Protest : लोकतंत्र के इतिहास पर दृष्टि डालें तो फ्रांस में 1789 से 1815 तक राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल तथा आमूल परिवर्तन का एक महत्त्वपूर्ण दौर रहा। फ्रांसीसी क्रांति के परिणामस्वरूप राजतंत्र को चुनौती मिली, गणतंत्र की स्थापना हुई, खूनी संघर्षों का दौर चला और अंततः नेपोलियन के शासन का भी अंत हुआ। इस क्रांति के अनेक विचारों और मूल्यों का पश्चिमी यूरोप तथा उसके बाहर प्रसार हुआ। इसने आधुनिक इतिहास की दिशा बदलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। दुनिया के अनेक हिस्सों में निरंकुश राजतंत्र के विरुद्ध आवाजें उठने लगीं और गणतंत्र तथा उदार लोकतंत्र के विचारों को बल मिला। फ्रांसीसी क्रांति पश्चिमी सभ्यता के इतिहास की सबसे नाटकीय और जटिल घटनाओं में से एक थी। इसका प्रभाव केवल फ्रांस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने पूरे यूरोप के जनजीवन और राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित किया। विश्व इतिहास में इसे एक मील का पत्थर माना जाता है। इस क्रांति ने अन्य देशों में भी स्वतंत्रता, समानता और राजशाही से मुक्ति की आकांक्षाओं को बल दिया तथा निरंकुश सत्ता के विरुद्ध वातावरण तैयार करने में योगदान दिया।
किसी भी देश को स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ता है। भारत की ही बात करें तो अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने का संघर्ष कुछ महीनों या दिनों में समाप्त नहीं हुआ, बल्कि दशकों तक चला। असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों ने बलिदान दिया। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 10 मई 1857 को मेरठ से शुरू हुआ विद्रोह एक महत्त्वपूर्ण और व्यापक संगठित संघर्ष माना जाता है, हालाँकि इससे पहले भी देश के विभिन्न क्षेत्रों में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध अनेक विद्रोह हो चुके थे। बाद में महात्मा गांधी, भगत सिंह, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के प्रयासों से स्वतंत्रता का संघर्ष विभिन्न रूपों में आगे बढ़ा और व्यापक जनभागीदारी का स्वरूप ग्रहण करता गया।
आखिर हम फ्रांसीसी क्रांति और भारत के स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा यहाँ क्यों कर रहे हैं? इसका कारण यह है कि पिछले कुछ वर्षों में देश की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को लेकर आम नागरिकों के बीच चिंता और असुरक्षा की भावना दिखाई देती है। सत्ता परिवर्तन इतिहास का स्वाभाविक हिस्सा रहा है। विश्व में कोई भी शासक या शासन व्यवस्था हमेशा के लिए स्थायी नहीं रही। समय के साथ सत्ता बदलती है और नए शासक सामने आते हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में सबसे अधिक प्रभाव आम जनता के जीवन पर पड़ता है। अंततः राजनीतिक संघर्षों की कीमत समाज और नागरिकों को ही चुकानी पड़ती है।
लोकतंत्र की विशेषता यह है कि इसमें सत्ता परिवर्तन का रास्ता संविधान, चुनाव और जनमत के माध्यम से निर्धारित होता है। भारत का संविधान व्यापक विचार-विमर्श और दूरदर्शी दृष्टिकोण के साथ तैयार किया गया था। इसके केंद्र में नागरिकों के अधिकार, समानता और न्याय की भावना है। यही संवैधानिक व्यवस्था देश को राजनीतिक अस्थिरता और निरंकुशता से बचाने का आधार प्रदान करती है। आजादी के बाद भारत में सत्ता परिवर्तन और जनआंदोलनों को समझने के लिए लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए जेपी आंदोलन को देखना आवश्यक है। मार्च 1974 में बिहार में छात्रों के नेतृत्व में बेरोजगारी, महँगाई और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। जल्द ही जयप्रकाश नारायण ने इस आंदोलन का समर्थन किया। आगे चलकर यह आंदोलन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के विरुद्ध एक व्यापक राजनीतिक आंदोलन बन गया। जयप्रकाश नारायण ने इसे ‘संपूर्ण क्रांति’ का नाम दिया।जेपी आंदोलन ने इंदिरा गांधी सरकार को गंभीर चुनौती दी। जून 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के बाद प्रधानमंत्री के इस्तीफे की माँग तेज हुई। 25 जून 1975 को देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया। इस दौरान जयप्रकाश नारायण सहित अनेक विपक्षी नेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया तथा नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए।
मार्च 1977 में आपातकाल समाप्त होने के बाद आम चुनाव हुए। जयप्रकाश नारायण के समर्थन और मार्गदर्शन में विपक्षी दल जनता पार्टी के अंतर्गत एकजुट हुए। 1977 के आम चुनाव में जनता पार्टी ने कांग्रेस को पराजित कर दिया। स्वतंत्रता के बाद यह पहला अवसर था जब कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता से बाहर होना पड़ा। यह घटना भारतीय लोकतंत्र में जनमत और सत्ता परिवर्तन की शक्ति का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण बनी। जेपी आंदोलन ने यह दिखाया कि व्यापक जनअसंतोष, राजनीतिक एकजुटता और चुनावी भागीदारी मिलकर देश की सत्ता व्यवस्था को बदल सकते हैं। इतिहास में अनेक उदाहरण मिलते हैं, जब नई सरकारें पिछली सरकारों की नीतियों और कार्यों की आलोचना करती हैं। कई बार यह आलोचना आवश्यक राजनीतिक समीक्षा होती है, तो कभी इसके साथ राजनीतिक प्रचार और आरोप-प्रत्यारोप भी जुड़ जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब सरकारें युवाओं के विकास, शिक्षा और रोजगार के लिए प्रतिबद्ध होने का दावा करती हैं, तब उनके बीच असंतोष क्यों बढ़ता है? इसका उत्तर जानने के लिए धरातल पर मौजूद समस्याओं, सरकारी नीतियों और जनता की अपेक्षाओं को समझना आवश्यक है।
