* दर्द से बदलाव तक: सत्य निकेतन के मलबे से उठी वह आवाज़, जिसने डीयू के गलियारों से लेकर कुलपति के दरवाज़े तक हिला कर रख दिया।
* सिर्फ चुनाव नहीं, एक न्याय सत्याग्रह: बिना गाड़ियों के काफिले और बड़े टिकट के, कैसे एक निर्दलीय उम्मीदवार ने दर्ज की ऐतिहासिक जीत।
* हर मां-बाप के लिए एक सबक: अनजान शहरों के पीजी और कमरों में बच्चों को भेजने वाले अभिभावकों को अब कौन से चार सवाल जरूर पूछने चाहिए।
DUSU 2026 : पिता दिल्ली की बसों में टिकट काटते हैं। ठेके पर। और बेटे ने हादसे के बाद से जूते नहीं पहने थे।
शनिवार को वोट गिने गए, तो इस पूरे चुनाव के सबसे ज्यादा वोट उसी लड़के के निकले।
अध्यक्ष से भी ज्यादा।
न किसी बड़े छात्र संगठन का टिकट। न गाड़ियों का काफिला।
बस नंगे पांव।
डूसू, यानी दिल्ली यूनिवर्सिटी का छात्रसंघ चुनाव। देश का सबसे शोर वाला कैंपस चुनाव है ये। यहां से निकले लड़के आगे चलकर विधायक बने हैं, सांसद बने हैं, मंत्री बने हैं। पैसा भी उतना ही चलता है यहां, और रसूख भी। इस बार उपाध्यक्ष की कुर्सी एक निर्दलीय ले गया। डूसू के केंद्रीय पैनल में ऐसा पहली बार हुआ है।
पोस्टर पर उसका नाम भी सीधा नहीं लिखा था। लिखा था, दीपांशु 100कीन।
नाम, दीपांशु शौकीन।
अब शुरू से शुरू करते हैं।
सत्य निकेतन। दिल्ली यूनिवर्सिटी के दक्षिणी कैंपस से चंद कदम दूर। 6 सितंबर, इतवार, दोपहर डेढ़ बजे के आसपास।
वहां एक बहुमंजिला इमारत खड़ी थी। नाम, हॉस्टल डेज। कहलाती हॉस्टल थी, थी पीजी। उम्र चालीस-पचास बरस। पुलिस के हवाले से आई खबरों के मुताबिक पंद्रह के आसपास कमरे, हर कमरे में दो-तीन लड़के। और उस दिन नीचे तहखाने में कुछ काम चल रहा था।
फिर वो इमारत बैठ गई।
मलबा हटाने में एक दिन से ज्यादा लगा। सात लोग नहीं बचे। पांच दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र, और दो मजदूर, जो उसी तहखाने में लगे थे।
ये कोई दूर-दराज की जगह नहीं थी। ये देश की सबसे नामी यूनिवर्सिटी की पीठ थी।
इसके बाद कैंपस में जो हुआ, उसमें एक बात अलग थी।
एक लड़के ने जूते उतार दिए।
कहा, जब तक उन बच्चों को इंसाफ नहीं मिलता, जूता-चप्पल नहीं पहनूंगा। फिर नंगे पांव मार्च शुरू किया। हॉस्टल पर, पीजी की मनमानी पर, छात्रों की सुरक्षा पर। नाम दिया, न्याय सत्याग्रह।
हादसे से नतीजे तक तेरह दिन। सितंबर की दिल्ली में दोपहर की सड़क अब भी तपती है। और उन्हीं तेरह दिनों में पूरा चुनाव प्रचार भी इसी हाल में हुआ।
उसने बाद में जो कहा, वो इस पूरी कहानी की सबसे साफ लाइन है।
कहा कि नंगे पांव की तकलीफ उसे हर वक्त याद दिलाती रही कि इस यूनिवर्सिटी के डेढ़ लाख बच्चे भी रोज किसी न किसी तकलीफ में हैं।
दर्द को उसने भुलाया नहीं। अलार्म बना लिया।
फिर 11 सितंबर।
दीपांशु एनएसयूआई में थे। टिकट मांगा था, नामांकन भी हो गया था। फिर कहा गया, वापस ले लो।
नहीं लिया। निर्दलीय उतर गए।
संगठन के भीतर क्या हुआ, इस पर दोनों तरफ से अलग-अलग बातें आई हैं। मेरे पास किसी की पुष्टि नहीं, इसलिए उस तरफ नहीं जाऊंगा। पुष्ट सिर्फ इतना है कि टिकट नहीं मिला, और लड़ना नहीं छोड़ा।
