* हार का ठीकरा किस पर फूटेगा? क्रॉस वोटिंग के आरोपों से झारखंड की राजनीति में मचा घमासान!
* हेमंत सोरेन के दिल्ली दौरे से राजनीतिक अटकलें तेज
* सरयू राय ने BJP-कांग्रेस मुक्त सरकार का फॉर्मूला दिया
Jharkhand : झारखंड में राज्यसभा चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद महागठबंधन के भीतर सियासी घमासान तेज हो गया है। कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और भाकपा-माले के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की अप्रत्याशित हार और झामुमो के बैजनाथ राम तथा भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी की जीत ने राज्य की राजनीति में नए समीकरणों और संभावित बदलावों की चर्चा छेड़ दी है।
क्रॉस वोटिंग पर महागठबंधन में मचा बवाल
राज्यसभा की दो सीटों के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की हार के बाद सबसे बड़ा सवाल क्रॉस वोटिंग को लेकर उठ खड़ा हुआ है। कांग्रेस का आरोप है कि गठबंधन सहयोगी राजद और भाकपा-माले के कुछ विधायकों ने पार्टी के साथ विश्वासघात करते हुए एनडीए समर्थित उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किया।
झारखंड कांग्रेस के प्रभारी के. राजू ने चुनाव परिणाम के बाद कहा कि कांग्रेस और झामुमो के विधायकों ने पूरी निष्ठा से पार्टी उम्मीदवार का समर्थन किया, लेकिन राजद और भाकपा-माले के कुछ विधायकों ने गठबंधन धर्म नहीं निभाया। उनके अनुसार इसी वजह से कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा।
राजद का पलटवार – कांग्रेस पहले अपने घर को संभाले
कांग्रेस के आरोपों पर राजद ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। झारखंड सरकार में मंत्री और राजद नेता संजय प्रसाद यादव ने कहा कि लालू प्रसाद यादव की विचारधारा कभी भाजपा और आरएसएस से समझौता नहीं कर सकती। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस अपनी आंतरिक गुटबाजी छिपाने के लिए राजद और माले को निशाना बना रही है।
संजय यादव ने कहा कि कांग्रेस के विधायक कई गुटों में बंटे हुए हैं और यदि कहीं क्रॉस वोटिंग हुई है तो उसकी जांच कांग्रेस को अपने भीतर करनी चाहिए, न कि सहयोगी दलों पर आरोप लगाने चाहिए।
राजद के राष्ट्रीय महासचिव भोला यादव ने भी कांग्रेस के आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि पार्टी के सभी विधायकों ने कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किया। उन्होंने कांग्रेस प्रभारी के. राजू के बयान को निराधार बताते हुए उसकी कड़ी निंदा की।
इधर राजद विधायक सुरेश पासवान ने भी साफ कहा कि राजद पूरी मजबूती से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के साथ खड़ा है। उनके मुताबिक यदि किसी ने विश्वासघात किया है तो वह कांग्रेस के भीतर हुआ है।
दिल्ली रवाना हुए हेमंत सोरेन, बढ़ीं राजनीतिक अटकलें
इसी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का दिल्ली दौरा भी कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे रहा है। हालांकि उनके दौरे का आधिकारिक एजेंडा सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन राज्यसभा चुनाव के बाद बदलते राजनीतिक हालात में इस यात्रा को बेहद अहम माना जा रहा है।
सरयू राय का नया फॉर्मूला, BJP और कांग्रेस दोनों को बाहर रखने की सलाह
राज्यसभा चुनाव के बाद जेडीयू विधायक सरयू राय ने ऐसा राजनीतिक सुझाव दिया जिसने झारखंड की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि यदि झामुमो, राजद, वाम दल और जेडीयू साथ आ जाएं तो उनके पास 41 विधायक हो जाएंगे और सरकार चलाने के लिए न कांग्रेस की जरूरत होगी और न भाजपा की।
सरयू राय के इस बयान को क्षेत्रीय दलों की नई राजनीति और राष्ट्रीय दलों की भूमिका को सीमित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
हेमंत-नाथवानी मुलाकात ने बढ़ाई चर्चाएं
राज्यसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी की मुलाकात भी अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गई है। चुनाव परिणाम के बाद इस मुलाकात को कई राजनीतिक विश्लेषक नए समीकरणों से जोड़कर देख रहे हैं।
दूसरी ओर बिहार और झारखंड की राजनीति भी इस विवाद में जुड़ती नजर आ रही है। राजद का आरोप है कि बिहार में कांग्रेस विधायकों की भूमिका से उनका राज्यसभा चुनाव प्रभावित हुआ था, जबकि कांग्रेस का कहना है कि झारखंड में राजद ने उसी का बदला लिया। ऐसे में दोनों राज्यों की राजनीति का असर अब महागठबंधन के भविष्य पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है।
महागठबंधन की एकजुटता पर उठे सवाल
राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने झारखंड में महागठबंधन की एकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सहयोगी दल सार्वजनिक मंचों से एक-दूसरे पर हमलावर हैं, जबकि राजनीतिक गलियारों में सरकार के भविष्य और संभावित नए समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हैं। आने वाले दिनों में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की रणनीति और सहयोगी दलों की अगली चाल तय करेगी कि यह विवाद केवल बयानबाजी तक सीमित रहता है या झारखंड की राजनीति में किसी बड़े बदलाव की भूमिका तैयार करता है।