Youth Power : संसद का मानसून सत्र बिना किसी ठोस मुद्दों पर बहस के बाद खत्म हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले की प्राचीर से अपने कार्यकाल की तेरहवीं बार झंडारोहण भी कर लिया। उनके तेरह वर्ष के कार्यकाल की समीक्षा भी विशेषज्ञों ने करना शुरू कर दिया है। सत्तापक्ष उनके कार्यकाल की भूरि—भूरि प्रशंसा करेंगे और विपक्ष तरह—तरह की कमियों को गिनाते हुए आलोचना को आगे बढ़ाते रहेंगे। यह केवल आज की बात नहीं, प्रारंभिक दिनों से ऐसा होता आया है। यदि सत्तारूढ़ अपने किए का प्रचार नहीं करेंगे तो फिर अगले चुनाव में समाज के सामने किस मुंह से जाएंगे। अपनी बात को किस तरह महिमामंडित करते हुए पेश करेंगे, ताकि समाज आकर्षित हो। वहीं, विपक्ष भी कहेगा, लेकिन वह अपनी तरह से उस बात को रखेंगे, ताकि समाज को संदेश मिले कि जो कुछ सत्तारूढ़ द्वारा कहा जा रहा है, उसे केवल दिवास्वप्न ही मानना चाहिए, सच नहीं। इन्हीं सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच फंसकर समाज पिसता रहता है, उनका भला नहीं हो पाता। दरअसल, राजनीतिज्ञ चाहता भी नहीं है कि समाज जागरूक हो, पढ़लिख कर अपने तर्क से उनकी बातों पर तर्क करे, सवाल पूछ सके। कोई भी दल सत्तारूढ़ रहा हो, सबका हाल यही है; क्योंकि नागरिक यदि पढ़—लिख गया, तो उन समझदार नेताओं की रैली में कौन जाएगा, उनके लिए झंडा कौन उठाएगा? इसलिए समाज का वह वर्ग, जिन्हें समाज को साथ लेकर आगे बढ़ाने का, हमारा संविधान अधिकार देता है, अपने सत्ता के रास्ते को इस तरह खुला और साफ छोड़ देंगे?
लेकिन, हां! अब एक ऐसा युवा वर्ग देश को मिल गया है जो ऐसे राजनीतिज्ञों से सवाल पूछने में अपने को सक्षम मानता है। वह पूछने लगा है, सवाल करने लगा है। और, इन युवाओं की हिम्मत तो देखिए, अपनी एकजुटता से सत्ता को झुकाने में सफल भी रहा है। पिछला उदाहरण देश के शिक्षामंत्री का ही लिया जा सकता है। जब युवा, जिन्हें ‘जेन-जी’ कहा जा रहा है, उन्होंने देश की राजधानी सहित कई राज्यों में एकजुटता दिखाते हुए लंबे संघर्ष के बाद सरकार से यह मनवाने के लिए बाध्य कर दिया कि शिक्षामंत्री अपने पद की गरिमा का पालन नहीं कर रहे हैं और जिसके चलते कई होनहार छात्रों को आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा। सरकार यह समझती रही कि इस तरह के मामले आते—जाते रहते हैं, इसके लिए मंत्री से उनके नकारापन के कारण इस्तीफा नहीं लिया जा सकता। सच तो यह है कि वर्तमान सत्तारूढ़ सरकार इतनी मजबूत थी कि उसे कभी इसकी कोई परवाह नहीं रही कि युवा कितनी मेहनत से अपने जीवन को संवारने के लिए पढ़ाई करते हैं, लेकिन एक पल में ही कुछ शिक्षा के दलालों द्वारा उनका सपना चूर—चूर कर देते हैं। यदि नींव मजबूत हो, तो ढांचागत निर्माण सुदृढ़ और टिकाऊ होता है, इस मामले में शिक्षामंत्री के बचाव के लिए यह कहा जाता रहा था कि कुछ शिक्षा माफियाओं ने पेपर लीक कराया, इसमें मंत्री का क्या दोष? फिर वही बात; यदि नींव मजबूत हो तो डाल और पत्ते भी मजबूत और हरे—भरे होंगे। यहां यह भी कहा जा सकता है यदि सरकार दूरदर्शी होती तो जब पेपर लीक का मामला उठ रहा था, उसी समय शिक्षामंत्री का इस्तीफा ले लेना चाहिए; क्योंकि तत्कालीन शिक्षामंत्री एक राष्ट्रीय समाचार पत्र को दिए अपने साक्षात्कार में माफी मांग ली थी।
