Indian Politics : भारतीय राजनीति, धर्म और अखाड़े की त्रिवेणी कब कौन सा नया रंग दिखा दे, इसका अनुमान लगाना किसी के बस की बात नहीं है। कभी एक-दूसरे को जेल भेजने की हुंकार भरने वाले ब्रजभूषण शरण सिंह और योग गुरु बाबा रामदेव के बीच का चार साल पुराना घमासान अब एक ऐसे मोड़ पर आ गया है, जिसे देखकर दर्शक दीर्घा से लेकर मीडिया तक हर कोई हैरान है।
जब प्राणायाम और राजनीति में छिड़ गया था ‘कुरुक्षेत्र’
पिछले कुछ वर्षों से दोनों दिग्गजों के बीच ज़बानी जंग अपने चरम पर थी। कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष ब्रजभूषण शरण सिंह का मानना था कि पहलवानों के धरने के पीछे बाबा रामदेव पर्दे के पीछे से ‘भस्त्रिका प्राणायाम’ जैसी रणनीतियां चला रहे हैं।
इसके जवाब में, बाहुबली नेता ने पतंजलि के उत्पादों और तेल-घी की शुद्धता पर ऐसे तीखे सवाल उठाए कि हरिद्वार से लेकर दिल्ली तक सियासी पारा हाई हो गया था। बात तब और बिगड़ गई जब बाबा रामदेव ने ब्रजभूषण पर सीधा 50 करोड़ रुपये का मानहानि का मुकदमा ठोक दिया और ब्रजभूषण ने भी दो टूक कह दिया कि वह माफी नहीं मांगेंगे, चाहे जेल क्यों न जाना पड़े।
संतों की एंट्री और ‘प्रशासनिक ब्रह्मास्त्र’
जब टकराव कुरुक्षेत्र की ओर बढ़ रहा था, तभी सनातन परंपरा का सबसे पुराना और असरदार फॉर्मूला सामने आया।
* संतों का हस्तक्षेप: अयोध्या के महंत राजकुमार दास और दाऊ महाराज ने मध्यस्थता करते हुए समझाया कि सनातन की ताकत आपस में ‘धोबी पछाड़’ लगाने के लिए नहीं है।
* आईएएस की कूटनीति: इस समझौते में अहम भूमिका निभाई पूर्व आईएएस अधिकारी एन.पी. सिंह ने, जो आजमगढ़ और नोएडा का प्रशासनिक तजुर्बा रखने के बाद अब पतंजलि आईएएस एकेडमी संभाल रहे हैं।
उनकी सूझबूझ से प्रशासनिक संधिवार्ता सफल हुई और 50 करोड़ का कानूनी शिकंजा देखते ही देखते कपूर की तरह उड़ गया।
ऑस्कर-लेवल क्लाइमेक्स: जब पत्रकारों को मिले घी के डिब्बे!
इस ऐतिहासिक युद्ध-विराम का सबसे दिलचस्प हिस्सा वह प्रेस कॉन्फ्रेंस रही, जहां बाबा रामदेव ने पत्रकारों के हाथों में दो-दो किलो घी के डिब्बे थमा दिए। बाबा ने मुस्कुराते हुए ऐसा दार्शनिक फरमान जारी किया कि अच्छे-अच्छे वैज्ञानिक भी सोच में पड़ जाएं…
”एक डिब्बा लैब में टेस्ट करने के लिए और दूसरा डिब्बा घर पर गरमा-गरम परांठे चुपड़ने के लिए!”
कल तक एक-दूसरे के विरोधी रहे दोनों दिग्गज अब ‘सनातनी बिछड़े भाई’ की तर्ज पर एक मंच पर नजर आए। जनता और पत्रकार अब यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि यह शुद्ध प्रेम है या ‘देसी घी का चमत्कार’।
फिलहाल, अखाड़े की पुरानी खुंदक को ‘शवासन’ में सुला दिया गया है, लेकिन देखना यह दिलचस्प होगा कि यह ‘घी-मारका’ भाईचारा सियासत के इस अखाड़े में कितने दिन तक बिना कोलेस्ट्रॉल बढ़ाए टिक पाता है!
