Vande Mataram Resolution : ‘वंदे मातरम’ पर सियासी घमासान: 1937 के समझौते से लेकर 2026 के नए कानून तक, क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है?

Bindash Bol

Vande Mataram Resolution : राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर भारतीय राजनीति में एक बार फिर बड़ा वैचारिक और ऐतिहासिक टकराव सामने आ गया है। कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) द्वारा 1937 के उस पुराने फैसले को फिर से दोहराने—जिसके तहत कार्यक्रमों में गीत के केवल पहले दो छंदों को गाने की व्यवस्था दी गई थी—के बाद भाजपा ने 10 सूत्रीय प्रस्ताव पारित कर सीधा हमला बोला है।

​इस विवाद के केंद्र में केवल आज की सियासत नहीं, बल्कि लगभग एक सदी पुराना इतिहास, संविधान सभा की बहसें और आजादी की लड़ाई से जुड़े अहम मोड़ हैं….

* ​1937 का कांग्रेस प्रस्ताव और मुस्लिम लीग का रुख: 1930 के दशक में जब स्वतंत्रता आंदोलन चरम पर था, तब मुस्लिम लीग ने ‘वंदे मातरम’ के अंतिम छंदों में मौजूद देवी-देवताओं के संदर्भों पर आपत्ति जताई थी। इसके बाद 1937 में कांग्रेस ने एक समझौतावादी रुख अपनाते हुए केवल पहले दो छंदों (जो विशुद्ध रूप से प्रकृति और मातृभूमि की वंदना करते हैं) को औपचारिक रूप से स्वीकार किया था।

* ​1923 का काकीनाडा अधिवेशन: विवाद की जड़ें और पीछे जाती हैं। 1923 के कांग्रेस अधिवेशन में जब पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने पूरा ‘वंदे मातरम’ गाना शुरू किया, तब तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद अली ने मंच छोड़ दिया था। भाजपा इस घटना को ऐतिहासिक ‘तुष्टीकरण’ की शुरुआत के रूप में प्रस्तुत कर रही है।

* ​महात्मा गांधी का दृष्टिकोण: भाजपा ने अपने प्रस्ताव में महात्मा गांधी के विचारों को प्रमुखता से रेखांकित किया है। बापू ने ‘वंदे मातरम’ को साम्राज्यवाद विरोधी सबसे सशक्त नारा और ‘शुद्धतम राष्ट्रीय भावना’ का प्रतीक बताया था, जो किसी भी धार्मिक संकीर्णता से कहीं ऊपर उठकर संपूर्ण राष्ट्र की चेतना का प्रतिनिधित्व करता है।

* ​1950 का संवैधानिक दर्जा और 2026 का कानून: संविधान सभा ने 1950 में ‘वंदे मातरम’ को ‘जन गण मन’ के समान दर्जा दिया था। भाजपा का कहना है कि संसद के 2026 के संशोधन के जरिए इसे कानूनी सुरक्षा प्रदान की जा चुकी है, इसलिए किसी राजनीतिक दल का अंदरूनी प्रस्ताव देश के संवैधानिक और कानूनी ढांचे से ऊपर नहीं हो सकता।

​चर्चा के अहम बिंदु और सियासी मायने

1.​ संपूर्ण गान बनाम दो छंद: क्या ‘वंदे मातरम’ के केवल दो पदों का गायन उसकी मूल ऐतिहासिक चेतना को सीमित करता है, या यह भारत की साझी विविधता को साधने का एक व्यावहारिक ऐतिहासिक निर्णय था?

2.​ तुष्टीकरण बनाम सर्वसमावेशी राजनीति: क्या 1937 का निर्णय तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों के तहत लिया गया एक संतुलन था, या यह तुष्टीकरण की शुरुआत थी जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय प्रतीकों के स्वरूप को प्रभावित किया?

3.​ युवा पीढ़ी और राष्ट्रव्यापी अभियान: भाजपा द्वारा छह छंदों वाले पूरे गीत और उसके बलिदानों के इतिहास को घर-घर पहुंचाने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाने का फैसला आने वाले समय में एक बड़े वैचारिक विमर्श का रूप ले सकता है।

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