* बॉलीवुडिया रुमानियत बनाम भारतीय यथार्थ: अनुशासन ही सफलता का एकमात्र मार्ग
कुमार पद्मनाभ
Protest : भारतीय में सिनेमा का प्रभाव बहुत गहरा है और फिल्में केवल मनोरंजन का साधन न होकर धीरे-धीरे जनमानस की सोच, प्राथमिकताओं और सामाजिक मूल्यों को दिशा देती हैं। लेकिन जब कोई फिल्म एक अत्यंत अव्यवहारिक, अनुशासनहीन और अराजक चरित्र को नायक बनाकर प्रस्तुत करती है, तो समाज में एक बेहद खतरनाक मानसिकता जन्म लेती है। आमिर खान की चर्चित फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ और उसमें फुंसुक वांगडू के चरित्र का यदि निष्पक्ष और व्यावहारिक विश्लेषण किया जाए, तो यह कड़वी सच्चाई परत-दर-परत सामने आ जाती है।
फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ में जिस चरित्र को महान प्रतिभा और प्रेरणा के स्रोत के रूप में पेश किया गया, वास्तव में उसका आचरण भारतीय मूल्यों और व्यावहारिक जीवन के बिल्कुल विपरीत था। भारतीय संस्कृति और समाज में शिक्षकों को सर्वोच्च स्थान दिया गया है, जो केवल ज्ञान ही नहीं देते बल्कि जीवन को अनुशासन में ढालने का संस्कार भी प्रदान करते हैं। इसके विपरीत, फिल्म का तथाकथित हीरो ताउम्र अपने ही प्रोफ़ेसर और शिक्षा प्रणाली को मूर्ख, बेवकूफ और दोयम दर्जे का साबित करने में लगा रहता है। वह शिक्षकों का सम्मान करने के बजाय उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास करता है। फिल्म के एक प्रमुख दृश्य में वही चरित्र अंधेरे में चोरी-छिपे जाकर परीक्षा का तैयार पेपर निकालता है और गलत तरीके से पेपर लीक करवाता है, जिसके बल पर वह टॉप कर जाता है।
इतना ही नहीं, जो छात्र दिन-रात एक करके, अनुशासित रहकर कक्षा में मेहनत से पढ़ाई करते हैं, फिल्म उनका मज़ाक उड़ाती है। यह स्थापित करने की कोशिश की जाती है कि जो निष्ठा से पढ़ाई में लीन है वह मूर्ख है, और जो क्लास बंक करता है, शिक्षकों को रिस्पेक्ट नहीं देता और चीटिंग करता है, वही असली ज्ञानी है। फिल्म के अंत में इसी अराजक चरित्र के पास चार सौ पेटेंट यानी आविष्कार बिना किसी कठोर साधना, बुनियादी पढ़ाई, प्रयोगशाला या अनुशासन के आसमान से टपक पड़ते हैं। भारतीय जनता ने बिना सोचे-समझे इस अव्यवहारिक और नकारात्मक चरित्र पर ताली बजाई, जिसने युवाओं के दिमाग में यह भ्रम घोल दिया कि नियम तोड़ना ही असली प्रतिभा है।
अब इस फिल्मी रूमानी दुनिया से बाहर निकलकर भारत के असली धरातल पर देखने की आवश्यकता है। भारत एक अरब चालीस करोड़ से अधिक आबादी वाला एक विशाल देश है, जहाँ सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। इस विशाल जनसंख्या वाले देश में यदि किसी भी युवा को सफलता पानी है, तो उसे अत्यंत कठिन और गलाकाट प्रतिस्पर्धा को पार करना ही पड़ेगा। यहाँ केवल वही आगे बढ़ सकता है जो निरंतर कड़ी मेहनत और समर्पण के साथ अपनी किताबों में लीन रहता है। बिना प्रतिस्पर्धा पास किए और बिना घोर परिश्रम के भारत में आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा प्राप्त करना पूरी तरह असंभव है।
फिल्म में एक और बड़ा उपदेश दिया गया था कि अपने पैशन के पीछे भागो और पढ़ाई छोड़कर वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर बन जाओ। लेकिन यह ‘फॉलो योर पैशन’ और काम न करने की सोच मूल रूप से यूरोपीय वामपंथी सामाजिक-आर्थिक मॉडल से प्रेरित है, जो भारत के संदर्भ में अत्यंत घातक है। जब दुनिया में औद्योगिक क्रांति हो रही थी, तब भारत अंग्रेजों का गुलाम था। हमारी अर्थव्यवस्था और संसाधनों को बेरहमी से लूटा गया, जिसके कारण हम उस दौर में औद्योगिक और आर्थिक प्रगति नहीं कर पाए। इसके विपरीत, यूरोपीय देशों ने समय पर औद्योगिक क्रांति की, उनके वैज्ञानिकों और उद्योगपतियों ने प्रचंड धन और समृद्धि का निर्माण किया।