18 सितंबर को वोट पड़े। शनिवार को गिनती।
उपाध्यक्ष पद पर तीस हजार से ऊपर वोट। अध्यक्ष जीतने वाले को चौबीस हजार के आसपास। पूरे पैनल में सबसे बड़ा आंकड़ा उस लड़के का, जिसके पास न संगठन था, न पैसा।
जिसके पास जूते नहीं थे, वोट सबसे ज्यादा उसी के निकले।
जीत के बाद वाली तस्वीर में उसके हाथ में एक पोस्टर है। लिखा है, डीयू मांगे हॉस्टल।
और ऐलान कर दिया कि दफ्तर संभालने से पहले कुलपति के दफ्तर के सामने धरने पर बैठेगा।
अब वो आंकड़ा, जिसके बाद पूरी बात समझ आती है।
दिल्ली यूनिवर्सिटी के इक्यानवे कॉलेजों में से इकहत्तर में हॉस्टल है ही नहीं।
इकहत्तर।
सालाना रिपोर्ट के हिसाब से यहां ढाई लाख के आसपास नियमित छात्र हैं। हॉस्टल की सीटें आज सात हजार के आसपास। जो नई इमारतें बन रही हैं, वो सब बनने के बाद भी हर बीस में से उन्नीस बच्चे बाहर ही रहेंगे।
बाकी कहां रहेंगे?
वहीं, जहां हॉस्टल डेज था।
और एक बात, जिस पर शायद किसी की नजर नहीं गई।
सत्य निकेतन में इमारत पहली बार नहीं गिरी थी।
अप्रैल 2022। उसी इलाके में एक तीन मंजिला मकान गिरा था। उसमें भी मरम्मत चल रही थी। दमकल के अफसरों ने तब बताया था कि वो पुराना मकान पीजी में बदला जा रहा था।
पांच मजदूर दबे। दो नहीं बचे।
नाम थे, बिलाल और नसीम।
उस हादसे के बाद कैंपस में कोई आंदोलन उठा हो, ऐसा मुझे ढूंढ़ने पर नहीं मिला। किसी चुनाव में मुद्दा बना हो, ये भी नहीं।
चार साल बाद, उसी मोहल्ले में, लगभग उसी वजह से, फिर एक इमारत गिरी। फर्क इतना कि इस बार नीचे छात्र भी थे।
मैं ये नहीं कह रहा कि किसी ने जान-बूझकर आंख मूंदी। बस इतना कि उस मोहल्ले की इमारतों पर सवाल नए नहीं थे। तब जो दबे थे, उनके नाम ऐसे नहीं थे जिनसे कैंपस हिलता।
अब उसकी पढ़ाई की बात। ये मुझे सबसे आखिर में मिली।
दीपांशु ने शहीद भगत सिंह कॉलेज से राजनीति विज्ञान पढ़ा। और इस वक्त वो बौद्ध अध्ययन विभाग में एमए कर रहे हैं।
बौद्ध अध्ययन।
उसी विभाग में विनय पिटक पढ़ाया जाता है। उसमें चमड़े और जूतों पर एक पूरा अध्याय है, चम्मक्खन्धक। भिक्षु कब जूते पहन सकता है और कब नहीं, सब वहीं दर्ज है। मोटी बात ये कि बस्ती में जाते वक्त पांव नंगे रहें। जूता छूट है, आदत नहीं।
पर असली बात ये कि वो अध्याय शुरू कहां से होता है।
एक भिक्षु था। नाम, सोण कोलिविस। घर बहुत बड़ा था। पालि ग्रंथ कहते हैं, अस्सी गाड़ी सोना और सात हाथी पीछे छोड़कर आया था।
पांव उसके जन्म से कोमल थे।
भिक्षु बनने के बाद वो चंक्रमण करता, यानी ध्यान में टहलना। टहलते-टहलते पांव फट गए।
ग्रंथ में लिखा है, जहां वो चलता था, वो पूरी पट्टी खून से भर गई थी।
तब बुद्ध ने उसे एक तह वाली चप्पल की इजाजत दी।
और अब वो बात, जिस पर मैं अटक गया।
सोण ने वो इजाजत अकेले लेने से मना कर दिया।
कहा, जो रियायत बाकी भिक्षुओं को नहीं मिलेगी, वो मुझे अकेले नहीं चाहिए।
तब वो इजाजत सबके लिए कर दी गई।
जूतों का वो नियम बना ही इसलिए, क्योंकि एक आदमी के पांव से खून निकला था। और उस आदमी ने अपने लिए कुछ नहीं मांगा।
