Hindi Diwas : रांची में गूँजी मातृभाषा की स्वरलहरी… झारखंड हिन्दी साहित्य संस्कृति मंच की ओर से भव्य ऑनलाइन काव्य गोष्ठी संपन्न

Bindash Bol

Hindi Diwas : रांची: हिन्दी हमारी संस्कृति, संवेदना और आत्मीयता की जीवंत अभिव्यक्ति है। इसी केंद्रीय भाव को स्वर देते हुए झारखंड हिन्दी साहित्य संस्कृति मंच की ओर से हिन्दी दिवस के अवसर पर एक भव्य ऑनलाइन काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ गीता सिन्हा ‘गीतांजलि’ द्वारा प्रस्तुत वंदना से हुआ। इसके बाद मंच के सचिव बिनोद सिंह ‘गहरवार’ ने सभी आगत अतिथियों, कवयित्रियों और कवियों का गर्मजोशी से स्वागत किया।

काव्य पाठ में छाईं रचनाएँ

गोष्ठी में शामिल रचनाकारों ने अपनी कविताओं के माध्यम से हिन्दी की महत्ता, उसकी सरलता और समसामयिक विषयों पर अपनी मुखर प्रस्तुतियां दीं। इस दौरान गूँजने वाली प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित रहीं…

* ​गीता चौबे ‘गूँज’ – हिन्दी की अब होगी जीत

* ​सुनीता अग्रवाल – मातृभाषा हमारी हिन्दी

* ​सुजाता प्रिय ‘समृद्धि’ – जब मुँह खोलो हिन्दी बोलो

* ​निराला पाठक – कोशिशें तो किए निराले ने भी किसी से गुफ्तगू हो

* ​पूनम वर्मा – जन-जन की जिह्वा पर बसी, हिन्दी भाषा है हिंद की

* ​कल्याणी झा ‘कनक’ – बड़ी प्यारी सरल बोली, लगे प्यारी सहज हिन्दी

* ​अनिता रश्मि – मोबाइल की गिटिर-पिटिर, नहीं सुनी जाती बात पिता की

* ​डॉ. राजश्री जयंती – जिसे हर दिल समझता है, वो पावन प्यार है हिन्दी

* ​हिमकर श्याम – हिन्दी अपनी शान है, हिन्दी है अभिमान

* ​नेहाल सरैयावी – अपने भारत की शान है हिन्दी, मेरी आन-बान है हिन्दी

* ​डॉ. उर्मिला सिन्हा – हिन्दी हमारी मातृभाषा, जन-जन की अभिलाषा

* ​रेणु बाला धार – रहेगा जब तक अंग्रेजी का बुखार

* ​कामेश्वर कुमार सिंह ‘कामेश’ – ये है हमारा हिन्दुस्तान

* ​डॉ. गीता सिन्हा ‘गीतांजलि’ – रामायण, महाभारत, गीता का ज्ञान है हिन्दी

* ​बिनोद सिंह ‘गहरवार’ – कब तक माता निज घर में नौकरनी बनी रहेगी

वैज्ञानिक और जीवंत है हिन्दी: निरंजन प्रसाद श्रीवास्तव

संस्था के कार्यकारी अध्यक्ष निरंजन प्रसाद श्रीवास्तव ने अपने मुख्य उद्बोधन में हिन्दी की अनूठी विशेषताओं और इसके राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने हिन्दी को दुनिया की सबसे वैज्ञानिक भाषाओं में से एक बताते हुए कहा कि “हिन्दी में जैसा लिखा जाता है, वैसा ही बोला जाता है और इसमें सब कुछ कहने की क्षमता है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि हिन्दी केवल शब्दों का भंडार मात्र नहीं है, बल्कि हमारी संस्कृति और संवेदना का एक जीवंत संसार है। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने सभी रचनाकारों की कविताओं की भूरी-भूरी प्रशंसा करते हुए उन्हें साधुवाद दिया।

सफल संचालन और समापन
कार्यक्रम का संयोजन पूनम वर्मा ने बेहद कुशलता से किया, जबकि संपूर्ण काव्य गोष्ठी का आकर्षक संचालन कल्याणी झा ‘कनक’ ने संभाला। अंत में डॉ. उर्मिला सिन्हा द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ इस साहित्यिक आयोजन का सफलतापूर्वक समापन हुआ।

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