JituMunda : जब एक समाज संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पार कर जाता है, तो वहां कानून नहीं, बल्कि ‘खौफनाक बेबसी’ जन्म लेती है। ओडिशा के क्योंझर से आई जीतू मुंडा की यह कहानी कोई दुर्घटना नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था द्वारा किया गया एक ‘संस्थागत कत्ल’ है, जो फाइलों के बोझ तले दबकर अपनी आत्मा खो चुकी है।
एक भाई की बेबसी: फावड़े से खोदी गई गरिमा
जरा कल्पना कीजिए। एक भाई, जिसने अपनी बहन कालरा मुंडा को खोया। जिसके पास मातम मनाने का भी समय नहीं था, क्योंकि उसे उन ₹19,300 की जरूरत थी, जो उसकी बहन के बैंक खाते में जमा थे। वह बैंक जाता है, गिड़गिड़ाता है, आँसू बहाता है। वह चीखकर कहता है कि उसकी बहन मर चुकी है। लेकिन बैंक के एयरो-कंडीशंड कमरों में बैठे ‘बाबू’ उसे नियमों का पाठ पढ़ाते हैं— “खाताधारक को खुद लाओ, वरना पैसा नहीं मिलेगा।”
नियमों की इस अंधी दीवार ने जीतू मुंडा को उस मोड़ पर खड़ा कर दिया जहाँ एक इंसान की रूह काँप जाए। वह कब्रिस्तान गया, अपनी ही बहन की कब्र खोदी और उसके कंकाल को कंधे पर लादकर बैंक पहुँच गया। वह कंकाल सिर्फ एक शव के अवशेष नहीं थे, वे इस देश के लोकतांत्रिक ढांचे और बैंकिंग सिस्टम की ‘लाश’ थे।
पूंजीपतियों के लिए ‘बेल’ और गरीब के लिए ‘कंकाल’?
यह घटना हमारे समाज के दोहरे चरित्र पर तीखे सवाल खड़े करती है…
* क्या हमारे देश में इंसान की कीमत उसके कागज़ तय करेंगे?
* जो सिस्टम अरबपतियों के करोड़ों का कर्ज एक झटके में ‘राइट ऑफ’ कर देता है, वह ₹20,000 के लिए एक आदिवासी भाई को कब्र खोदने पर मजबूर क्यों करता है?
* डिजिटल इंडिया और Viksit Bharat के नारों के बीच, एक जीतू मुंडा को अपनी सत्यता साबित करने के लिए ‘हड्डियों’ का सहारा क्यों लेना पड़ा?
सिस्टम की ‘बेशर्म’ चुप्पी
जब कंकाल बैंक पहुँचा, तब पुलिस आई, तब बैंक अधिकारी जागे और तब जाकर औपचारिकताएं पूरी हुईं। लेकिन उस घाव का क्या, जो जीतू के दिल पर लगा? क्या किसी नियम के पास उस अपमान और उस मानसिक प्रताड़ना की भरपाई है?
”पागलपन नहीं था, यह उस सिस्टम के खिलाफ विद्रोह था जिसने एक जीवित इंसान को सुनने से इनकार कर दिया था।”
क्या हम अब भी खामोश रहेंगे?
जीतू मुंडा का यह संघर्ष सिर्फ ₹19,300 का नहीं था। यह उस आदिवासी, दलित और वंचित वर्ग की पहचान की लड़ाई थी, जिन्हें मुख्यधारा का समाज अक्सर ‘अदृश्य’ समझ लेता है।
अगर एक भाई को अपनी बहन की मौत का सबूत देने के लिए उसकी हड्डियाँ टेबल पर रखनी पड़ें, तो समझ लीजिए कि हम एक ‘मरे हुए समाज’ में जी रहे हैं। जीतू मुंडा की नम आँखें और वह कंकाल आज हर उस व्यक्ति से सवाल पूछ रहे हैं जो व्यवस्था का हिस्सा है।
हम शर्मिंदा हैं जीतू जी। आपकी बहन की कब्र आपने नहीं, हम सबकी सामूहिक असंवेदनशीलता ने खोदी है।
यह समय शोक मनाने का नहीं, बल्कि इस बेरहम मशीनरी के खिलाफ आवाज़ उठाने का है, ताकि कल किसी और ‘जीतू’ को कब्रिस्तान का रास्ता न चुनना पड़े।