Protest : ​बेदिल व्यवस्था में आमरण अनशन बेमानी

Nishikant Thakur

Protest : आजादी के बाद विभिन्न जन कल्याण के मुद्दे पर महात्मा गांधी सहित देश के तमाम प्रमुख सामाजिक एवं राजनीति के क्षेत्र की हस्तियों ने आमरण अनशन किए हैं। उनमें कुछ ने तो मुद्दे को जीवित रहते हुए देखा, लेकिन कुछ ने अपनी बातों को मनवाने में शरीर का ही त्याग कर दिया। सबसे पहले आजादी के बाद सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लोगों का हृदय परिवर्तन करने हेतु गांधी जी एक अनिश्चित अवधि के लिए उपवास करने का निर्णय लेते हैं। उनके स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती चिंता के बीच शांति के लिए संकल्प लेने के प्रयासों में तेजी लाई जाती है। छह दिन के उपवास के बाद 18 जनवरी को दोपहर 12 बजकर 25 मिनट पर गांधी जी उपवास तोड़ देते हैं। मद्रास प्रेसिडेंसी से तेलुगु भाषी लोगों के लिए एक अलग राज्य (आंध्र प्रदेश) बनाने की मांग को लेकर 58 दिनों तक पोटी श्रीरामुलु ने 1952 में आमरण अनशन किvया था। 58वें दिन इनके निधन के कारण देशभर में व्यापक आंदोलन हुआ, जिसके परिणामस्वरूप केंद्र सरकार को झुकना पड़ा। चंडीगढ़ को पंजाब का हिस्सा बनाने की मांग को लेकर दर्शन सिंह फेरुमान ने 1969 में 74 दिनों का ऐतिहासिक अनशन किया था अनशन के दौरान ही वर्ष 1969 में उनका निधन हो गया था। 2018 में पर्यावरणविद प्रो. जीडी. अग्रवाल (स्वामी सानंद) ने गंगा नदी की रक्षा और उसे स्वच्छ रखने के लिए 111 दिनों तक अनशन किया था। अनशन के दौरान ही अक्टूबर 2018 में उनका निधन हो गया था। मणिपुर से ‘सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम’ हटाने की मांग को लेकर इरोम चानु शर्मिला ने 16 वर्षों तक अनशन किया था, जो दुनिया के सबसे लंबे अनशनों में से एक है।

और अब… लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और अन्य मांगों को लेकर 2024 में और बाद में 2026 में भी पर्यावरणविद सोनम वांगचुक ने कई दिनों तक आमरण अनशन किया है, लेकिन 18 जुलाई 2026 को दिल्ली के जंतर मंतर पुलिस द्वारा उन्हें अस्पताल में जबरन भर्ती कराए जाने तक उनके उपवास को 21 दिन हो गए थे। इसके अतिरिक्त जिन्होंने आमरण अनशन के बल पर जनहित के लिए अपनी बातों को सरकार द्वारा मानने के लिए मजबूर किया वे थे जयप्रकाश नारायण, अन्ना हजारे, स्वामी अग्निवेश और मेधा पाटकर। फिलहाल सोनम वांगचुक जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे हैं। उनके बारे में बताया जाता है कि वह लद्दाख के प्रसिद्ध इंजीनियर, शैक्षिक सुधारक और पर्यावरण कार्यकर्ता हैं, ‘सेकमोल’ संस्था के संस्थापक हैं और उनके ‘आइस स्तूप’ नवाचार ने जल संरक्षण में बड़ी सफलता दिलाई है। उन्हें लोकप्रिय फिल्म ‘3 इडियट्स’ के मुख्य किरदार ‘फुंसुख वांगडू’ की वास्तविक प्रेरणा माना जाता है।

उनके जीवन की उपलब्धियों को देखें तो मुख्य कार्यों में 1988 में लद्दाख के छात्रों के लिए सेकमोल की स्थापना है। यह संस्थान व्यावहारिक और जीवनोपयोगी शिक्षा देने के लिए जाना जाता है। लद्दाख जैसे ठंडे रेगिस्तानी इलाकों में पानी की कमी को दूर करने के लिए उन्होंने ‘आइस स्तूप’ तकनीक विकसित की है, जिसके जरिये सर्दी के मौसम में पानी को जमा कर कृत्रिम ग्लेशियर बनाए जाते हैं। सोनम वांगचुक लद्दाख आंदोलन करके संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और राज्य का दर्जा दिलाने जैसे मुद्दों पर सक्रिय रूप से आवाज उठाते रहे हैं। पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर आमरण अनशन पर थे, जिसका मुख्य उद्देश्य इसी वर्ष मई माह में हुए नीट पेपर लीक और शिक्षा प्रणाली में कुप्रबंधन के खिलाफ केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग था। वे युवाओं के संगठन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के आंदोलन का समर्थन कर रहे थे। हालांकि, लगातार 21 दिनों तक अनशन के कारण स्वास्थ्य बिगड़ने पर 18 जुलाई को पुलिस ने उन्हें जबरन अस्पताल में भर्ती करा दिया है।

