Diwali 2026: दीपावली का पावन पर्व रोशनी, उल्लास और मां लक्ष्मी की आराधना का प्रतीक है। इस दिन देश भर में लोग अपने कारोबार और घरों में बरकत के लिए विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। लेकिन मध्य प्रदेश के दमोह जिले में इस त्योहार से जुड़ी एक ऐसी अनूठी और खूबसूरत परंपरा निभाई जाती है, जो समाज में आपसी प्रेम, सद्भाव और सकारात्मकता की एक बेहतरीन मिसाल पेश करती है।
यहाँ दीपावली के खास मौके पर लोगों को केवल मां लक्ष्मी का ही नहीं, बल्कि किन्नर समाज के आगमन का भी बेसब्री से इंतजार रहता है।
व्यापार में बरकत का अटूट विश्वास
आम दिनों में किन्नरों को लेकर समाज की सोच कई बार संकुचित नजर आती है, लेकिन दमोह में दीपावली, धनतेरस से लेकर देवउठनी एकादशी तक का समय किन्नरों के विशेष सम्मान और उनके आशीर्वाद का होता है।
स्थानीय व्यापारियों और आम जनता का यह अटूट विश्वास है कि इस त्योहारी सीजन में यदि किन्नर उनकी दुकान या आंगन में कदम रख दें और ढोलक की थाप पर दुआएं दें, तो व्यापार में ‘दिन-दूनी रात-चौगुनी’ बरकत होती है। लोग मानते हैं कि किन्नर शुभता के प्रतीक हैं और उनकी दुआओं में एक खास असर होता है।
क्या है ‘दुआ का सिक्का’ और इसका महत्व?
दमोह के बाजारों में बरसों पुरानी यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ जीवित है…
- सौहार्द का अनूठा मिलन: दीपावली के इन दिनों में किन्नरों की टोलियां शहर के हर घर और हर छोटी-बड़ी दुकान तक पहुंचती हैं। यहाँ धर्म और जाति के तमाम बंधन टूट जाते हैं और हर वर्ग के लोग उनका दिल से स्वागत करते हैं।
- आदर-सत्कार और आवभगत: दुकानों और घरों के बाहर ढोलक की गूंज और थाप के बीच किन्नरों का सत्कार किया जाता है। उन्हें आदर के साथ बैठाकर चाय-नाश्ता कराया जाता है और लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार उन्हें दान-दक्षिणा देते हैं।
- तिजोरी में रखा जाने वाला ‘दुआ का सिक्का‘: इस आदर-सत्कार के बदले में किन्नर दुकानदारों को ‘दुआ का सिक्का’ भेंट करते हैं। व्यापारी इस सिक्के को अपनी तिजोरी या गल्ले में पूरी पवित्रता और संभाल कर रखते हैं, ताकि साल भर उनके यहाँ बरकत और उन्नति बनी रहे।
इस अनोखी परंपरा को लेकर न केवल स्थानीय लोगों में भारी उत्साह रहता है, बल्कि यह इस बात का भी प्रमाण है कि जब समाज में दुआओं और सम्मान का आदान-प्रदान होता है, तो त्योहारों की चमक और अधिक बढ़ जाती है।