Diwali 2026 : मिथिला की अनोखी दीपावली… जहाँ दीपों के पर्व में होती है पितरों की विदाई और सूप पीटकर भगाई जाती है दरिद्रता

Sushmita Mukherjee
  • मिथिला की अनोखी दीपावली: जहाँ दीपों के पर्व में बसती है लोकसंस्कृति और पूर्वजों के प्रति अगाध श्रद्धा

Diwali 2026 : ​दीपावली यानी दीपों का उत्सव—घर-आंगन में जगमगाते दीप, लक्ष्मी-गणेश की आराधना और सुख-समृद्धि की मंगल कामना। यह तस्वीर पूरे देश में इस पर्व की पहचान है, किंतु सांस्कृतिक धरोहर से समृद्ध मिथिला में दीपावली का स्वरूप अत्यंत अलौकिक, अनूठा और विशिष्ट है।
​यहाँ दीपों की झिलमिलाहट के बीच पितरों को भावभीनी विदाई देने के लिए ‘उल्का भ्रमण’ जैसी प्राचीन परंपरा निभाई जाती है, तो अगली सुबह महिलाओं द्वारा ‘सूप पीटकर’ दरिद्रता को घर से बाहर करने का अनूठा लोकाचार पूरा किया जाता है। कुलदेवता की वंदना से लेकर बच्चों के उत्साह से भरे ‘हुक्का-लोली’ तक, मिथिला की दीपावली धार्मिक आस्था, पितृ-ऋण के सम्मान और लोक-जीवन का एक अत्यंत सुंदर संगम है।

​गोसाईं घर से होती है संस्कारों की शुरुआत

​ मिथिलांचल में दीपावली के पावन अवसर पर सबसे पहले घर के गोसाईं घर यानी कुलदेवता के पवित्र पूजास्थल पर विशेष अनुष्ठान संपन्न होता है। यह पूजा मात्र एक कर्मकांड नहीं, बल्कि परिवार की सदियों पुरानी परंपराओं और पूर्वजों से जुड़े संस्कारों को स्मरण करने का पावन माध्यम है।
​इसके पश्चात घर के मुख्य द्वार, आंगन, तुलसी चौरा और कोनों-कोनों में दीप प्रज्वलित किए जाते हैं। मान्यता है कि इन दीपों की पावन ज्योति घर से नकारात्मकता को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा और बरकत का संचार करती है।

​जलती मशालों के साथ ‘उल्का भ्रमण’: पितरों को विदाई

​मिथिला की दीपावली की सबसे अनूठी और रहस्यमयी परंपराओं में ‘उल्का भ्रमण’ शामिल है। दीपावली की रात्रि में लोग हाथों में जलती हुई मशाल (उल्का) लेकर भ्रमण करते हैं।

  • ​पौराणिक एवं लोक मान्यता: महालय और पितृपक्ष के दौरान धरती पर आए पितरों को प्रकाशपुंज के माध्यम से उनके लोक की ओर विदाई दी जाती है।
  • ​मंत्रोच्चार: इस दौरान पारंपरिक उल्का भ्रमण मंत्रों का सस्वर पाठ किया जाता है, जिसके जरिए ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए उनके मंगलमय प्रस्थान की प्रार्थना की जाती है।

​यह परंपरा यह दर्शाती है कि मिथिला में दीपावली का उल्लास केवल भौतिक सुख-सुविधाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी पीढ़ी और पूर्वजों के बीच अटूट आत्मीयता का प्रतीक है।

​ हुक्का-लोली और उक्का-पाती: बाल्यकाल का उल्लास

​दीपावली की निशा में बच्चों के लिए ‘हुक्का-लोली’ का विशेष आकर्षण होता है। पुराने वस्त्रों और तिनकों से निर्मित जलती हुई गेंदनुमा आकृति को घुमाते हुए बच्चे इस लोक-उत्सव में उत्साह के साथ भाग लेते हैं।
​इसी प्रकार ‘उक्का-पाती’ की परंपरा भी मिथिला के ग्रामीण परिवेश और उसकी सहजीय उत्सवधर्मिता को जीवंत करती है। आधुनिकता के इस दौर में भले ही इन अनुष्ठानों के तौर-तरीकों में थोड़ा बदलाव आया हो, किंतु जनमानस का अपनी जड़ों और सांस्कृतिक संस्कारों से जुड़ाव आज भी अटूट है।

​सूप पीटकर दरिद्रता को विदाई देने की लोकरीति

​दीपावली की अगली भोर एक बेहद दिलचस्प लोकाचार लेकर आती है—महिलाओं द्वारा सूप पीटने की परंपरा।

  • ​इसे घर से दरिद्रता, अभाव और आलस्य को हमेशा के लिए बाहर भगाने का प्रतीक माना जाता है।
  • ​महिलाएं हाथों में सूप लेकर लयबद्ध तरीके से उसे बजाते हुए घर से बाहर जाती हैं, ताकि दरिद्र का निष्कासन हो और घर में माँ लक्ष्मी के साथ-साथ सुख-समृद्धि का स्थायी वास हो सके।

​सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की ज़िम्मेदारी

​मिथिला की ये गौरवशाली परंपराएँ यह साबित करती हैं कि दीपावली केवल रोशनी और आतिशबाजी का पर्व नहीं है। इसमें कुलदेवता की आराधना, पितरों के प्रति नतमस्तक श्रद्धा, लोक-जीवन की जीवंत अभिव्यक्ति और परिवार की खुशहाली की अनूठी स्वरलहरियाँ समाहित हैं।

​बदलते समय के साथ इन अमूल्य परंपराओं को समझना, सहेजना और आने वाली पीढ़ी तक पहुँचाना ही हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखने का सच्चा मार्ग है।

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