Chhath Puja :​लोक आस्था के महापर्व पर गूँजे पारंपरिक स्वर..झारखण्ड भोजपुरी विकास केंद्र का ऑनलाइन छठोत्सव बना ऐतिहासिक

Bindash Bol

Chhath Puja : राँची …. लोक आस्था, प्रकृति प्रेम और अटूट अनुशासन के महापर्व छठ के पावन अवसर पर झारखण्ड भोजपुरी विकास केंद्र, राँची के तत्वावधान में एक गरिमामयी ऑनलाइन सांस्कृतिक आयोजन संपन्न हुआ। ‘कोपी-कोपी बोलेली छठी माई, सुनऽ ए सेवक लोग’ शीर्षक से आयोजित इस संगीतमय कार्यक्रम ने देश के विभिन्न महानगरों—राँची, पटना, जमशेदपुर, पुणे और बेंगलुरु—को एक ही सांस्कृतिक सूत्र में पिरोते हुए चहुँदिश छठमय और भक्तिरस से सराबोर वातावरण का सृजन किया।

भक्ति और वंदना से हुआ भव्य शुभारंभ

​संस्था के अध्यक्ष निरंजन प्रसाद श्रीवास्तव की अध्यक्षता और पूनम वर्मा के कुशल व सधी हुई संचालन में आयोजित इस वर्चुअल समारोह का विधिवत श्रीगणेश जमशेदपुर की प्रख्यात प्रस्तोता बीणा पाण्डेय ‘भारती’ द्वारा प्रस्तुत माँ वाग्देवी की वंदना ‘अब चुनरी चढ़ाइब ज्ञानदायिनी के’ से हुआ। इससे पूर्व, संस्था के सचिव बिनोद सिंह गहरवार ने स्वागत भाषण के माध्यम से देश के कोने-कोने से जुड़े सभी सम्मानित रचनाकारों, कलाकारों एवं श्रोताओं का हार्दिक अभिनंदन किया।

पारंपरिक लोकगीतों की सरिता में सराबोर हुए श्रोता

​कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण पारंपरिक छठ गीतों की एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियाँ रहीं, जिन्होंने लोकसंस्कृति की महक को जीवंत कर दिया…

* ​संगीता सहाय ने अमर हो चुके पारंपरिक गीत ‘पहिले-पहिले हम कइनी, छठी मइया बरत तोहार’ से समाँ बाँध दिया।

* ​बीणा पाण्डेय ‘भारती’ ने कार्यक्रम के केंद्रीय शीर्षक वाले गीत ‘कोपी-कोपी बोलेली छठी माई, सुनऽ ए सेवक लोग’ की मर्मस्पर्शी प्रस्तुति दी।

* ​उर्मिला सिन्हा ने ‘ओह पार चकवा भइया’ तथा रिम्मी वर्मा ने ‘भेल पराते छठी रहबु कहाँ’ के माध्यम से लोकगायन की गहराई को रेखांकित किया।

* ​हरेन्द्र सिन्हा ने ‘पनवा से पातर छठी मइया, फुलवा से बारी सुकुमार’ और गीता चौबे ‘गूंज’ ने ‘आगइल बड़का त्योहार छठी माई’ गाकर माहौल को पूरी तरह ऊर्जावान बना दिया।

* ​हिमकर श्याम ने छठ महापर्व की महत्ता को उकेरते हुए सुंदर दोहे प्रस्तुत किए।

* ​पुष्पा पाण्डेय (‘सोने के मंदिरवा सुरुज बाबा’), विंध्यवासिनी देवी (‘आईं मनाईं जा छठ त्योहार’) तथा पुणे से जुड़ीं रजनी सिन्हा (‘तोसे पुछिला देई हो गउरा देई’) ने अपनी सुरीली आवाज़ से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

* ​एडवोकेट अंजू भारती ने ‘अबकी कतिकवा हम छठ करब हे माई’ और संचालिका पूनम वर्मा ने ‘साँझ भइले छठी रहबू तू कहबू हे’ प्रस्तुत कर भावुक एवं भक्तिमय समागम तैयार किया।

* ​संस्था के पदाधिकारियों व वरिष्ठ सदस्यों—बिनोद सिंह गहरवार (‘रोज-रोज उगिला फजिरहीं ए आदित’), निरंजन प्रसाद श्रीवास्तव (‘होत पराते कोयिलिया बनवा बोले’) तथा सरोज श्रीवास्तव (‘कांच ही बाँस के बहंगिया’)—की प्रस्तुतियाँ इस आयोजन का मुख्य सोपान रहीं, जिन्होंने श्रोताओं से भरपूर दाद बटोरी।

सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण समय की माँग: निरंजन प्रसाद श्रीवास्तव

​समारोह के अध्यक्षीय उद्बोधन में निरंजन प्रसाद श्रीवास्तव ने छठ पूजा के आध्यात्मिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक महत्त्व पर गहन प्रकाश डाला। उन्होंने रेखांकित किया कि “छठ के ये पारंपरिक गीत केवल संगीत नहीं, बल्कि हमारी लोकसंस्कृति, पर्यावरण चेतना और सामूहिक आस्था की अमूल्य धरोहर हैं।” उन्होंने अपनी संस्कृति को सहेजने के इस अनूठे प्रयास के लिए सभी प्रतिभागियों और आयोजकों को शुभकामनाएँ दीं।

​कार्यक्रम के अंत में डॉ. उर्मिला सिन्हा ने वर्चुअल मंच से जुड़े सभी अतिथियों, कलाकारों और श्रोता-समुदाय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अनूठे ऑनलाइन आयोजन ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि दूरियाँ चाहे जितनी भी हों, लोकसंस्कृति की जड़ें हमेशा अपने लोगों को जोड़े रखती हैं।

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