रमेश कुमार
Independence Day : आज के समय में स्वतंत्रता दिवस जैसे पवित्र अवसर को लेकर एक विचित्र मानसिकता बन चुकी है। बहुतों के लिए यह दिन न राष्ट्रगौरव का स्मरण है, न शहीदों की कुर्बानी का, बल्कि मात्र ऑफिस या स्कूल में छुट्टी का दिन है। जैसे कोई त्योहार हो, जिसका अर्थ बस घर पर आराम करना, फिल्म देखना, या बाज़ार घूमना भर रह गया हो।
परन्तु क्या सचमुच यही स्वतंत्रता दिवस का अर्थ है? क्या यह दिन इसलिए आया कि हम देर तक सो सकें और काम से बच सकें? नहीं—यह दिन इसलिए आया कि हमें याद रहे, हमारी सांसें, हमारी बोलने की आज़ादी, हमारे सपने—ये सब किसी की बलिदानी विरासत हैं। 15 अगस्त की सुबह जब तिरंगा फहराया जाता है, तो वह केवल एक कपड़े का टुकड़ा नहीं होता, बल्कि उसमें लाखों बलिदानों की आहट गूँजती है।
आज के परिवेश में समस्या यह है कि हम स्वतंत्रता को given मान चुके हैं—जैसे यह कोई जन्मसिद्ध अधिकार हो जो हमेशा हमारे पास रहेगा। हमें यह भूलने की आदत हो गई है कि स्वतंत्रता को पाने के लिए कितनी पीढ़ियों ने अपने वर्तमान को जला दिया ताकि हमारा भविष्य उज्ज्वल हो सके। स्कूल के बच्चे इसे बस एक “फ्लैग होस्टिंग और मिठाई” का दिन समझते हैं, दफ्तरों के लोग इसे “लॉन्ग वीकेंड” का मौका। देशभक्ति केवल सोशल मीडिया पोस्टों में रह गई है, जहाँ तिरंगे की तस्वीरें लगाकर समझ लिया जाता है कि “कर्तव्य पूरा हो गया।”
लेकिन सच्चा स्वतंत्रता दिवस वह है, जब हम एक दिन के लिए नहीं, बल्कि हर दिन अपने भीतर उस चेतना को जीवित रखें कि देश की स्वतंत्रता को बनाए रखना भी उतना ही कठिन है जितना उसे पाना। भ्रष्टाचार से लड़ना, समाज में समानता लाना, कानून का सम्मान करना—ये सब उस आज़ादी की सुरक्षा के पहरेदार हैं।
छुट्टी का दिन तो कैलेंडर में साल में दर्जनों बार आता है। पर स्वतंत्रता दिवस, छुट्टी से कहीं बड़ा है—यह आत्मनिरीक्षण का दिन है। यह पूछने का दिन है कि “क्या मैं इस आज़ादी के योग्य नागरिक हूँ?” और अगर जवाब शर्मिंदा करता है, तो उस शर्म को बदलने का संकल्प लेने का दिन है।
अतः, स्वतंत्रता दिवस को केवल आराम के अवसर की तरह मत देखिए। इसे उस ऋण के स्मरण का दिन बनाइए, जो हम पर उन शहीदों का है, जिन्होंने अपने लिए कुछ नहीं, बल्कि हमारे लिए सब कुछ त्याग दिया। छुट्टी तो हर कोई मना लेता है—पर स्वतंत्रता दिवस को मनाना, समझना, और जीना—यह केवल सच्चा नागरिक ही कर सकता है।
