Indian Politics : यह देश कृषि प्रधान नहीं, कुर्सी प्रधान देश है। बाबू से लेकर राष्ट्रपति तक, मुखिया से लेकर जिला अध्यक्ष तक, विधायक से लेकर सांसद तक सबकी अपनी-अपनी कुर्सी है, जिससे वे चिपके रहते हैं फेविकोल की तरह। सरकारी दफ्तरों में कुर्सियाँ कचरे की तरह बिखरी हुई हैं-बाबू और बड़ा बाबू, किसिम -किसिम के सचिव-अवर सचिव, उप सचिव, संयुक्त सचिव, अपर सचिव, सचिव, प्रधान सचिव, अपर मुख्य सचिव, मुख्य सचिव के लेबल के साथ।
ये कुर्सियाँ पहले आसन और सिंहासन कही जाती थीं।
एकबार मैंने सपने में देखा था-पुरानी कुर्सियों की क्लीयरेंस सेल लगी थी। स्वर्गलोक से मर्त्यलोक तक, इन्द्र से इन्दिरा और मोरारजी से मनमोहन सिंह तक की सभी भूतपूर्व विंटेज कुर्सियाँ अभूतपूर्व छटा के साथ बिक्री के लिए सजी थीं।
आजाद भारत की पहली कुर्सी बैठने वाला शिक्षा से अंग्रेज, संस्कृति से मुसलमान और और संयोग हिन्दू था। सारे देश में बैलों की जोड़ी हाँकते हुए सत्रह वर्षों तक इस पर आसीन रहा। वह हाथी-दाँत की मीनार में रहता था। उसे विश्वास था कि पंचशील नामक पाँच टाँगोंवाली टिटहरी दुनिया में लड़ाई नहीं होने देगी। यह टिटहरी भारत पर चीन द्वारा अचानक आक्रमण के बाद भारत-चीन सीमा पर चोंच बाये मरी पायी गई।
एक कुर्सी के बारे में सौदागर ने बतलाया कि वह देहाती काठ से बनी हुई है, जिसमें असरा नहीं है, मात्र हीर ही हीर हाई। उस कुर्सी के एक हत्थे पर ‘जय जवान’ और दूसरे पर ‘जय किसान’ लिखा था। इस पर ठिगने कद का बहुत ऊँचा आदमी बैठता था, एकदम अनासक्त भोगी। वह जनता से अपनी बात नहीं मनवाता था, जनता की बात वह स्वयं मानता था। जब दुश्मनों ने ‘रन’ और ‘घाटियों’ में ललकारा तो उसने उनके छक्के छुड़ा दिया। पता नहीं क्या हुआ? वह ताशकंद की वादियों में कहीं खो गया।
आगे ‘प्रियदर्शनी’ मार्का कुर्सी थी। कहते हैं कि यह चालीस साल में बनी। नैनी सेंट्रल जेल में यह बनना शुरू हुई और ताशकंद की त्रासदी के बाद इसका निर्माण पूरा हुआ। इसपर बैठनेवाली को गूँगी गुड़िया कहा गया। वह सचमुच प्रियदर्शनी थी और लोहियाजी ने उसे ‘चमेली’ कहा था। लेकिन जब उसके भीतर सोये हुए तानाशाही संस्कार ने जोर मारा तब ‘कामराज’ हाशिये पर चले गए, संविधान कूड़ेदान में चला गया और देश में आपातकाल शुरू हुआ। लोकतंत्र की चारों टाँगों को लकवा मार गया। उसके चाटुकारों ने उसे भारत माता बना दिया था।
इस बीच चौथे आमचुनाव के बाद विभिन्न राज्यों में बनी कुर्सियाँ भी मौजूद थीं। ये कुर्सियाँ बिकाऊ नहीं थीं, अलबत्ता इनपर बैठनेवाले जरूर बिकाऊ थे। वे सौदेबाजी और दलबदल में आस्था रखते थे। इनपर बैठनेवालों ने राजनीति का मुँह काला कर दिया। उन्होंने राजनीतिक इतिहास में दलीय स्वार्थ, भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार, घेराव, लात-जूता के स्वर्णिम अध्याय जोड़े।
सम्पूर्ण क्रान्ति की आँधी में प्रियदर्शनी छाप कुर्सी उड़ गई। यह नयी कुर्सी देखिये। इसे जयप्रकाश नारायण ने जनता की सरकार को उपहार में दिया और इसपर बैठने वाला भूतपूर्व कांग्रेसी था। उसके सहयोगियों ने ही इस कुर्सी को तोड़ दिया और प्रियदर्शनी छाप कुर्सी रंग बदलकर फिर आ गई। इसपर पुनः आसीन वाली अपने ही अंगरक्षकों के द्वारा गोलियों से छलनी कर दी गई।
इस अद्भुत कुर्सी को देखिए। बड़े-बड़े सूरमा-भोपाली इसके दावेदार थे। लेकिन खानदानी ओहदेदार के आगे उनकी एक न चली। वह पायलट की कुर्सी से सीधे देश की कुर्सी पर विराजमान हो गया लेकिन पाँच सालों में बोफोर्स तोप ने कुर्सी को उड़ा दिया।
उसके आगे कुछ टूटी-फूटी कुर्सियाँ थीं जिनपर दुर्घटनावश लोग आसीन हुए। फिर एक ऐसी कुर्सी दिखी जो पाँच साल में बदल गई क्योंकि इसपर बैठनेवाला राजनीति में शुचिता की बात करता था। आगे कॉंग्रेसी ट्रेड मार्क की एक और कुर्सी दिखी जिसपर बैठनेवाला एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर कहलाया।
कुर्सियों के लिये बड़े-बड़े जंग हुए। जो काबिज है, वह हटना नहीं चाहता और जो मरहूम है वह हर हाल में उसे पाना चाहता है। कुर्सी के लिए कलियुग में एक राजकुमार ने अश्वमेध यज्ञ किया। यज्ञ के घोड़े की जगह स्वयं को देश भर में घूमा। लेकिन कुर्सी नहीं मिली। कुर्सियों के लिए तरह-तरह तिकड़म होते हैं, जोड़-तोड़ और सैद्धान्तिक मतभेदों के बावजूद अपावन गठबन्धन होते हैं।
इन कुर्सियों पर बैठनेवाले इंद्रधनुषी रंगों में वादों और तंत्रों की तुलिकाओं से आदर्श के आकाश में आकर्षक चित्र बनाते प्रतीत होते हैं। उन तुलिकाओं से गिरे रंगों से मानवता का सील भरा फर्श बदरंग हो जाता है। सत्ता के आवारा बोलों पर इंसान की मजबूरियाँ अभिसार करती हैं। लोकशाही में राजशाही बदस्तूर कायम है। लेकिन ये मजबूरियाँ जब क्रांति की आँधी बन जाती हैं तो बड़ी-बड़ी कुर्सियाँ उसमें उड़ जाती हैं। लेकिन ये कुर्सियाँ रँग बदलकर फिर आ जाती हैं। इन कुर्सियों का रंग बदलता है, ट्रेड मार्क बदलता है लेकिन आम आदमी की किस्मत नहीं बदलती।
Indian Politics : किस्सा कुर्सी का
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