Urban Naxals : माओ का “गांव से शहर की ओर” और तिलचट्टों का उदय

Bindash Bol

उमानाथ लाल दास,धनबाद

Urban Naxals : माओ जिस मार्क्स से प्रभावित होते हैं वह मार्क्स शोषणमुक्त समतामूलक समाज की स्थापना के लिए संघर्ष को द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद से लेकर सर्वहारा के अधिनायकत्व तक चार बिंदुओं में चरणबद्ध करते हैं, लेकिन इसके लिए चीन में “दुनिया के मजदूरों एक हो” का नारा मुफीद नहीं हुआ! दरअसल दोनों की सामाजिक संरचनाओं में महत्त्वपूर्ण अंतर था। रूस में औद्योगिक मजदूरों के साथ एक विशाल ग्रामीण किसान आबादी भी थी, जबकि चीन में औद्योगीकरण अपेक्षाकृत सीमित था और आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा गांवों में रहता था। कुओमिनतांग और चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी साथ में होने के बाद भी बढ़ते कम्यूनिस्ट प्रभाव से मजबूर च्यांग काई शेक ने दमनात्मक कार्रवाई की! ऐसे में माओ को अपना रास्ता बदलना पड़ा और वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि विरोधी सियासी ताकत के पास फौज और हथियार हैं तो उन्हें भी सैन्य ताकत से लैस होना होगा। और यही वह ऐतिहासिक हालात हैं जब वह मार्क्स के सिद्धांत को रिप्लेस करते हैं “सत्ता बंदूक की नली से निकलती है” से। इसके लिए माओ “गांव से शहर की ओर” का एक अलग ही चरणबद्ध रणनीति अपनाते हैं। गुरिल्ला युद्ध और दीर्घकालीन जनयुद्ध की रणनीति के हिस्सा के रूप में माओ का यह सिद्धांत खूब पोपुलर हुआ! इसके लिए वह ग्रामीण इलाकों को बेस एरिया बनाते हुए शहर को घेरते हैं। और अंत में शहर पर कब्जा करते हैं।

प्रभाव क्षेत्र के विस्तार के लिए माओ का एक सिद्धांत “गांव से शहर की ओर” है। इसके तहत संगठन पहले गांवों में अपनी गतिविधियां सघन करते हुए प्रभाव मजबूत कर बेस एरिया तैयार करते हैं। क्रमशः यह चारों ओर से शहर का घेराव करता जाता है। भारत में जब अंदरुनी हालात इसके लिए पैदा नहीं हो पाया और नक्सल विरोधी अभियान चलाकर एक-एक कर उसकी कमर तोड़ दी जाती रही तो दूसरा रास्ता अपनाया गया। देश का एक घटक तो पहले से चीन के कांटैक्ट में था ही! अब तो एक घराने पर उसके साथ यानी चीनी हुकूमत और चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी संग सांठ-गांठ कर लेने तक का आरोप भी है। भले ही माओ अब वहां अपने अर्थों में वह अर्थ और प्रभाव नहीं रखते, पर इसका यह मतलब नहीं कि चीन का झुकाव, आकर्षण भारत से कम हो गया है! पाकिस्तान पहले से कटोरा थामे है ही उसके दरवाजे पर! पिछले कुछ सालों से श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल बारी-बारी से तबाह कर ही दिये गये। अब इन सबके बीच भारत है। भारत से भले ही ये देश कई-कई रूपों में उपकृत हों, पर चीन की हांक और धौंस के सामने वे सारी कृतज्ञता भूल जाते हैं। केजरी – कांग्रेस की रट थी ही बदलाव के लिए भीड़ को सड़क पर लाने की। सिद्धांतकारों की टीम में बार-बार घुसने में लगे योगेंद्र यादव भी कह ही रहे थे कि सत्ता परिवर्तन के लिए जनता को सड़क पर लाना होगा! नेहा बोरा तख्तापलट के लिए बांग्लादेश में सड़क पर उतरे प्रतिक्रियावादी उत्पातियों को अपना आदर्श बता ही चुकी है! इधर, आतंकियों के पैरोकार रह चुके प्रशांत भूषण तो यहां तक कह चुके हैं कि रिजीम चेंज उनका एकमात्र मोटो है, भले ही इसके लिए “ब्लड शेड” हो, वह भी मंजूर है। तो भारत की परिधीय स्थिति तैयार थी ही, बस माचिस की जिस तिल्ली की दरकार थी, उस रूप में तिलचट्टों को उतार दिया गया!

वरवर राव, जी साईबाबा, गौतम नवलखा, कोबाड़ गांधी जैसों के खिलाफ लगातार कार्रवाई और दूसरी तरफ सरेंडर या एनकाउंटर में ढेर होते हुए हथियार ढोने वालों के आंकड़े की डंका बजाने में लगी सरकार जिस नक्सलवाद की कथा की इतिश्री मानकर खुश हो रही थी, दरअसल उस खुशी की उम्र कुछ ही पल की थी। नक्सलवाद से बेफिक्र हो चली सरकार ने जिसे कभी अर्बन नक्सल नाम दिया था, दरअसल वही तत्व है जिसे वह अब दिमागी नक्सल कह रही है। वह बाहरी पुरस्कारों-फंडों से समर्थन और बल ही नहीं पा रहा, बल्कि ग्लोबलाइजेशन के दौर में वह अर्बन नक्सल/दिमागी नक्सल भौगोलिक और वैचारिक विस्तार पाता गया। फर्क यह है कि अर्बन नक्सल क्रांतिकारी विचार के पढ़ने – लिखने वाले विद्वान लोग होते थे और दिमागी नक्सल एक भीड़ है, जिसे पढ़ने और सोचने की जरूरत नहीं! धर्मांतरित हो रहे बाबासाहेब ने जब लाखों को अपने साथ धर्मांतरण करवाया तो वह भीड़ पढ़े-लिखे और किसी वैचारिक निष्कर्ष पर पहुंचकर धर्म नहीं बदल रही थी ! बस बाबासाहेब उनके सामने थे। जैसे सोहनलाल द्विवेदी ने गांधी बाबा के लिए कहा था: चल पड़े जिधर दो डग-मग में, बढ़ गये कोटि पग उसी ओर ,,, एक प्रभाव और तिलिस्म कायम होने भर की देर होती है, उसके बाद तो सब कुछ स्वत: स्फूर्त ढंग से होता जाता है। अन्ना-केजरी, वांगचुक-दीपके, प्रशांत-नेहा बस उसी का अपडेट वर्जन है।

 

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