Diwali 2026 : दीपावली का नाम आते ही मन में झिलमिलाते दीपों, आतिशबाजी और रोशनी से सजे घरों की तस्वीर उभर आती है। बदलते वक्त के साथ हमारे घरों की सजावट का तरीका भी बदला है। पारंपरिक मिट्टी के दीयों की जगह अब रंग-बिरंगी प्लास्टिक की एलईडी लड़ियों (Chinese LED Lights) और इलेक्ट्रॉनिक डेकोरेशन ने ले ली है। बाजार में मिलने वाली ये चमकदार लड़ियां भले ही देखने में आकर्षक और सस्ती लगती हैं, लेकिन पर्यावरण के जानकारों और डेटा-बेस्ड रिसर्च के अनुसार, ये हमारे पर्यावरण को भारी कीमत पर पड़ रही हैं।
आइए, पारंपरिक कुम्हारों के चाक से बने दीयों के ‘इको-फ्रेंडली लाइफसाइकिल’ और इलेक्ट्रॉनिक कचरे (E-Waste) में बदलती इन विदेशी लड़ियों के बीच के फर्क को आंकड़ों के आईने में समझें।
1. माटी के दीये: ‘क्रैडल टू क्रेडल’ चक्र
भारतीय कुम्हारों के चाक पर बनने वाले मिट्टी के दीये सस्टेनेबिलिटी का सबसे बेहतरीन उदाहरण हैं। विज्ञान की भाषा में इसे ‘क्रैडल टू क्रेडल’ मॉडल कहा जाता है—यानी जहां से शुरुआत, अंत भी वहीं।
- ज़ीरो कार्बन फुटप्रिंट (Zero Carbon Footprint): कच्ची मिट्टी को आकार देकर धूप में सुखाया जाता है और फिर पारंपरिक भट्टियों में पकाया जाता है। इसमें किसी भी तरह के जहरीले रसायन (Chemicals) का इस्तेमाल नहीं होता।
- मिट्टी में वापस विलय: दीपावली बीतने के बाद यदि दीये टूट भी जाएं, तो वे कचरा नहीं बनते, बल्कि वापस अपनी मूल अवस्था यानी मिट्टी में मिल जाते हैं।
- स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल: इन दीयों को खरीदने से सीधे तौर पर ग्रामीण कारीगरों, कुम्हारों और स्थानीय अर्थव्यवस्था को संबल मिलता है, जिससे कार्बन उत्सर्जन ट्रांसपोर्टेशन के स्तर पर भी न्यूनतम रहता है।
2. चीनी एलईडी लड़ियां: ई-वेस्ट और ‘कार्बन बम’ का जाल
दूसरी ओर, बाजार में धड़ल्ले से बिकने वाली प्लास्टिक कोटेड और एलईडी लाइट्स दिखने में भले ही बिजली की कम खपत का दावा करें, लेकिन उनका पूरा लाइफसाइकिल पर्यावरण के लिए एक बड़ी आपदा है।
- जीवाश्म ईंधन और प्लास्टिक पर निर्भरता: ये लड़ियां सिंथेटिक प्लास्टिक, पीवीसी (PVC), कॉपर वायर और विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक चिप्स से बनती हैं, जिनके निर्माण में भारी मात्रा में जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) का उपयोग होता है और भारी कार्बन उत्सर्जन होता है।
- लैंडफिल और ई-वेस्ट का संकट: एक सीजन (मुश्किल से 1 या 2 साल) चलने के बाद ये लड़ियां खराब होकर सीधे कूड़ेदान या लैंडफिल में पहुंचती हैं। प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरा (E-Waste) सैकड़ों वर्षों तक सड़ता नहीं है और मिट्टी तथा भूजल में जहरीले तत्व (जैसे लेड और कैडमियम) छोड़ता है।
- लंबा सप्लाई चेन कार्बन फुटप्रिंट: चीन या अन्य फैक्ट्रियों से मीलों का सफर तय कर ये उत्पाद हमारे बाजारों तक पहुंचते हैं, जिसके ट्रांसपोर्टेशन में भारी मात्रा में ईंधन जलता है।
3. डेटा और पर्यावरण पर सीधा असर: एक तुलनात्मक नजर
पैमाना – पारंपरिक मिट्टी के दीये चीनी प्लास्टिक/एलईडी लड़ियां
* कच्चा माल (Raw Material)प्राकृतिक स्थानीय मिट्टीप्लास्टिक, पीवीसी, कॉपर, सेमीकंडक्टर
* ऊर्जा स्रोत (Energy Source)सरसों का तेल / घी (रिन्यूएबल)थर्मल पावर या ग्रिड बिजली
* अपशिष्ट प्रबंधन (Waste Management)शत-प्रतिशत बायोडिग्रेडेबल (जैविक रूप से नष्ट)खतरनाक ई-वेस्ट (E-Waste) और प्लास्टिक कचरा
* पर्यावरणीय प्रभाव (Environmental Impact)सकारात्मक / तटस्थदीर्घकालिक प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग में वृद्धि
रोशनी ऐसी हो जो भविष्य को अंधकार में न धकेले
दीपावली का असली अर्थ प्रकाश फैलाना है, न कि पर्यावरण के रास्ते में अंधेरे के कांटे बोना। इस बार त्योहार पर अपने घर को रोशन करते समय यह सोचना जरूरी है कि क्या हमारी कुछ दिनों की कृत्रिम चमक हमारी आने वाली पीढ़ियों के पर्यावरण को दांव पर लगा रही है?
इस दीपावली, चीनी लड़ियों के बहिष्कार और मिट्टी के दीयों को अपनाकर न सिर्फ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ें, बल्कि धरती को भी सांस लेने का मौका दें।