Energy Security :​मिडिल ईस्ट का नया संकट..सऊदी पाइपलाइन पर ड्रोन हमला और भारत की बढ़ती ऊर्जा चिंताएं

Siddarth Saurabh

Energy Security : ​सऊदी अरब के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हुआ एक ताजा ड्रोन हमला वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के केंद्र में आ गया है। 1200 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट क्रूड ऑयल पाइपलाइन पर हुए इस हमले ने न केवल सऊदी अरब की तेल आपूर्ति को बाधित किया है, बल्कि भारत समेत पूरी दुनिया की एनर्जी सिक्योरिटी पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।

​1. सऊदी अरब की ‘लाइफलाइन’ पर हमला: क्या है पूरा मामला?

* ​हार्मोन का विकल्प: साल 1980 के ईरान-इराक युद्ध से सबक लेते हुए सऊदी अरब ने पर्सियन गल्फ से निकलने वाले तेल के जोखिम को कम करने के लिए यह विशाल पाइपलाइन बनाई थी।

* ​रेड सी तक पहुंच: इस पाइपलाइन के जरिए पूर्वी तेल क्षेत्रों से क्रूड ऑयल को देश के अंदर से होते हुए सीधे रेड सी के किनारे स्थित यानबू पोर्ट तक पहुंचाया जाता है, जिससे स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से बचने का विकल्प मिलता है।

* ​सऊदी अरामको का कदम: दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी सऊदी अरामको ने मौजूदा हमलों और तकनीकी नुकसान के चलते भारतीय रिफाइनर्स को क्रूड ऑयल की शिपमेंट रोक दी है।

​2. क्यों बदल रहा है युद्ध का दायरा?

* ​एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर टारगेट पर: यमन के हूती विद्रोहियों और ईरान समर्थित समूहों के लगातार हमलों से अब यह साफ हो गया है कि युद्ध अब केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि देशों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ यानी ऊर्जा स्रोतों को निशाना बनाया जा रहा है।

* ​पंपिंग स्टेशन क्षतिग्रस्त: पाइपलाइन के प्रेशर को मेंटेन रखने वाले पंपिंग स्टेशन इस हमले की चपेट में आए हैं, जिससे पूरी परिवहन क्षमता ठप हो गई है। इसे दोबारा शुरू करने में कितना समय लगेगा, यह अभी अनिश्चित है।

* ​वैश्विक चेतावनी: ईरान की तरफ से क्रूड ऑयल की कीमतों को अत्यधिक ऊंचाई पर पहुंचाने की चेतावनियों ने बाजार की अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है।

​3. भारत पर इसका सीधा और गंभीर असर

​भारत अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा आयात करता है और सऊदी अरब इसका प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। इस संकट का भारत पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ सकता है…

* ​बढ़ता ऑयल इंपोर्ट बिल: यदि सऊदी सप्लाई लंबे समय तक बाधित रहती है और क्रूड ऑयल की कीमतें लंबे समय तक $100 प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं, तो भारत को तेल खरीदने के लिए भारी मात्रा में अतिरिक्त अमेरिकी डॉलर खर्च करने होंगे।

* ​महंगाई और घरेलू बजट: महंगे आयात का सीधा असर भारतीय रुपये की चाल, देश में बढ़ने वाली महंगाई (Inflation), ट्रांसपोर्टेशन लागत और आम आदमी के रसोई व यात्रा के बजट पर पड़ेगा।

* ​विकास कार्यों पर दबाव: सरकार को जब ऊर्जा आयात के लिए ज्यादा धन खर्च करना पड़ेगा, तो इसका असर देश के बुनियादी ढांचे (Infrastructure) और रक्षा बजट के आवंटन पर भी पड़ सकता है।

​4. भारत के सामने दोहरी चुनौती: ‘तेल कहां से और कैसे आएगा?’

​मौजूदा भू-राजनीतिक हालात ने भारत के सामने कूटनीतिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है….

* ​सऊदी सप्लाई में रुकावट और हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव।

* ​रूस से रियायती दरों पर तेल आयात करने को लेकर अमेरिकी टैरिफ नीतियों का संभावित दबाव।

आज असली सवाल यह नहीं है कि तेल महंगा है या सस्ता, बल्कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि “आखिर भारत के लिए तेल आएगा कहां से और किस सुरक्षित रास्ते से आएगा?” आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि सऊदी अरब अपनी इस अहम पाइपलाइन को कितनी जल्दी दुरुस्त करता है और वैश्विक ऊर्जा बाजार इस नए संकट से कैसे निपटता है।

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