Critical Minerals : इलेक्ट्रिक गाड़ियों से लेकर स्मार्टफोन, मिसाइल सिस्टम और अत्याधुनिक रक्षा तकनीकों तक, दुनिया की लगभग हर अहम इंडस्ट्री आज क्रिटिकल मिनरल्स पर निर्भर है। वर्षों से इस सेक्टर पर चीन ने ऐसा दबदबा बना रखा था कि पूरी दुनिया उसकी सप्लाई चेन पर निर्भर रहने को मजबूर थी। लेकिन अब भारत ने इस एकाधिकार को तोड़ने के लिए बड़ा और आक्रामक कदम उठाया है।
नई दिल्ली में हाल ही में क्वाड देशों—भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान—ने 20 अरब डॉलर के ‘क्वाड क्रिटिकल मिनरल्स इनिशिएटिव फ्रेमवर्क’ पर सहमति जताई है। इसका मकसद साफ है—चीन के दबदबे वाली सप्लाई चेन का विकल्प तैयार करना और भारत को क्रिटिकल मिनरल्स का वैश्विक केंद्र बनाना।
चीन के एकाधिकार को सीधी चुनौती
दुनिया में निकाले जाने वाले दुर्लभ खनिजों की रिफाइनिंग क्षमता का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा आज भी चीन के कब्जे में है। वहीं इलेक्ट्रिक वाहनों और रक्षा उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले परमानेंट मैग्नेट के उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी 90 प्रतिशत से अधिक है। चीन कई बार इस ताकत का इस्तेमाल भू-राजनीतिक दबाव बनाने के लिए कर चुका है। 2023 में निर्यात प्रतिबंध लगाकर उसने दुनिया को साफ संदेश दिया था कि वह इस सेक्टर को रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है।
यही वजह है कि अब भारत और उसके सहयोगी देश चीन की इस ‘खनिज कूटनीति’ को जवाब देने के लिए एकजुट हो गए हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी साफ संकेत दिया है कि खनन से लेकर प्रोसेसिंग तक पूरी सप्लाई चेन में आत्मनिर्भरता और साझेदारी दोनों को मजबूत करना होगा।
दुनिया भर में संसाधनों की तलाश में भारत
भारत अब सिर्फ अपने संसाधनों पर निर्भर नहीं रहना चाहता। कच्चे माल की सुरक्षित आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सरकारी कंपनी KABIL ने अर्जेंटीना में लिथियम ब्लॉक हासिल किया है। जापान के साथ महत्वपूर्ण समझौते हुए हैं, ऑस्ट्रेलिया के लिथियम और कोबाल्ट प्रोजेक्ट्स में साझेदारी बढ़ रही है और म्यांमार के साथ भी दुर्लभ खनिजों को लेकर रणनीतिक बातचीत आगे बढ़ चुकी है।
संदेश स्पष्ट है—भारत अब वैश्विक स्तर पर संसाधनों की दौड़ में सक्रिय खिलाड़ी बन चुका है और चीन के प्रभुत्व वाले क्षेत्रों में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रहा है।
असली जंग प्रोसेसिंग क्षमता की
हालांकि खदानें हासिल करना ही पर्याप्त नहीं है। असली ताकत खनिजों की प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग में छिपी है। फिलहाल भारत अपनी जरूरत के 80-90 प्रतिशत परमानेंट मैग्नेट चीन से आयात करता है। घरेलू रिफाइनिंग क्षमता भी मांग के मुकाबले बेहद सीमित है।
केरल, ओडिशा, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों में मौजूद मोनाज़ाइट सैंड्स भारत के लिए बड़ी ताकत बन सकते हैं। लेकिन इन खनिजों में रेडियोधर्मी तत्व होने के कारण उनका दोहन और प्रोसेसिंग अभी भी जटिल नियमों के दायरे में है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर भारत को चीन का वास्तविक विकल्प बनना है तो उसे खनन के साथ-साथ मेटल और अलॉय निर्माण क्षमता में भी तेज़ी से निवेश करना होगा।
34 हजार करोड़ का मिशन, बड़ा लक्ष्य
सरकार ने जनवरी 2025 में 34,300 करोड़ रुपये के नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन को मंजूरी देकर साफ कर दिया कि यह सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक लड़ाई भी है। इसके अलावा चार राज्यों में रेयर अर्थ कॉरिडोर विकसित करने की योजना बनाई गई है। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया राजस्थान, गुजरात और असम समेत कई नए क्षेत्रों में आधुनिक तकनीक से दुर्लभ खनिजों की खोज में जुटा है।
भारत का अगला बड़ा दांव
विशेषज्ञ मानते हैं कि कोई भी देश क्रिटिकल मिनरल्स में पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हो सकता। लेकिन अगर भारत अगले दशक तक लगातार निवेश, तकनीकी सहयोग और तेज़ फैसलों के साथ आगे बढ़ता रहा, तो वह चीन की पकड़ को गंभीर चुनौती देने वाला सबसे बड़ा विकल्प बन सकता है।
यह सिर्फ खनिजों की लड़ाई नहीं है, बल्कि भविष्य की तकनीक, आर्थिक ताकत और रणनीतिक सुरक्षा की जंग है। और इस बार भारत केवल दर्शक नहीं, बल्कि मैदान में उतरकर खेल का रुख बदलने की तैयारी कर चुका है।