एक बात ईमानदारी से जोड़ दूं। दीपांशु ने कहीं नहीं कहा कि ये सब सोचकर जूते उतारे थे। महज इत्तिफाक भी हो सकता है। इसलिए मैं इसे वजह नहीं कह रहा।
पर इत्तिफाक इतना सुंदर है कि बिना लिखे रहा नहीं जाता।
जिस विभाग में वो लड़का पढ़ रहा है, उसकी सबसे पुरानी किताब में वो आदमी दर्ज है जिसके पांव छिल गए थे, और जिसने कहा था कि राहत सबको मिले, वरना मुझे भी नहीं चाहिए।
और वो लड़का दिल्ली की तपती सड़क पर, नंगे पांव, डेढ़ लाख बच्चों की बात कर रहा था।
अब उस घर पर आते हैं।
पीरागढ़ी। पश्चिमी दिल्ली का पुराना गांव, जिसे शहर निगल गया और नाम छोड़ गया। गढ़ी यानी छोटा किला। किला अब सिर्फ नाम में बचा है।
पिता का नाम राकेश कुमार। डीटीसी में कंडक्टर, खबरों के मुताबिक ठेके पर। मां आंगनवाड़ी में हैं।
ये दोनों काम आपने रोज देखे होंगे। ध्यान शायद कभी नहीं दिया होगा।
एक आदमी, जो चलती बस में खड़े-खड़े पूरा दिन काट देता है। और एक औरत, जो गली के एक कमरे में मोहल्ले के बच्चों को दलिया भी देती है और गिनती भी।
इन दोनों का बेटा दिल्ली यूनिवर्सिटी में है।
और पिता चाहते थे कि वो यूपीएससी करे।
जिस घर में मां-बाप ने उम्र भर किसी और के लिए काम किया हो, वहां यही होता है। सबसे सुरक्षित रास्ता चुनते हैं वो। परीक्षा दो, अफसर बनो, फिर कोई हटा नहीं पाएगा। मुझे लगता है वो सपना नहीं होता। वो डर होता है, जिसे सपने की शक्ल दे दी गई होती है।
बेटे ने वो रास्ता नहीं लिया। कैंपस चुना।
उस घर में इस पर क्या बात हुई, मुझे नहीं पता। और जो पता नहीं, वो मैं आपको सुनाता भी नहीं।
यह जीत की कहानी नहीं है।
यह उन जूतों की कहानी है, जो एक लड़के ने उतारकर रख दिए, और जब तक वजह खत्म नहीं हुई, उठाए नहीं।
मेरी मेज पर रोज खबरों की गड्डी आती है। अठारह बरस से यही काम है। ज्यादातर खबरें आंकड़ा बनकर आती हैं। और आंकड़ा सबसे पहले उसी आदमी को ढंक देता है, जो उसके नीचे दबा है।
मेरे बच्चे अभी छोटे हैं। पर वो दिन आएगा, जब इनमें से कोई किसी दूसरे शहर में, ऐसे ही किसी कमरे में रहेगा, जिसे मैंने देखा भी नहीं होगा। इसलिए सत्य निकेतन की खबर मैंने एडिटर की तरह नहीं पढ़ी थी। बाप की तरह पढ़ी थी।
अब एक काम की बात।
सत्य निकेतन के बाद अदालत के सामने पीजी और निजी हॉस्टलों की जो जांच-सूची रखी गई, उसमें चार ही चीजें हैं। मंजूर किया हुआ नक्शा। मंजिलों की असल गिनती। तहखाने में हुआ कोई फेरबदल। और ढांचे व आग की सुरक्षा।
नगर निगम का आदेश भी साथ आया, कि चार मंजिल से ऊपर बिना मंजूरी बने ढांचों पर सील लगेगी।
जो सवाल अब तक शक कहलाते थे, वो अब कागज पर दर्ज मांगें हैं। किसी भी कमरे के लिए, किसी भी शहर में।
अगली बार बच्चे से मिलने जाएं, तो कमरा देखने से पहले यही चार चीजें पूछ लीजिएगा। मकान मालिक का चेहरा ही बहुत कुछ बता देगा।
यह कहानी उन मां-बाप तक पहुंचनी चाहिए, जिन्होंने इसी साल पहली बार अपने बच्चे को किसी दूसरे शहर के पीजी में छोड़ा और खाली हाथ लौटना सीखा।