इससे पहले 2024 में, वांगचुक लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर भी लंबे समय तक अनशन कर चुके हैं।
घटनाक्रम में बताया जा रहा है कि तीन हफ्ते के अनशन के कारण वांगचुक के सेहत पर गंभीर असर पड़ा है। सफदरजंग अस्पताल में भर्ती होने के बावजूद उन्होंने अनशन जारी रखा है। उनकी पत्नी गीतांजलि ने मांग की है कि परिवार और पिछले 21 दिनों से उनकी निगरानी कर रहे डॉक्टरों की सहमति के बिना उन्हें मुंह से या नस के जरिये कोई दवा या तरल पदार्थ न दिया जाए। सफदरजंग अस्पताल की ओर से समय समय पर जारी किए जाने वाले हेल्थ बुलेटिन के अनुसार दिल्ली पुलिस सोनम वांगचुक को सुबह 7.40 बजे लेकर अस्पताल पहुंची। वह पूरी तरह होश में थे और सजग थे। वांगचुक के निजी डॉक्टर नितिन दिघे ने दावा किया है कि उन्हें और उनके वकील को वांगचुक को मिलने नहीं दिया जा रहा है और परिवार की ओर से मांग करने पर भी जांच रिपोर्ट अस्पताल द्वारा उपलब्ध नहीं कराई जा रही है।

पुलिस की इस कार्यवाही को विपक्षी दलों ने तानाशाही करार देते हुए वर्तमान केंद्रीय सरकार पर लोकतंत्र पर और संविधान की मर्यादा को भंग करने का आरोप लगाया है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और इंडिया गठबंधन के दलों ने कहा है कि वर्तमान सरकार बार बार लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलते हुए संविधान के प्रति अपना अनादर दिखाया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोनम वांगचुक को अनशन स्थल से हटाने की कार्यवाही को गलत ठहराते हुए कहा है कि छात्रों के मुद्दे उठाने वालों को कोई भी ताकत रोक नहीं सकती। नेता प्रतिपक्ष ने एक्स पर लिखा है ‘असत्य और हिंसा मोदी सरकार के दो मुख्य सिद्धांत है। वांगचुक को जंतर मंतर से हटाना, जबकि वे अहिंसक भूख हड़ताल पर थे।’ कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मोदी सरकार पर कई आरोप लगाते हुए कहते हैं, यह तानाशाही सरकार पर एक काला धब्बा है। वह कहते हैं कि एक सौ ग्यारह दिन तक मां गंगा को बचाने के लिए आमरण अनशन पर बैठे प्रो. जीडी. अग्रवाल हों या महिला पहलवान या दलित किसान या फिर पेपर लीक की बलि चढ़े पच्चीस बच्चे… इस तानाशाह सरकार ने किसी को नहीं छोड़ा। इनकी नजर में कोई भी अगर आवाज उठाता है, तो वह राष्ट्र विरोधी और परजीवी है। सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे कहते हैं कि सरकार सोनम वांगचुक से वार्ता करे।

वहीं, भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शाहनवाज हुसैन ने कहा है कि हाईकोर्ट ने वांगचुक के स्वास्थ्य की उचित देखभाल का निर्देश दिया था। शाहनवाज कहते हैं कि स्वास्थ्य की निगरानी के लिए वांगचुक को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। विपक्ष इसे बेवजह तूल देना चाहता है और उनकी तो मंशा ही यही है कि वांगचुक की तबियत बिगड़े और इस मुद्दे को राजनीतिक तमाशा बनाया जा सके। अब इस तरह के आरोप—प्रत्यारोप तो विपक्ष और सत्तापक्ष द्वारा तो हर मामले में लगाए ही जाते रहे हैं और आगे भी लगाए जाते रहेंगे, लेकिन अब प्रश्न यह है कि कोई सरकार की नीतियों के विरुद्ध जीत सकता है? इस बात का उत्तर कोई मध्यस्थ बनकर कैसे दे सकता है कि किसकी बात सही है, सत्ता की या विपक्ष की। सत्ता समर्थकों का कहना है कि क्या शिक्षामंत्री इस्तीफा दे देने से मामला शांत हो जाएगा और आत्महत्या करने वालों का जीवन लौट आएगा, लेकिन यह भी उसके प्रत्युत्तर में कहा जा रहा है कि यदि जानमाल के नुकसान या छात्रों के जीवन को गर्त में डालने के बाद भी प्रशासकीय जिम्मेदारी का निर्वहन करने वालों को सजा नहीं दी जाएगी ,तो फिर उन्हें  इतनी बड़ी जिम्मेदारी क्यों  सौंपी गई है? ऐसे में तो उस पद को ही समाप्त कर दिया जाना चाहिए। छात्र , सोनम वांगचुक की जीत तो सरकारी रवैये के कारण संभव नहीं लगती, क्योंकि सरकार के अंदर क्या खिचड़ी पक रही है, इसकी जानकारी बाहर नहीं आती, लेकिन देशभर में यह संदेश तो चला ही गया है कि सरकार के समक्ष उसकी ताकत के सामने किसी की चल नहीं सकती, पर परिणाम देखने के लिए प्रतीक्षा तो करनी ही पड़ेगी। और हां, अब सरकारी खिचड़ी पक गई ; क्योंकि सोनम वांगचुक का अनशन तुड़वा दिया गया है , लेकिन अनशन जारी रहेगा ।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)

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