जनआंदोलनों का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य सत्ता के उच्च स्तर तक आम लोगों की समस्याओं और वास्तविक परिस्थितियों की जानकारी पहुँचाना भी होता है। जब जनता को लगता है कि उसकी आवाज नहीं सुनी जा रही है, तो वह प्रदर्शन और विरोध का रास्ता अपनाती है। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों का महत्त्वपूर्ण अधिकार है। हालाँकि, किसी भी आंदोलन में हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने या कानून का उल्लंघन करने की घटनाओं की अलग से जाँच होनी चाहिए। इसी प्रकार, प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध पुलिस की कार्रवाई भी कानून, आवश्यकता और अनुपातिक बल-प्रयोग के मानकों पर परखी जानी चाहिए। यदि बल-प्रयोग से लोगों के जीवन और भविष्य को गंभीर नुकसान पहुँचता है, तो उसकी निष्पक्ष जाँच और जवाबदेही आवश्यक है।
आज के संदर्भ में शिक्षा, बेरोजगारी और युवाओं की आकांक्षाएँ महत्त्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दे हैं। न्यायपालिका की टिप्पणियाँ, राजनीतिक दलों के अभियान और विभिन्न संगठनों की गतिविधियाँ कई बार जनआंदोलनों को गति देती हैं। विपक्ष स्वाभाविक रूप से ऐसे मुद्दों को उठाता है और सरकार से जवाब माँगता है। लेकिन किसी आंदोलन के कारणों और उसके राजनीतिक उद्देश्यों को समझने के लिए तथ्यों तथा प्रमाणों पर ध्यान देना आवश्यक है। पिछले कुछ समय से चुनावी प्रक्रिया और कथित ‘वोट चोरी’ को लेकर भी राजनीतिक विवाद सामने आए हैं। विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनावी व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। इन आरोपों के समर्थन या खंडन में उपलब्ध प्रमाणों, आधिकारिक स्पष्टीकरणों और स्वतंत्र जाँच को महत्त्व दिया जाना चाहिए। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता लोकतंत्र के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसलिए ऐसी संस्थाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे उठाए गए गंभीर सवालों का स्पष्ट, तथ्यपरक और पारदर्शी उत्तर दें। साथ ही, राजनीतिक आरोपों को भी प्रमाणों के आधार पर परखा जाना चाहिए, ताकि जनता के मन में अनावश्यक भ्रम न फैले और संस्थाओं पर विश्वास बना रहे।
अपनी सौम्यछवि की पहचान बनाने वाले देश के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने विपक्ष, विशेष रूप से राहुल गांधी और कांग्रेस, पर संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने के आरोप लगाए हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि विपक्षी दल युवाओं के हितों के बजाय राजनीतिक लाभ के लिए आंदोलन कर रहे हैं। सत्ता परिवर्तन के लिए हिंसा का सहारा लेने के आरोप भी राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं। इन बयानों और आरोपों का मूल्यांकन संबंधित संदर्भों तथा उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर किया जाना चाहिए। लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक दल को आलोचना से परे नहीं माना जा सकता और न ही किसी आंदोलन को केवल उसके राजनीतिक समर्थन के आधार पर सही या गलत ठहराया जा सकता है। इतिहास हमें बताता है कि सत्ता स्थायी नहीं होती। जब जनता पुराने शासकों या सरकारों से असंतुष्ट हो जाती है, तो परिवर्तन की आकांक्षा जन्म लेती है। युवाओं को शिक्षा, रोजगार और बेहतर भविष्य चाहिए, जबकि राजनीतिक दल सत्ता प्राप्त करने या बनाए रखने का प्रयास करते हैं। कभी-कभी इन दोनों के उद्देश्य एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं और जनआंदोलन व्यापक रूप ले लेते हैं। ऐसे आंदोलन लोकतांत्रिक व्यवस्था में बदलाव का माध्यम बन सकते हैं, बशर्ते वे संवैधानिक मूल्यों और शांतिपूर्ण जनभागीदारी का सम्मान करें। फ्रांसीसी क्रांति से लेकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम और जेपी आंदोलन तक इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण सबक यही है कि जनता की आकांक्षाओं को लंबे समय तक अनदेखा नहीं किया जा सकता। सत्ता परिवर्तन कुछ महीनों में हो या वर्षों में, लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनता के विश्वास, उसकी भागीदारी और संविधान की मर्यादा में निहित होती है। किसी भी सरकार की सफलता केवल सत्ता में बने रहने से नहीं, बल्कि नागरिकों की समस्याओं को समझने, उनके अधिकारों की रक्षा करने और उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरने से तय होती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)