उसी आर्थिक समृद्धि के बलबूते यूरोपीय देशों ने अपने नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा दी, जहाँ सरकारें मुफ़्त चिकित्सा, मुफ़्त स्वास्थ्य सेवा, मुफ़्त शिक्षा, बेरोजगार रहने पर बेरोजगारी भत्ता और साठ की उम्र के बाद पेंशन देती हैं। वहाँ कोई व्यक्ति अगर नौकरी न करे या केवल वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी जैसे अनिश्चित करियर को चुने, तो भी वह भूखा नहीं मरेगा क्योंकि सरकार उसे संभाल लेती है। लेकिन भारत के पास आज ऐसे असीमित संसाधन नहीं हैं कि वह करोड़ों बेरोजगारों को मुफ्त में बैठकर खिला सके। हमारे देश के पास बुनियादी ढाँचे, राष्ट्रीय सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा को मजबूत करने जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण काम हैं और हमारे पास मुफ्त बेरोजगारी भत्ता बांटने की आर्थिक सक्षमता नहीं है। ऐसे में भारत जैसे देश में युवाओं को पढ़ाई-लिखाई छोड़कर वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर बनने के लिए प्रेरित करना उन्हें सीधे आर्थिक तबाही और भुखमरी की ओर धकेलने जैसा है, क्योंकि वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी जैसे पेशों में पूरी दुनिया में गिने-चुने कुछ सौ पद ही होते हैं।
इसी सिनेमाई अराजकता का नतीजा आज हमें देश की सड़कों और आंदोलनों में दिखाई देता है। हर कक्षा या समाज में लगभग बीस प्रतिशत ऐसे अराजक तत्व होते हैं, जिन्हें न तो पढ़ाई-लिखाई से कोई मतलब होता है और न ही देश की आर्थिक व सामाजिक प्रगति में कोई योगदान देना होता है। उनका एकमात्र मकसद केवल विरोध करना और अराजकता फैलाना होता है, क्योंकि उनके पास करने के लिए कोई रचनात्मक काम नहीं है। हाल ही में नीट परीक्षा के नाम पर जंतर-मंतर और सड़कों पर जो प्रदर्शन और हंगामा देखने को मिला, वह इसी मानसिकता का उदाहरण है।
जो परीक्षार्थी नीट के लिए वास्तव में गंभीर और समर्पित हैं, जिन्हें अपनी प्रतिभा पर भरोसा है, वे कभी ऐसे आंदोलनों में समय व्यर्थ नहीं गँवाते। अगर किसी कारणवश परीक्षा रद्द भी हो जाती है, तो वे रोने या सड़कें जाम करने के बजाय शांत मन से अपने घर में बैठकर अगली परीक्षा की तैयारी में जुट जाते हैं। अपनी मेहनत और प्रतिभा से नीट क्रैक करने वाला कोई भी छात्र कभी इन हंगामों में शामिल नहीं होगा, क्योंकि उसे पता है कि आंदोलनों के चक्कर में समय गँवाने से उसका भविष्य नहीं बनेगा। दावे के साथ कहा जा सकता है कि आंदोलन की आड़ में हंगामा कर रहे लोगों में से एक भी छात्र ऐसा नहीं है जो अपनी योग्यता से नीट परीक्षा पास करने के लायक हो। इनमें से अधिकांश तो उम्र और आचरण से परीक्षार्थी भी नहीं लगते। यह वही ‘थ्री इडियट्स’ वाली मानसिकता के लोग हैं जो मेहनत को बेवकूफी समझते हैं और हर चीज़ में शॉर्टकट, चीटिंग या अराजकता के जरिए सफलता की उम्मीद करते हैं।
देश का निर्माण और किसी भी युवा का भविष्य फिल्मी रूमानी विचारों, अव्यवहारिक पात्रों के महिमामंडन, या सड़कों पर उपद्रव मचाने से नहीं बनता। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में यदि युवाओं को आत्मनिर्भर, सक्षम और प्रतिष्ठित बनना है, तो उन्हें कड़ी मेहनत, नियमों का पालन, शिक्षकों का सम्मान और औपचारिक शिक्षा के कड़े अनुशासन को स्वीकार करना ही पड़ेगा। अब समय आ गया है कि हम बॉलीवुडिया भ्रामक सोच से बाहर निकलें, देश के आर्थिक यथार्थ को पहचानें और अराजकता के बजाय केवल और केवल योग्यता व निष्ठा को अपना मार्गदर्शक बनाएं।