सरकार को यह विश्वास ही नहीं था कि छात्रों का आंदोलन इतना उग्र हो जाएगा कि उसे झुकना पड़ जाएगा। यदि पीछे जाएं तो 1974 के बिहार में हुए छात्र आंदोलन को भुलाया नहीं जा सकता जिसने आगे चलकर सरकार का तख्ता पलट दिया । उससे भी पीछे जाएं तो राजाराम मोहन राय को भी याद करना ही पड़ेगा, जिन्होंने अपनी 16 वर्ष की आयु में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ ऐसा आंदोलन चलाया कि बिटिश सरकार को झुकना पड़ा। राय ने सती प्रथा, बाल विवाह, जातिगत भेदभाव और धार्मिक रूढ़िवादियों जैसी प्रथाओं का कड़ा विरोध किया। उनकी सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि सती प्रथा के विरुद्ध चलाया गया अभियान था जिसमें अंततः गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक के नेतृत्व में बंगाल में सती विनियमन 1829 को लागू करने में योगदान दिया। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों, जिनमें संपत्ति और शिक्षा का अधिकार शामिल है, की भी वकालत की। उन्हें भारतीय ‘पुनर्जागरण का जनक’ कहा जाता है। सरकार के प्रति युवाओं का आक्रोश यहां तक पहुंच गया है कि हैदराबाद की नलसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के छात्रों ने एकजुटता दिखाते हुए देश के प्रधान न्यायाधीश के हाथों सर्टिफिकेट लेने से मना कर दिया। बात यहीं नहीं रुकी; क्योंकि उसे तूल देते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया के आदेश पर सर्वोच्च न्यायालय ने नाराजगी जताई। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि यह उनके और छात्रों के बीच की बात है, बीसीआई दखल देने वाला कौन होता है! छात्रों को विरोध करने का अधिकार है। बता दें कि राज्य बार काउंसिलों को नालसर के छात्रों को वकील के तौर पर नामांकित करने के आदेश को लेकर इंटरनेट मीडिया पर हंगामा मच गया था, लेकिन कुछ ही घंटों बाद बीसीआई को यह आदेश वापस लेना पड़ा। विश्लेषक इसे युवा जागरूकता की ताकत कहते हैं। ज्ञात हो कि कॉकरोच जैसे व्यंग्यात्मक शब्द का प्रयोग युवाओं के लिए देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ही किया गया था।
अब सीजेपी ने अपनी कोर टीम की घोषणा करके कहा है कि वे अब देश के विभिन्न शहरों में आंदोलन को गति देंगे। पर यह क्या! जिस पेपर लीक के लिए देश भर में इतना बड़ा आंदोलन हुआ, केंद्रीय शिक्षामंत्री को त्यागपत्र देना पड़ा, वह पेपर लीक तो अब भी हो रहा है। खबरों की मानें तो एनटीए फिर से सवालों के घेरे में है और यूजीसी और नेट में भी गड़बड़ी हुई है। इसके चलते नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने 16 अगस्त रविवार के देर शाम अंग्रेजी, कॉमर्स और समाजशास्त्र जैसे तीन विषयों की परीक्षा रद्द कर दी है। एनटीए ने इन तीनों विषयों की परीक्षा नौ और दस सितंबर को करने के ऐलान किया है। इन विषयों के उम्मीदवारों से कोई अतिरिक्त परीक्षा शुल्क नहीं लिया जाएगा। परीक्षा का शहर और केंद्र, एडमिट कार्ड आदि की जानकारी एनटीए की आधिकारिक वेबसाइट पर दी जाएगी। इन विषयों की परीक्षा को दुबारा कराए जाने का जो कारण बताया जा रहा है वह यह कि प्रश्न पत्रों में मिली ढेरों गलतियों व दोहराव है। अब प्रश्न यह भी उठता है कि इसमें छात्रों का क्या कसूर, जिनका भविष्य अंधकार से घिर गया है। यदि इस पर