BRICS : क्या टूटने वाला है ‘ग्रीनबैक’ का तिलिस्म? नई दिल्ली में BRICS का महामंथन और डॉलर का भविष्य

Siddarth Saurabh

BRICS : ​दशकों से दुनिया के बाज़ार में एक ही सिक्का खनक रहा है—अमेरिकी डॉलर। तेल खरीदना हो या गेहूं, हर मुल्क को अपनी तिजोरी में डॉलर रखना मजबूरी रहा है। लेकिन 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली की धरती पर जब BRICS शिखर सम्मेलन का मंच सजेगा, तो दुनिया की नजरें सिर्फ नेताओं की मुलाकातों पर नहीं, बल्कि उस खामोश बगावत पर होंगी जिसे अर्थशास्त्र की जुबान में ‘डी-डॉलराइजेशन’ कहा जाता है।

​सवाल यह नहीं है कि क्या कल सुबह डॉलर का साम्राज्य ढह जाएगा; असली सवाल यह है कि क्या दुनिया अब एक ऐसे बहुध्रुवीय वित्तीय तंत्र की तरफ बढ़ चुकी है, जहाँ डॉलर की मनमानी और एकाधिकार नहीं चलेगा?

​एक छत, तीन तेवर: भारत, चीन और रूस का अलग-अलग खेल

​BRICS के भीतर डॉलर से निपटने की रणनीति पर सबकी अपनी डफली और अपना राग है….

* ​रूस की मजबूरी और आक्रामकता: पश्चिमी प्रतिबंधों की मार झेल रहे रूस के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा। वह अपने BRICS व्यापार का एक बड़ा हिस्सा पहले ही रूबल और सहयोगी देशों की स्थानीय मुद्राओं में समेट चुका है। मॉस्को चाहता है कि डॉलर के वर्चस्व पर सीधा और तीखा प्रहार हो।

* ​चीन की वैश्विक महत्वाकांक्षा: बीजिंग इस पूरे समीकरण को अपनी मुद्रा ‘युआन’ को दुनिया का नया केंद्र बनाने के मौके के तौर पर देख रहा है। चीन चाहता है कि डॉलर कमजोर हो और उसकी खाली जगह युआन भरे।

* ​भारत का नपा-तुला संतुलन: नई दिल्ली न तो किसी के पीछे चलने के मूड में है और न ही वह डॉलर विरोधी किसी आक्रामक मोर्चे का मोहरा बनना चाहती है। भारत की नीति बेहद व्यावहारिक है—‘डॉलर का विरोध नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर विकल्प की तलाश।’

​साझा करेंसी नहीं, डिजिटल नेटवर्क: भारत का ‘स्मार्ट गेम

​अक्सर चर्चा उड़ती है कि क्या BRICS मिलकर ‘यूरो’ जैसी कोई साझा मुद्रा लाएगा? भारत इस विचार को सिरे से खारिज कर चुका है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल पहले ही साफ कर चुके हैं कि भारत किसी साझा BRICS करेंसी के पक्ष में नहीं है।
​भारत का ध्यान मुद्रा बदलने से ज्यादा लेन-देन की व्यवस्था बदलने पर है…

* ​लोकल करेंसी में व्यापार: रुपए और सहयोगी देशों की मुद्राओं में सीधा लेन-देन, ताकि डॉलर की मध्यस्थता और उस पर लगने वाली भारी कन्वर्जन फीस से बचा जा सके।

* ​डिजिटल करेंसी का गठजोड़: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने BRICS देशों की सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) और फास्ट पेमेंट सिस्टम को आपस में जोड़ने की वकालत की है। इसका सीधा मतलब है कि सीमा पार भुगतान इतना तेज और सस्ता हो जाए कि किसी तीसरे मुल्क के क्लीयरिंग हाउस का मुंह न ताकना पड़े।

​वाशिंगटन की बेचैनी और ट्रंप की चेतावनी

​दुनिया के कारोबार से डॉलर का हल्का सा भी खिसकना अमेरिका के लिए खतरे की घंटी है। अमेरिकी ताकत की असली रीढ़ उसकी सेना से ज्यादा उसका वित्तीय सिस्टम है। यही वजह है कि डोनाल्ड ट्रंप BRICS देशों को कई बार खुले तौर पर चेतावनी दे चुके हैं कि डॉलर को किनारे करने की कोशिशों के गंभीर आर्थिक नतीजे हो सकते हैं।

​वाशिंगटन जानता है कि अगर दुनिया के 40 फीसदी से ज्यादा आबादी और बड़े व्यापारिक नेटवर्क वाले देश डॉलर को बाईपास करने लगे, तो अमेरिकी प्रतिबंधों की धार कुंद पड़ जाएगी।

​नई दिल्ली का यह सम्मेलन भारत की कूटनीति के लिए तलवार की धार पर चलने जैसा है। एक तरफ मॉस्को और बीजिंग की अपनी प्राथमिकताएं हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिका के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी। भारत का मास्टरस्ट्रोक यही है कि वह बिना किसी से उलझे, दुनिया को एक ऐसा वित्तीय रास्ता दिखा रहा है जहाँ लेन-देन आसान हो, लागत कम हो और किसी एक देश की मुद्रा पूरे विश्व के व्यापार को बंधक न बना सके। डॉलर की बादशाहत रातोंरात खत्म नहीं होगी, लेकिन उसके एकाधिकार के दिन अब यकीनन गिने-चुने रह गए हैं।

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