* तक्सिंग्य स्टैंडऑफ: चीनी घुसपैठ पर भारतीय सेना का कड़ा प्रहार, LAC पर बदलेगी अब रणनीति!
* गलवान जैसी भूल… अरुणाचल में पड़ी चीन की मार! तक्सिंग्य में भारतीय सेना और ITBP का पराक्रम
Taksing Standoff : हाल ही में मीडिया गलियारों और रक्षा विश्लेषणों में ‘तक्सिंग्य’ (Taksing) क्षेत्र सबसे चर्चित विषयों में से एक है। लद्दाख के बाद अब अरुणाचल प्रदेश की वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भारत और चीन के बीच सुरक्षा गतिरोध (Standoff) एक बार फिर सुर्खियों में है।
पहले ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ और अब ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट्स ने इस घटनाक्रम पर से पर्दा उठाया है, जो यह दर्शाता है कि चीन अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है, और भारतीय सेना व आईटीबीपी (ITBP) उसे मुंहतोड़ जवाब दे रही हैं।
1. घटनाक्रम: क्या हुआ था तक्सिंग्य और असाफिला में?
* स्थान और समय: यह घटना जुलाई के अंतिम सप्ताह की है। अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले के तक्सिंग्य क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले असाफिला इलाके में भारत और चीनी सैनिकों के बीच तीखी झड़प (गुत्थी-गुत्थी) हुई।
* घुसपैठ की कोशिश: चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के सैनिकों ने लद्दाख की तर्ज पर इस बार अरुणाचल के तक्सिंग्य सर्किल में माजा कंपनी के ऑपरेटिंग बेस के पास एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ऊंचाई वाले स्थान पर अपने तंबू गाड़ दिए।
* LAC का उल्लंघन: चीनी सैनिकों द्वारा चुना गया यह स्थान भारत की वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के दावों के अनुसार भारतीय क्षेत्र के अंदर 6 से 7 किलोमीटर भीतर था।
2. ‘तंबू उखाड़ने’ से लेकर ‘ब्लैक एंड ब्लू’ कुटाई तक
इस पूरे घटनाक्रम में भारतीय जवानों और आईटीबीपी की मुस्तैदी साफ देखने को मिली…
* पहली कार्रवाई: जैसे ही भारतीय गश्ती दल (Patrolling Company) को इसकी सूचना मिली, वे मौके पर पहुंचे और चीनी सैनिकों के सारे तंबू उखाड़ फेंके।
* चीनी दुस्साहस: पारंपरिक चीनी रणनीति के तहत, वे 10-15 दिन बाद फिर से उसी क्षेत्र में वापस आए और दोबारा तंबू गाड़ दिए। भारतीय सेना ने बिना किसी देरी के इस बार भी उनके तंबू उखाड़ दिए।
* ब्रिक्स समिट का इंतजार और निर्णायक कार्रवाई: उस दौरान ब्रिक्स समिट चल रहा था और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ कूटनीतिक समीकरणों का दौर था। भारतीय सेना और आईटीबीपी सही मौके की तलाश में थीं। जैसे ही चीनी पार्टी दोबारा उस क्षेत्र में सक्रिय हुई, हमारे जवानों ने पीएलए (PLA) के सैनिकों को कड़ा सबक सिखाया—जिसे अनौपचारिक रूप से ‘ब्लैक एंड ब्लू’ कुटाई कहा गया है, यानी चीनी सैनिकों को खदेड़ कर पूरी तरह परास्त कर दिया गया।
3. रणनीतिक बदलाव की जरूरत: पारंपरिक तौर-तरीकों से आगे की सोच
डोकलाम से लेकर गलवान और अब तक्सिंग्य तक, भारतीय जवानों ने हमेशा चीनी सैनिकों को बिना हथियारों के भी पीछे धकेला है। हालांकि, मौजूदा हालात और आईटीबीपी के बयानों से यह साफ है कि रणनीति में बड़े बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है…
* पक्के निर्माण का खतरा: आईटीबीपी के महानिदेशक (या नेतृत्व) ने इस बात पर जोर दिया है कि हम अब केवल पारंपरिक तरीकों (जैसे तंबू उखाड़ना) पर निर्भर नहीं रह सकते। चीनी सेना की यह सोची-समझी प्लानिंग होती है कि वे किसी तरह भारतीय सीमा के भीतर घुसकर कोई पक्का कंस्ट्रक्शन (Permanent Construction) खड़ा कर दें। एक बार पक्का निर्माण होने के बाद वह इलाका ‘नो मेंस लैंड’ जैसा बन जाता है और धीरे-धीरे नक्शे की नई सीमा रेखा बनने की कोशिश की जाती है।
* सेना का नया दृष्टिकोण: भारतीय सेना अब इस पारंपरिक खेल से आगे बढ़कर दूसरा और अधिक प्रभावी तरीका आजमाना चाहती है।
4. भविष्य की तैयारी: आधुनिक युद्ध और एलएसी की सुरक्षा
शत्रुजीत कपूर (ITBP चीफ) और रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, आधुनिक युद्ध में ‘मिनिमम कैजुअल्टी और मैक्सिमम गेन’ (न्यूनतम नुकसान और अधिकतम लाभ) किसी भी आधुनिक सेना का मुख्य ध्येय होता है। इसी को ध्यान में रखते हुए निम्नलिखित कदम उठाए जा रहे हैं…
* शौर्य कमांडो टीमें: हाई-एल्टीट्यूड (अत्यधिक ऊंचाई वाले) ऑपरेशंस के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित शौर्य कमांडो टीमों की तैनाती।
* आधुनिक हथियार और तकनीक: एलएसी की अग्रिम चौकियों पर आधुनिक हथियारों, सर्विलांस ड्रोन और एंटी-ड्रोन क्षमताओं को मजबूत करना।
* अंडरग्राउंड कंस्ट्रक्शन: दुर्गम और ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में हमारे जवानों और साजो-सामान की सुरक्षा के लिए अंडरग्राउंड कंस्ट्रक्शंस (भूमिगत निर्माण) पर जोर दिया जा रहा है ताकि कठोर मौसम और दुश्मन की नजरों से सुरक्षा मिल सके।
तक्सिंग्य की यह घटना एक बार फिर यह साबित करती है कि भारतीय सीमाएं पूरी तरह सुरक्षित हैं और हमारे जवान हर मोर्चे पर दुश्मन की चाल को नाकाम करने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं। गलवान घाटी के संघर्ष की तरह ही, जहां भारतीय सेना ने चीनी आक्रामकता का माकूल जवाब दिया था, तक्सिंग्य का यह स्टैंडऑफ भी हमारी सामरिक दृढ़ता का एक मजबूत प्रतीक है। अब वक्त आ गया है कि पारंपरिक गश्त के साथ-साथ अत्याधुनिक तकनीक और बुनियादी ढांचे से एलएसी को पूरी तरह अभेद्य बनाया जाए।