IranUSWar : जापान के लिए बिना शर्त आत्मसमर्पण के सिवा और कोई रास्ता नहीं रह गया था। वह ऐसा करने ही जा रहा था कि इससे पहले चर्चिल के समर्थन से ट्रूमैन ने सोवियत संघ से बिना पूछे ही हिरोशिमा (6 अगस्त) और नागासाकी (9 अगस्त) पर अणुबम गिरा दिए। जब जापान की पराजय निश्चित थी, तो ऐसे नरसंहारी अस्त्र का दो बड़े शहरों की साधारण जनता पर गिराया जाना यही बताता है कि साम्राज्यवाद किस हद तक आततायी बन सकता है। साथ ही, जनता के हितों की परवाह न करते हुए उसने सोवियत संघ के विरुद्ध शीतयुद्ध भी शुरू कर दिया। उसी समय दोनों शहरों में स्त्री, बच्चे और बूढ़े सहित लगभग पचास-पचास हजार लोग काल के गाल में समा गए और कुछ ही महीने बाद लगभग उतनी ही संख्या में और लोग बुरी तरह मारे गए। इस आततायीपन को मानवता और जापानी जनता कभी नहीं भूल सकती। क्या ट्रूमैन और चर्चिल हिटलर के विरुद्ध भी अणुबम का प्रयोग कर सकते थे? हरगिज नहीं, क्योंकि वे जानते थे कि ऐसा करने पर हिटलर के उड़नतू बम भारी मात्रा में विषैली गैसों और कीटाणुओं को इंग्लैंड में गिरा सकते हैं, जिससे लंदन जैसे शहरों में कोई रोने वाला भी नहीं बच पाएगा।
हम बात कर रहे हैं पिछले 28 फरवरी 2026 से अमेरिका-इज़राइल-ईरान के बीच चल रहे युद्ध की। सच तो यह है कि यह युद्ध केवल तेल के लिए अमेरिका द्वारा थोपा गया है। साथ ही, एक बात और है—यह चीन के विकास को रोकने के लिए किया गया सबसे बड़ा षड्यंत्र है। अमेरिका जानता है कि यदि चीन के पर कतरने हैं तो सबसे पहले उसके आधुनिकीकरण के स्रोत को जड़ से काटना होगा। आज उसी के परिणामस्वरूप महीनों से चल रहे इस युद्ध में ईरान सहित पूरा विश्व पीस रहा है।
यह भी सच है कि अमेरिका जैसे विश्व के सबसे शक्तिशाली देश से टक्कर लेना कोई साधारण बात नहीं है, लेकिन पिछले छह महीनों में ईरान ने अमेरिका के सामने जो हालात पैदा किए हैं, उन्हें विश्व जानता है। हाँ, विश्लेषक यह भी मानते हैं कि अमेरिका का पलड़ा भारी है, लेकिन सर्वशक्तिशाली को धता बताकर ईरान जिस बहादुरी से युद्ध लड़ रहा है, वह आश्चर्यजनक है। विश्व यह जानकर हैरान है कि इतना शक्तिशाली होते हुए भी ईरान इतने दिनों तक शांत कैसे बैठा था।
अमेरिका ने रणनीतिक तरीके से सबसे पहले वेनेज़ुएला पर कब्जा करके जनवरी महीने में उसके राष्ट्रपति को गिरफ्तार कर लिया। याद रहे, वेनेज़ुएला का सारा आर्थिक आधार तेल पर ही आश्रित था। अब तेल का पहला स्रोत अमेरिका के कब्जे में आ गया था। विश्लेषक कहते हैं कि चूँकि अमेरिका चीन से सीधे तौर पर टकराना नहीं चाहता था, इसलिए उसने सभी इस्लामिक देशों को उनकी सुरक्षा का भरोसा दिलाकर अपने सैन्य ठिकानों को मजबूत करना शुरू कर दिया।अमेरिका का पलड़ा ईरान पर भारी होने का मुख्य कारण उसकी अत्याधुनिक सैन्य तकनीक, वैश्विक सैन्य मौजूदगी और विशाल आर्थिक ताकत है। अमेरिका के पास दुनिया के सबसे उन्नत स्टील्थ फाइटर जेट, आधुनिक ड्रोन और सटीक मार करने वाली मिसाइलें हैं।
अमेरिकी नौसेना और एयरक्राफ्ट कैरियर समुद्र और हवा में उसे भारी बढ़त देते हैं। मध्य पूर्व के कई देशों में अमेरिका के स्थायी सैन्य अड्डे हैं, जिससे उसकी पहुँच आसान होती है। इज़रायल और कई अन्य क्षेत्रीय तथा पश्चिमी देश सैन्य और कूटनीतिक रूप से अमेरिका के साथ हैं। अमेरिका के भारी प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था और रक्षा बजट पर भी बुरा असर पड़ा है। अमेरिका की खुफिया एजेंसियाँ और साइबर युद्ध क्षमता तकनीक के मामले में बहुत आगे हैं।अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष में सीधी सैन्य ताकत के मामले में अमेरिका दुनिया में पहले स्थान पर है, जबकि ईरान काफी पीछे, 16वें स्थान पर है। इसके बावजूद अमेरिकी सेना की ताकत के मुकाबले ईरान अपनी कुछ खास रणनीतिक क्षमताओं के बल पर चुनौती पेश करता है।
ईरान के पास बड़ी संख्या में बैलिस्टिक मिसाइलें और कामिकेज़ ड्रोन हैं। इनका उपयोग करके वह मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और जहाजों को निशाना बनाता है। ईरान रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज़ जलडमरूमध्य के पास स्थित है। वह छोटे जहाजों, तेज गति वाली नौकाओं और समुद्र में बिछाई जाने वाली बारूदी सुरंगों के जरिए वैश्विक तेल आपूर्ति और समुद्री यातायात को बाधित करने की ताकत रखता है।