आंदोलन देश भर में होता है, तो फिर दोषी किसे माना जाएगा? क्या ऐसे व्यक्तियों को सजा दिलाने का कोई कानूनी प्रावधान हमारे यहां नहीं है? यदि है तो सबसे पहले इसकी ही जांच हो कि किनकी गलती अथवा किन माफियाओं के कारण छात्रों के साथ बार—बार ऐसा किया जा रहा है। युवा तो उत्तेजित होंगे ही; क्योंकि आने वाले दिनों में किसी छात्र का भविष्य कितने संघर्षों से गुजरने वाला है, इसकी कल्पना से ही मन रोमांचित होने लगता है। अब तक तो यही माना जाता रहा है कि युवाओं के अधिकारों और उनका भरोसा जीतनेवाला कोई राजनीति दल आगे नहीं आता ।
लेकिन, अब प्रधानमंत्री ने स्वयं इसका बीड़ा उठाते हुए लालकिले की प्राचीर से ऐलान किया है कि छात्रों को मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग और एक करोड़ युवाओं को एआई प्रशिक्षण दिया जाएगा। लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री ने अपने सवा घंटे के संबोधन में पचास से अधिक बार युवाओं का उल्लेख किया और कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। इस पहल का उद्देश्य मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों के बच्चों पर से महंगे कोचिंग संस्थानों की भारी फीस का बोझ कम करना है। देश के बेहतरीन शिक्षकों के संसाधनों और डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर को मिलाकर एक मजबूत नेटवर्क तैयार किया जाएगा। प्रधानमंत्री ने वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के संकल्प को पूरा करने में देश के युवाओं और छात्रों की भूमिका को सबसे अहम बताया। इन घोषणाओं के विश्लेषक कई तरह के कयास लगा रहे हैं। वे कह रहे हैं कि युवा के आंदोलन से उनके अंदर डर बैठ गया है। यदि प्रधानमंत्री युवाओं के लिए इतना कुछ करना चाहते हैं, तो इसकी घोषणा पहले क्यों नहीं की गई? यदि ऐसा पहले किया गया होता तो इतने छात्रों को आत्महत्या करने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। लेकिन हां, देर से ही सही, सरकार की समझ में यह बात तो आती जा रही है कि युवाओं की शक्ति क्या होती है और जब अपने भविष्य को अंधकारमय देखते हैं तो वे फिर किसी हद को पार करने से बाज नहीं आते। फिर भी प्रधानमंत्री को हस्तक्षेप करना पड़ा जिसमें युवाओं को भरोसा दिलाया है कि उनके साथ न्याय होगा, अब युवाओं को उनके इस भरोसे पर विश्वास तो करना ही पड़ेगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)
लेकिन, हां! अब एक ऐसा युवा वर्ग देश को मिल गया है जो ऐसे राजनीतिज्ञों से सवाल पूछने में अपने को सक्षम मानता है। वह पूछने लगा है, सवाल करने लगा है। और, इन युवाओं की हिम्मत तो देखिए, अपनी एकजुटता से सत्ता को झुकाने में सफल भी रहा है। पिछला उदाहरण देश के शिक्षामंत्री का ही लिया जा सकता है। जब युवा, जिन्हें ‘जेन-जी’ कहा जा रहा है, उन्होंने देश की राजधानी सहित कई राज्यों में एकजुटता दिखाते हुए लंबे संघर्ष के बाद सरकार से यह मनवाने के लिए बाध्य कर दिया कि शिक्षामंत्री अपने पद की गरिमा का पालन नहीं कर रहे हैं और जिसके चलते कई होनहार छात्रों को आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा। सरकार यह समझती रही कि इस तरह के मामले आते—जाते रहते हैं, इसके लिए मंत्री से उनके नकारापन के कारण इस्तीफा नहीं लिया जा सकता। सच तो यह