब्रिटिश सरकार को अपना फैसला बदलना पड़ा। बंगाल विभाजन रद हुआ। यह इस आंदोलन की जीत थी। इसने पूरे देश में जनता को पहली बार उसकी ताकत का एहसास दिलाया।
जिन्हें याद नहीं है , उन्हें याद रखना चाहिए आज़ादी के आंदोलनों में स्वतंत्रता सेनानियों की भाषा अंग्रेजों के प्रति कभी भी गाली-गलौच वाली या अमर्यादित नहीं थी।
स्वतंत्रता सेनानी जानते थे कि गाली-गलौच करने से उनका नैतिक पक्ष कमजोर होगा। वे दुनिया के सामने यह साबित करना चाहते थे कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति अंग्रेजों की तुलना में अधिक सभ्य और न्यायप्रिय है।
भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और बटुकेश्वर दत्त जैसे युवा क्रांतिकारियों ने जब अदालतों में बयान दिए, तो उनकी भाषा बेहद दार्शनिक, तार्किक और गंभीर थी।क्रांतिकारियों के पर्चों (जैसे ‘द फिलॉसफी ऑफ द बॉम्ब’) में तीखी राजनीतिक आलोचना और ब्रिटिश नीतियों को उखाड़ फेंकने की बातें तो थीं, लेकिन किसी भी प्रकार की अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं था।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हजारों मुकदमों (जैसे अलीपुर बम केस, मेरठ षड्यंत्र केस) के अदालती रिकॉर्ड आज भी मौजूद हैं। इन दस्तावेजों में किसी भी स्वतंत्रता सेनानी द्वारा ब्रिटिश अधिकारियों या न्यायाधीशों के लिए अपशब्दों या गाली-गलौच के इस्तेमाल का कोई उल्लेख नहीं मिलता है। ब्रिटिश शासन को ‘क्रूर’, ‘शोषक’, ‘अत्याचारी’, ‘रक्तपिपासु’ या ‘शैतानी’ बताया गया लेकिन ये शब्द व्यक्तिगत गाली-गलौच की श्रेणी में नहीं आते। वो भी तब जब भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने विरोध में भाषाई मर्यादा और नैतिक श्रेष्ठता बनाए रखी, वहीं दूसरी तरफ ब्रिटिश हुकूमत का व्यवहार इसके ठीक उलट रहा था। भारत के कई बड़े क्लबों, होटलों और ब्रिटिश छावनियों के बाहर आधिकारिक तौर पर बोर्ड टंगे होते थे जिन पर लिखा होता था, “Indians and Dogs are not allowed” (भारतीयों और कुत्तों का प्रवेश वर्जित है)। अंग्रेजों की भाषा में औपनिवेशिक क्रूरता और नस्लीय अहंकार साफ झलकता था। याद दिलाने के लिए यह काफी होगा कि गांधी को अधनंगा फकीर कहा था।
लेकिन अब इस छात्र आंदोलन की तस्वीर एकदम बदली हुई है। पुलिस क्रूरता और उपद्रव पर सवाल उठाना जरूरी है। लेकिन अगर आप जन्तर – मन्तर चले गए तो वहां हो रही भाषाई गरिमा को तार- तार कहना भी छोटी संज्ञा होगी । छात्रों के आंदोलन को सत्ता में बैठे लोग और उनके समर्थक विदेशी फंडेड कह कर गरिमा कम कर रहे हैं तो छात्र भी भाषा की सभी मर्यादाएं भूलकर अश्लील शब्दों और गालियों से भरे पोस्टर सार्वजनिक रूप से लहरा रहे हैं। ऐसे पोस्टर लहराने और वीडियो बनवाने में छात्राएं भी पीछे नहीं हैं।
अब जब आंदोलन केवल सड़कों तक सीमित नहीं हैं, एक्स, इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स पर छात्र आंदोलनों से जुड़े डिजिटल वॉर में ट्रोलिंग, भद्दे मीम्स और गाली-गलौच वाली भाषा का स्तर काफी बढ़ गया है।
