डॉ प्रशान्त करण
(आईपीएस) रांची
Diwali 2026 : आज सुबह की सैर के बाद पार्क में टहलनिहारों की अल्पकालिक बैठक में रवि बाबू फिर से अतिउत्साहित थे l लोगों के जमते ही ज्ञान बघारना प्रारम्भ कर दिया l
कहने लगे – जब से सोशल मिडिया जी जड़ें हमारे बीच गहरी होने लगीं , तब से विशेषकर हिन्दुओं के हर पर्व – त्यौहारों सजे – सजाए पोस्टों के ग्लैशियर फट कर बाढ़ ले आते हैं l दीपोत्सव में पोस्ट के पोस्टर में जलते दीप , लक्ष्मी जी के हाथों से बरसती स्वर्ण मुद्राओं के साथ यह श्लोक अंकित रहता है –
शुभं करो�ति कल्याणंमारोग्यं घनसंपदा ।
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्यो�तन�मोऽस्तुते ॥
हमारे समान सर्वसाधारण , मंदबुद्धि सामान्य जन इसे पढ़कर भावातिरेक में समझ बैठते हैं कि पोस्ट भेजने वाला व्यक्ति मेरे शुभ होने , कल्याण होने , आरोग्य और प्रचुर मात्रा में धन सम्पदा प्राप्त होने की कामना कर रहे है l इस भावातिरेक में हम श्लोक की दूसरी पंक्ति को पढ़ना ही भूल जाते हैं l दूसरी पंक्ति स्पष्ट कहती है कि शत्रु की बुद्धि का विनाश हो , ऐसे में हे दीप ज्योति आपको नमस्कार है l पोस्ट भेजने वाला आपका शत्रु है और आपका विनाश चाहता है l इसी के लिए वह अग्नि देव के प्रतिनिधि दीप ज्योति से श्लोक भेजकर प्रार्थना कर रहा है l उसे आपकी उन्नति , प्रगति , समृद्धि फूटी आँख नहीं सुहाती l नादान लोग समझ बैठते हैं कि अगला उसके शत्रुओं के विनाश की कामना कर रहा है l भाईसाहब ! अगले को मेरे शत्रुओं से क्या लेना ? वस्तुतः वही मुझे अपना शत्रु इस श्लोक के माध्यम से चतुराई से घोषित कर मेरे अमंगल की कामना कर रहा है l कहते – कहते उत्तेजना में रवि बाबू की साँसे फूलने लगी l तभी रामलाल कूद पड़े l बोले – रवि बाबू , आपकी खोपड़ी ही उल्टी है l अच्छे भले श्लोक का आपने ऐसा वीभत्स अंत्यपरीक्षण कर दिया l
इसकी पहली पंक्ति का आधुनिक अर्थ यह है कि श्लोक भेजने वाला अपने सुख – समृद्धि – आरोग्य और धन सम्पदा स्वयं के लिए मांग रहा है , जो उसे आपके माध्यम से चाहिए l हाँ नहीं तो !
तभी दिवाकर बाबू बोले – आपलोग श्लोक के अर्थ का अनर्थ कर रहे हैं l दीवाली असल उसे कहते हैं , जब इस महान त्यौहार में भरे – पूरे परिवार के कर्ता का दिवाला निकले l सभी सदस्यों की अपनी – अपनी माँग आती है l अच्छे कपड़े – लत्ते , कंगन – हार जैसे स्वर्णाभूषण , सजावट , सफाई , पटाखे आदि l बेचारा कर्ता इसे पूरी करने में पतला हो जाता है और सब की मांगें पूरी करे तो उसका दिवाला निकलने से उसे कौन बचा सकता है l फिर लक्ष्मी पूजन का दक्षिणा , वस्त्रादि भी तो मुझे देंगे ! मैंने तो अपने जजमानों को इसकी याद दिलाने के लिए यही श्लोक आज उठते ही भेजा है !
यह सुनते ही बैठक उठ गयी l सतर्क होकर चिंतित मैं लौट आया हूँ l