है कि वर्तमान सत्तारूढ़ सरकार इतनी मजबूत थी कि उसे कभी इसकी कोई परवाह नहीं रही कि युवा कितनी मेहनत से अपने जीवन को संवारने के लिए पढ़ाई करते हैं, लेकिन एक पल में ही कुछ शिक्षा के दलालों द्वारा उनका सपना चूर—चूर कर देते हैं। यदि नींव मजबूत हो, तो ढांचागत निर्माण सुदृढ़ और टिकाऊ होता है, इस मामले में शिक्षामंत्री के बचाव के लिए यह कहा जाता रहा था कि कुछ शिक्षा माफियाओं ने पेपर लीक कराया, इसमें मंत्री का क्या दोष? फिर वही बात; यदि नींव मजबूत हो तो डाल और पत्ते भी मजबूत और हरे—भरे होंगे। यहां यह भी कहा जा सकता है यदि सरकार दूरदर्शी होती तो जब पेपर लीक का मामला उठ रहा था, उसी समय शिक्षामंत्री का इस्तीफा ले लेना चाहिए; क्योंकि तत्कालीन शिक्षामंत्री एक राष्ट्रीय समाचार पत्र को दिए अपने साक्षात्कार में माफी मांग ली थी।
सरकार को यह विश्वास ही नहीं था कि छात्रों का आंदोलन इतना उग्र हो जाएगा कि उसे झुकना पड़ जाएगा। यदि पीछे जाएं तो 1974 के बिहार में हुए छात्र आंदोलन को भुलाया नहीं जा सकता जिसने आगे चलकर सरकार का तख्ता पलट दिया । उससे भी पीछे जाएं तो राजाराम मोहन राय को भी याद करना ही पड़ेगा, जिन्होंने अपनी 16 वर्ष की आयु में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ ऐसा आंदोलन चलाया कि बिटिश सरकार को झुकना पड़ा। राय ने सती प्रथा, बाल विवाह, जातिगत भेदभाव और धार्मिक रूढ़िवादियों जैसी प्रथाओं का कड़ा विरोध किया। उनकी सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि सती प्रथा के विरुद्ध चलाया गया अभियान था जिसमें अंततः गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैंटिक के नेतृत्व में बंगाल में सती विनियमन 1829 को लागू करने में योगदान दिया। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों, जिनमें संपत्ति और शिक्षा का अधिकार शामिल है, की भी वकालत की। उन्हें भारतीय ‘पुनर्जागरण का जनक’ कहा जाता है। सरकार के प्रति युवाओं का आक्रोश यहां तक पहुंच गया है कि हैदराबाद की नलसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के छात्रों ने एकजुटता दिखाते हुए देश के प्रधान न्यायाधीश के हाथों सर्टिफिकेट लेने से मना कर दिया। बात यहीं नहीं रुकी; क्योंकि उसे तूल देते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया के आदेश पर सर्वोच्च न्यायालय ने नाराजगी जताई। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि यह उनके और छात्रों के बीच की बात है, बीसीआई दखल देने वाला कौन होता है! छात्रों को विरोध करने का अधिकार है। बता दें कि राज्य बार काउंसिलों को नालसर के छात्रों को वकील के तौर पर नामांकित करने के आदेश को लेकर इंटरनेट मीडिया पर हंगामा मच गया था, लेकिन कुछ ही घंटों बाद बीसीआई को यह आदेश वापस लेना पड़ा। विश्लेषक इसे युवा जागरूकता की ताकत कहते हैं। ज्ञात हो कि कॉकरोच जैसे व्यंग्यात्मक शब्द का प्रयोग युवाओं के लिए देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ही किया गया था।