ईरान के कई परमाणु और मिसाइल ठिकाने पहाड़ों के नीचे बहुत गहराई में बने हैं। ग्रेनाइट जैसी चट्टानों से सुरक्षित ये ठिकाने सामान्य हवाई हमलों और बंकर-बस्टर बमों की पहुँच से काफी हद तक सुरक्षित माने जाते हैं। ईरान सीधे आमने-सामने की लड़ाई के बजाय कम लागत वाले ड्रोनों और छोटे समूहों की असममित युद्ध शैली का उपयोग करता है।
अमेरिका-ईरान युद्ध में चीन सीधे तौर पर युद्ध नहीं लड़ रहा है, लेकिन वह ईरान से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदता है। युद्ध की वजह से होर्मुज़ जलडमरूमध्य में आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और चीन के तेल आयात पर असर पड़ा है। अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव के बीच ईरान और चीन ने सामान के बदले सामान का नया तरीका निकाला है। चीन ईरान से तेल ले रहा है और इसके बदले उसे कथित तौर पर हथियार, मिसाइलों के पुर्जे और दोहरे उपयोग वाली तकनीक मुहैया करा रहा है। चीन इस युद्ध का फायदा उठाकर पश्चिम एशिया में अमेरिका के प्रभाव को कमजोर कर रहा है और खुद को एक वैकल्पिक तथा भरोसेमंद साझीदार के रूप में पेश कर रहा है।
अमेरिकी सेना का ध्यान और संसाधन इस युद्ध में लगने से चीन को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका मिल रहा है। चीन ने आधिकारिक तौर पर अमेरिका और इज़रायल के हमलों की आलोचना की है, लेकिन युद्ध में सीधे तौर पर अपने सैनिक नहीं उतारे हैं। वह बातचीत और कूटनीतिक माध्यमों से समाधान की वकालत करता रहा है। जैसा कि ऊपर कहा गया है, अमेरिका-ईरान युद्ध में चीन की सीधी भागीदारी नहीं है, लेकिन कूटनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक स्तर पर उसकी बड़ी भूमिका और हित जुड़े हुए हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच हो रहे घमासान युद्ध के बीच चीन की अमेरिका से सीधी भागीदारी तो नहीं है, लेकिन वह इस बात को जानता है कि यदि चीन पर सीधा आक्रमण किया गया तो चीन भी वाशिंगटन सहित अमेरिका के कई महत्वपूर्ण शहरों पर उसी तरह आक्रमण कर सकता है, जिस तरह अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर किया था। ऐसा इसलिए है कि चीन के पास भी अणुबम है। इसी के बल पर अमेरिका आज विश्व का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र कहलाता है। चीन आज विश्व की प्रमुख आर्थिक और सैन्य शक्तियों में से एक है और महाशक्तियों से हर तरह से निपटने के लिए खुद को तैयार कर रखा है और उनके लिए खम ठोक रहा। दूसरी ओर अमेरिका है जो कितना भी कमजोर हो ईरान यदि उसके जद में आ गया तो फिर हो सकता है कि आखिरी अस्त्र के रूप में वह ईरान के खिलाफ कुछ भी कर सकता है । किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन में पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति पेज़ेशकियान के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई, जिसमें राष्ट्रपति की तरफ से यह अपील की गई कि भारतीय प्रधानमंत्री अपने संपर्कों का प्रयोग कर युद्ध को समाप्त करवाने में मदद करें।
भारत के लिए और विशेषकर वर्तमान भारतीय सरकार के लिए इससे बड़ी उपलब्धि क्या होगी कि वह अमेरिका और ईरान के बीच पिछले छह महीने से चल रहे इस घमासान युद्ध को रुकवा दे, जो विश्व के लिए तीसरे विश्वयुद्ध का संकेत बनता जा रहा है और जिसके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि ईरान को 48 घंटे के अंदर हथियार डालने पर मजबूर कर देंगे।
यदि भारत इस युद्ध को बंद कराने में सफल हो जाता है, तो विश्व में सचमुच उसका डंका बज जाएगा। दूसरी ओर नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स समिट में ईरान के राष्ट्रपति पेजेस्कियां ने कहा कि यदि अमेरिकी योद्धा हैं, तो वे हमारी सैन्य ताकतों का मुकाबला करें, मासूमों और बुनियादी ढांचे को निशाना न बनाएं। ईरान ने स्पष्ट किया कि वह किसी के दबाव या धमकियों के आगे नहीं झुकेगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)
