रोहित धर्मेंद्र
Saiyaara : सिनेमाघरों से लेकर बॉक्स ऑफिस तक अभी अगर किसी फिल्म का कब्जा बना हुआ है तो वह रोमांटिक थ्रिलर सैयारा है। अहान पांडे (Ahaan Panday) और अनीत पड्डा (Aneet Padda) स्टारर ये मूवी रिलीज के पहले दिन से धुआंधार कलेक्शन करती हुई आगे बढ़ रही है। सैयारा’ दिन प्रतिदिन न सिर्फ कमाई के मामले में मेकर्स का दिल जीत रही है, बल्कि लोगों की फेवरेट फिल्म भी बनती जा रही है। फिल्म को लेकर लोग थिएटर में ही अपनी इमोशंस बयां कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर तो फिल्म को लेकर लोग अपना प्यार खुलकर जाहिर कर रहे हैं। फिल्म को लेकर लोग अपना रिएक्शन भी दे रहे हैं।
“एक लड़की है…
मुंबई में रहती है। हिंदी साहित्य से ऑनर्स किया है, फिर जर्नलिज्म। निब पेन से में गाने लिखती है। शराब नहीं पीती। सिगरेट नहीं पीती। क्रिएटिव इंडस्ट्री में होने के बाद भी सिगरेट में भरकर गांजा नहीं पीती। पेरेंट्स के साथ घर पर रहती हैं। रात साढ़े आठ बजे तक हर हाल में घर लौट जाती है। बिल्कुल धीरे-धीरे बोलती है। स्लीव वाली प्रिंटेड कुर्तियाँ पहनती है। महिला सशक्तिकरण का झंडा बुलंद नहीं करती। मल्टीपल रिलेशनशिप में नहीं हैं। सबसे ऊपर बेइंतहा खूबसूरत है। ऐसी लड़की किस लड़के को नहीं चाहिए?
एक लड़का है…
बेहद टैलेंटेड है। कंप्रोमाइज नहीं करता। रीढ़ की हड्डी है। सुंदर भी है, केयरिंग भी। माँ नहीं है। बाप शराबी है। यानी परिवार नहीं है। प्रेमिका के नखरे उठाता है। जब करियर और प्रेम में एक को चुनना है तो प्रेम को चुनता है। बीमार प्रेमिका को अलार्म लगाकर दवाइयाँ देता है। बाइक में कपड़े से बाँधकर अपने साथ बैठाता है। पहली डेट में हिज प्लेस या हर प्लेस की बात नहीं करता। रॉकस्टार जैसा रुतबा होने के बाद कोई और लड़की जीवन में नहीं है। सब कुछ होने के बाद पागलों की तरह प्रेमिका को खोजता है। उस प्रेमिका को जो उसका नाम, पहचान सब भूल गई है। ऐसा लड़का किस लड़की को नहीं चाहिए?
सैयारा दरअसल सूरज बड़जात्या की विवाह जैसी फिल्मों का मॉर्डन रिमिक्स वर्जन है। विवाह का हर किरदार वैसा था जैसा वह हो नहीं सकता पर होना चाहता है। सैयारा फिल्म के सफल होने की ताकत भी यहीं पर छिपी है। हर लड़के को वानी चाहिए और हर लड़की को प्रिंस। ये वाला नहीं जिसके साथ वह टिकट खरीदकर फिल्म देखने आई या आया है।
अरसे बाद किसी प्रेम कहानी में आंसुओं का इस्तेमाल है। अरसे बाद चीख-चीखकर आई लव यू की घोषणा नहीं है। अरसे बाद किसी प्रेम संबंध में बेवफाई वाला एंगेल नहीं है।
एक फिल्म के तौर पर ढेरों खामियाँ बटोरे यह फिल्म अपने क्लाइमेक्स में बेहद प्रेडिक्टेबल और हल्की हो जाती है। इतनी कि लगा कि हम थ्री इडियट को फिर से देख रहे हैं। रैंचो का मनाली में मिलना निश्चित ही था।
सैयारा फिल्म के दौरान बहुत सारे लोग रोते हुए दिखे। कुछ रील बनाने के लिए और कुछ असली में। इस फिल्म के पास निश्चित ही रुलाने जैसी इंपैक्टफुल कहानी नहीं थी, न ही लिखावट। पर जिन दो चेहरों को यह फिल्म अपने साथ रखती है वह इस रोल में इतने ईमानदार लगते हैं कि हमें उनसे एक तरह का जुड़ाव सा लगता है।
फिल्म कई सारी हिंदी फिल्मों का कॉकटेल भी है। एक सामान्य सिनेमा दर्शक यह बता देगा कि यह फिल्म एक साथ कितनी फिल्मों से प्लाट उठाती है। बावजूद इसके यह फिल्म फ्रेश लगती है। जब कोई फिल्म किसी दर्शक को फ्रेश लगे तो यकीन मानिए कि हमारे पास घिसी पिटी कहानियों से ज्यादा घिसे पिटे चेहरों का संकट है, जो उकताहट के हद तक खुद को रिपीट किए जा रहे हैं।
