कांग्रेस का अस्तबल और राहुल गांधी की ‘घोड़ा-पहचान’ मुहिम
Rahul Gandhi : राजनीति में उपमाओं का बड़ा महत्व होता है। कोई खुद को शेर बताता है, कोई बाज़, कोई चौकीदार और कोई सेवक। लेकिन कांग्रेस में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा घोड़ों की है। वजह हैं राहुल गांधी, जिन्होंने मध्य प्रदेश में पार्टी नेताओं को रेस के घोड़े, बारात के घोड़े और लंगड़े घोड़ों की श्रेणी में बांटकर नया राजनीतिक जीव-विज्ञान प्रस्तुत कर दिया।
राहुल गांधी का संदेश साफ था—रेस के घोड़े आगे बढ़ेंगे, बारात वाले बारात में नाचेंगे और लंगड़े घोड़े रिटायर होकर घर बैठेंगे। सुनने में योजना शानदार लगी। लेकिन राजनीति कोई रेसकोर्स नहीं है, जहां सीटी बजते ही सभी घोड़े अपनी-अपनी लेन में दौड़ पड़ें। यहां तो कई घोड़े ऐसे भी होते हैं जो खुद दौड़ें न दौड़ें, दूसरे को गिराने की कला में पीएचडी कर चुके होते हैं।
कांग्रेस की हालत इन दिनों कुछ वैसी ही दिखाई दे रही है जैसे प्रियदर्शन की फिल्मों में कोई मशीन रिपेयर हो रही हो। समस्या खोजने निकले लोग पूरी मशीन खोलकर रख देते हैं, लेकिन अंत में पता चलता है कि पुर्जा कौन-सा खराब था, यह अभी भी रहस्य ही है।
मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के दौरान जो राजनीतिक पटकथा लिखी गई, उसने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया कि आखिर अस्तबल में असली रेस का घोड़ा कौन है और किसके पास लगाम है। जिन नेताओं को किनारे लगाने की चर्चा थी, वही राजनीतिक शतरंज की चालों में माहिर निकले। नतीजा यह हुआ कि रणनीति बनाने वाले रणनीति समझाते रह गए और खेल कहीं और से संचालित होता दिखा।
राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि यहां अनुभव को सिर्फ उम्र से नहीं मापा जाता। कई बार जो खिलाड़ी मैदान में धीमा दिखाई देता है, वही सही समय पर ऐसी चाल चलता है कि तेज दौड़ने वाले धूल फांकते रह जाते हैं। इसलिए किसी को रेस का घोड़ा और किसी को लंगड़ा घोड़ा घोषित करना जितना आसान मंच से लगता है, जमीन पर उतना ही जोखिम भरा होता है।
कांग्रेस के भीतर भी यही दुविधा नजर आती है। नए चेहरे आगे लाने की कोशिश जारी है, लेकिन पुराने खिलाड़ी अभी भी खेल के नियम अच्छी तरह जानते हैं। वे जानते हैं कि राजनीति में सिर्फ तेज दौड़ना काफी नहीं, रास्ते के गड्ढे, मोड़ और पीछे से आने वाली टांग भी देखनी पड़ती है।
फिलहाल कांग्रेस का अस्तबल काफी व्यस्त है। कोई घोड़ों की पहचान में लगा है, कोई लगाम संभाल रहा है और कोई चुपचाप चारा खाते हुए अगली चाल की तैयारी कर रहा है। अब देखना यह है कि अंत में रेस कौन जीतता है—रेस का घोड़ा, बारात का घोड़ा या फिर वही अनुभवी घोड़ा, जिसे जल्दबाजी में रिटायर मान लिया गया था।