सवाल उठता है कि ये जेन जी है कैसा हो गया है? आपदा में अवसर ढूंढ़ने वाला ? आप इन पर लाठीचार्ज करने आएंगे, ये सामूहिक राष्ट्रगान शुरू कर देंगे। मैंने तीन साल पहले हुए आंदोलन के दौरान भी कहा था कि राष्ट्रीय ध्वज का जितना दुरूपयोग नजर आ रहा है, वो अब साफ दिख रहा है। हो सकता है कि बलात्कारी भी इस ध्वज के साथ कुछ कर ले।
सवाल यह भी है ही कि नई पीढ़ी की यह भाषा इतनी कैसे गिर गई। असल में युवाओं की भाषा को बर्बाद करने का काम एक दशक से ज्यादा समय से जारी है। आलोचना करने वालों को सोशल मीडिया पर ट्रोल करने और उनसे गाली गलौच से शुरू हुआ यह सिलसिला अब एक्स, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर बलात्कार की धमकियां तक बदल गया है। सोशल मीडिया में सरकार समर्थक और सरकार विरोधी खुलकर गाली-गलौच करते रहे। इसमें आग में घी डालने का काम फिल्मों ने किया।” गैंग आफ वासेपुर” फिल्म ने तो खुल कर सब कुछ किया । और तो और इसके अभिनेता मनोज बाजपेयी और एक और अभिनेता ने तो इसके प्रोमोशन के वीडियो में गालियों की प्रतियोगिता तक कर ली। हाल ही की सबसे बड़ी हिट फिल्म ‘धुरंधर ‘ में जो भाषा इस्तेमाल हुई, उसके समाज पर असर का आकलन किए बिना ऐसी फिल्मों का कुछ राजनीतिक दलों ने खुला समर्थन किया।
भाषा का सबसे बुरा हाल किया स्टैंडअप कॉमेडियन्स ने। उन्होंने रिश्तों को भी तार-तार किया। अदालतों ने फटकार भी लगाई मगर कोई असर नहीं पड़ा। घरों में जब हस्तमैथुन की बात पर मां- बाप , भाई – बहन सब हंसेंगे तो क्या आप उम्मीद आप करते हैं।
समाजशास्त्र का छात्र होने के नाते मैंन कई जेन जी से बात की । उनका मानना है कि सबसे बड़ा कबाड़ा मोबाइल क्रांति ने किया। मोबाइल पर उपलब्ध और चर्चित साम्रगी ने इन्हें भी कूल दिखाने के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल करने को प्रोत्साहित किया। कोरोना काल से शुरू यह सिलसिला अब एक पीढ़ी आगे तक और तेजी से पहुंच चुका है। अब परिवार वालों ने भी थक हार कर इसे स्वीकार कर ही लिया है। बल्कि कई बार तो 40 वाले मां- बाप भी बच्चों के सामने कूल दिखने के लिए ऐसी भाषा के कुछ अंश स्वीकार कर खुद भी बोलने लगे हैं। ..और यह एक तथ्य भी सामने आया है कि जो बच्चे परिवार से दूर रहते हैं , उनकी भाषा का यह एक नियमित हिस्सा है । लड़कियां इस मामले में अपने आपको लड़कों से कम नहीं होने को साबित करने के लिए ऐसा कर रही हैं। पहले हम सबके स्कूल बैग देखे या जांचे जाते थे। अब मां- बाप को उनके मोबाइल देखने तक की फुर्सत नहीं है। सच तो यह है कि पुरानी कहावत बच्चे उम्र के बाद बढ़े होते हैं, बेमानी हो गई है।
लेकिन यह यह है कि इस आंदोलन में देश के प्रधानमंत्री और उनके निकटस्थ संबधियों को लेकर जिस तरह से आंदोलन में सार्वजनिक रूप से पोस्टर लहरा कर गालियां दी जा रही हैं, वह अशोभनीय है। आंदोलन वैचारिक भूमि में और नैतिक मूल्यों के साथ होना चाहिए। उसमें भाषाई गरिमा भंग और उपद्रव स्वीकार्य नहीं है।