सर्वेश तिवारी श्रीमुख
Janmashtami : बसुदेव जी एकाएक ठिठक गए! दूर दूर तक जल ही जल, जमुना जी का दूसरा घाट दिख ही नहीं रह था। लहरें इतनी ऊँची ऊँची जैसे समूचे संसार को डुबोने निकली हों… एक क्षण के लिए कांप ही गए…
ऐसा भी नहीं था कि उन्होंने जमुनाजी का यह रूप कभी देखा ही न हो, पर वे दिन और थे जब सावन भादो की उफनती नदी को झटपट तैर कर पार कर जाते थे। पर अब? वर्षों से उस अंधेरी कालकोठरी में बंदी व्यक्ति अपनी कमजोर काया पर क्या ही विश्वास कर पाता? बल,शौर्य, साहस… सदैव एक बराबर तो नहीं रहते न… आल्हा वाले बूढ़े गाते थे- गइल जवानी फेर ना लौटी, केतनो घीव मलीदा खाय…
पर उनके शीश पर जो था, वह तो समस्त संसार का विश्वास था न! फिर कैसे न पार उतरते वे… अपने शीश पर उठाना हो तो उन्हें ही उठाइये, वे जीवन की हर यमुना को पार करा देंगे।
उन्होंने माथे से कुछ पल के लिए टोकरी उतारी, बालक की आंखों में देख कर बोले- और महाराज? देख रहे हैं जमुनाजी को? कैसे पार किया जाएगा?
बालक के मुख पर मुस्कान उभरी। पिता भी मुस्कुरा उठा। एक क्षण के लिए सारी विपत्ति, सारा भय समाप्त हो गया… वे फिर बोले- “तुम तो देवता हो न? कंस के अत्याचार से संसार को बचाने आये हो? पर इन लहरो से हमें कौन बचाएगा लल्ला?” कहते कहते फिर मुस्कुरा उठे पिता… यमुना जी भी जैसे सुन रही थीं पिता-पुत्र का संवाद… लहरों का गर्जन मंद होने लगा।
वसुदेव जी ने गालों पर थपकी दी। कहा, “चलो भई! रुकने से काम नहीं चलता… पार करना है तो सबसे पहले नदी में उतरना ही होगा… तो देवता! नदी में उतरना और लहरों से लड़ते हुए बढ़ते जाना हमारे हिस्से, और इन भयानक लहरों को रोकना तुम्हारे जिम्मे…” टोकरी फिर माथे पर चढ़ गई…
उन्होंने ईश्वर का स्मरण किया और जल में उतर गए। भय त्याग दिया, केवल कर्म याद रहा। यदि डूबना ही नियति है तो डूबेंगे, पर रुकेंगे नहीं। रुकना, किसी की प्रतीक्षा करना, किसी को दोष देना, इससे काम नहीं चलता… समर में उतरेंगे, लड़ेंगे, आगे बढ़ेंगे, हार-जीत उसके हिस्से…
सोचिये न! जो यमुना जी चरण छू कर उतरीं, वे यूँ भी शांत हो सकती थीं। उनके आने के पहले ही शांत हो जातीं… अरे बारिश ही रुक जाती, अंधेरा छंट जाता, पुल बन जाता… पर नहीं दोस्त! कर्म न करने वाले को फल नहीं देता वह… हिसाब में बहुत कठोर, रत्ती भर इधर उधर नहीं…
वसुदेवजी लड़े। साहस किया, अथाह जल में उतरे। उसके ऊपर भरोसा किया। फिर उसके लिए तो चुटकी का खेल था… यमुना जी चढ़ीं, चरण छुआ, उतर गईं… और वे भी पार उतर गए…
उसके ऊपर भरोसा रखिये, और साहस के साथ अपना कर्तव्य निभाइए। पार उतारना तो चुटकी का खेल है उसके लिए…. है न?