अब सीजेपी ने अपनी कोर टीम की घोषणा करके कहा है कि वे अब देश के विभिन्न शहरों में आंदोलन को गति देंगे। पर यह क्या! जिस पेपर लीक के लिए देश भर में इतना बड़ा आंदोलन हुआ, केंद्रीय शिक्षामंत्री को त्यागपत्र देना पड़ा, वह पेपर लीक तो अब भी हो रहा है। खबरों की मानें तो एनटीए फिर से सवालों के घेरे में है और यूजीसी और नेट में भी गड़बड़ी हुई है। इसके चलते नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने 16 अगस्त रविवार के देर शाम अंग्रेजी, कॉमर्स और समाजशास्त्र जैसे तीन विषयों की परीक्षा रद्द कर दी है। एनटीए ने इन तीनों विषयों की परीक्षा नौ और दस सितंबर को करने के ऐलान किया है। इन विषयों के उम्मीदवारों से कोई अतिरिक्त परीक्षा शुल्क नहीं लिया जाएगा। परीक्षा का शहर और केंद्र, एडमिट कार्ड आदि की जानकारी एनटीए की आधिकारिक वेबसाइट पर दी जाएगी। इन विषयों की परीक्षा को दुबारा कराए जाने का जो कारण बताया जा रहा है वह यह कि प्रश्न पत्रों में मिली ढेरों गलतियों व दोहराव है। अब प्रश्न यह भी उठता है कि इसमें छात्रों का क्या कसूर, जिनका भविष्य अंधकार से घिर गया है। यदि इस पर आंदोलन देश भर में होता है, तो फिर दोषी किसे माना जाएगा? क्या ऐसे व्यक्तियों को सजा दिलाने का कोई कानूनी प्रावधान हमारे यहां नहीं है? यदि है तो सबसे पहले इसकी ही जांच हो कि किनकी गलती अथवा किन माफियाओं के कारण छात्रों के साथ बार—बार ऐसा किया जा रहा है। युवा तो उत्तेजित होंगे ही; क्योंकि आने वाले दिनों में किसी छात्र का भविष्य कितने संघर्षों से गुजरने वाला है, इसकी कल्पना से ही मन रोमांचित होने लगता है। अब तक तो यही माना जाता रहा है कि युवाओं के अधिकारों और उनका भरोसा जीतनेवाला कोई राजनीति दल आगे नहीं आता ।
लेकिन, अब प्रधानमंत्री ने स्वयं इसका बीड़ा उठाते हुए लालकिले की प्राचीर से ऐलान किया है कि छात्रों को मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग और एक करोड़ युवाओं को एआई प्रशिक्षण दिया जाएगा। लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री ने अपने सवा घंटे के संबोधन में पचास से अधिक बार युवाओं का उल्लेख किया और कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। इस पहल का उद्देश्य मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों के बच्चों पर से महंगे कोचिंग संस्थानों की भारी फीस का बोझ कम करना है। देश के बेहतरीन शिक्षकों के संसाधनों और डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर को मिलाकर एक मजबूत नेटवर्क तैयार किया जाएगा। प्रधानमंत्री ने वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के संकल्प को पूरा करने में देश के युवाओं और छात्रों की भूमिका को सबसे अहम बताया। इन घोषणाओं के विश्लेषक कई तरह के कयास लगा रहे हैं। वे कह रहे हैं कि युवा के आंदोलन से उनके अंदर डर बैठ गया है। यदि प्रधानमंत्री युवाओं के लिए इतना कुछ करना चाहते हैं, तो इसकी घोषणा पहले क्यों नहीं की गई? यदि ऐसा पहले किया गया होता तो इतने छात्रों को आत्महत्या करने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। लेकिन हां, देर से ही सही, सरकार की समझ में यह बात तो आती जा रही है कि युवाओं की शक्ति क्या होती है और जब अपने भविष्य को अंधकारमय देखते हैं तो वे फिर किसी हद को पार करने से बाज नहीं आते। फिर भी प्रधानमंत्री को हस्तक्षेप करना पड़ा जिसमें युवाओं को भरोसा दिलाया है कि उनके साथ न्याय होगा, अब युवाओं को उनके इस भरोसे पर विश्वास तो करना ही पड़ेगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)
