Rajya Sabha Election : JMM – “राम” पर भरोसे की वजह

Sushmita Mukherjee

* ​JMM का ‘राम’ कार्ड: वोट बैंक का समीकरण और राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा का नया अध्याय

Rajya Sabha Election :भारतीय राजनीति में “राम” सिर्फ एक नाम या आस्था नहीं, बल्कि मर्यादा, जन-भरोसे और अचूक रणनीति का प्रतीक हैं। त्रेतायुग में भगवान राम ने अपने आचरण से जन-मानस का विश्वास जीता था। आज झारखंड की सियासत में भी एक “राम” चर्चा के केंद्र में हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ बात अयोध्या के राम की नहीं, बल्कि झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) द्वारा राज्यसभा के रण में उतारे गए बैजनाथ राम की हो रही है।
झामुमो का यह फैसला सिर्फ संसद की एक खाली सीट भरने का नहीं है; यह राजनीति के बिसात पर चली गई वह चाल है, जिसने विरोधियों के कई मोहरों को एक साथ चित कर दिया है।

​1. परिवारवाद के चक्रव्यूह से निकलने की ‘मर्यादा’

​पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष द्वारा लगाए जाने वाले परिवारवाद के आरोपों से पार पाने और आंतरिक असंतोष को थामने की थी। यदि टिकट किसी पारिवारिक या भारी-भरकम विवादित चेहरे को दिया जाता, तो बगावत की चिंगारी सुलग सकती थी। बैजनाथ राम का नाम आगे कर झामुमो नेतृत्व ने संगठन को एकजुट रखने का ‘मर्यादा’ भरा संदेश दिया है। यह एक तीर से कई निशाने साधने जैसी रणनीति है, जिसने आंतरिक लोकतंत्र के मोर्चे पर पार्टी को मजबूत किया है।

2. सामाजिक संतुलन और ‘शबरी के बेर’ सा संदेश

इस फैसले के पीछे सामाजिक न्याय और चुनावी गणित की गहरी जुगलबंदी है। अनुसूचित जाति (SC) समाज से आने वाले बैजनाथ राम को दिल्ली के गलियारों में भेजकर झामुमो ने एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। यह संदेश केवल संगठन के भीतर नहीं, बल्कि उस बड़े वोट बैंक तक भी जाता है जो लंबे समय से सम्मान और सत्ता में हिस्सेदारी की राह देख रहा था।
अगर सियासी मायने की बात करें तो हरिजन समाज के एक निष्ठावान चेहरे को आगे बढ़ाकर झामुमो ने विपक्ष के ‘दलित-विरोधी’ होने के हर संभावित नैरेटिव (तर्क) की धार को कुंद कर दिया है।

3. राजनीति में ‘हनुमान’ जैसी निष्ठा का पुरस्कार

​बैजनाथ राम को टिकट मिलने की सबसे बड़ी वजह उनकी ‘संगठन के प्रति अडिग निष्ठा’ है। पार्टी के सबसे कठिन दौर में, जब कई कश्ती डगमगा रही थीं, वे नेतृत्व के साथ चट्टान की तरह खड़े रहे। राजनीति में अक्सर योग्यता से ऊपर ‘विश्वसनीयता’ को तवज्जो दी जाती है, और बैजनाथ राम के मामले में यही वफादारी उनका सबसे बड़ा ‘ब्रह्मास्त्र’ साबित हुई।

​4. क्षेत्रीय पहचान से राष्ट्रीय क्षितिज तक का सफर

​हाल के वर्षों में झामुमो ने बिहार, असम और पश्चिम बंगाल जैसे पड़ोसी राज्यों में अपनी सियासी जमीन तलाशने की कोशिशें तेज की हैं। यह साफ संकेत है कि तीर-कमान की यह पार्टी अब खुद को सिर्फ छोटानागपुर और संताल परगना के जंगलों तक सीमित नहीं रखना चाहती।
​राष्ट्रीय राजनीति की धुरी बनने की महत्वाकांक्षा रखने वाली पार्टी के लिए राज्यसभा एक बेहद महत्वपूर्ण मंच है। लेकिन यहाँ एक बड़ा यक्ष प्रश्न भी खड़ा होता है: क्या बैजनाथ राम उस बड़ी राष्ट्रीय भूमिका के साथ न्याय कर पाएंगे?

विश्लेषकों का नजरिया: संसद की सीट या झारखंड की गूंज?

​राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि यदि झामुमो को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनना है, तो उसके प्रतिनिधियों को सिर्फ संसद की हाजिरी तक सीमित नहीं रहना होगा। उन्हें…

• ​जल, जंगल, जमीन के मुद्दों को राष्ट्रीय पटल पर पुरजोर तरीके से उठाना होगा।
• राज्य के खनिज संसाधनों के दोहन और विस्थापन की पीड़ा को दिल्ली के कानों तक पहुंचाना होगा।
•​आदिवासी और मूलवासी अधिकारों पर एक मजबूत वक्ता के रूप में उभरना होगा।

​फिलहाल, झारखंड की सत्ता के शीर्ष पर बैठे ‘तीर-कमान’ ने इस बार “राम” पर भरोसा जताया है। अब देखना यह है कि यह ‘राम-भरोसा’ आगामी चुनावों में झामुमो के लिए कितना बड़ा ‘चुनावी वरदान’ साबित होता है, और क्या बैजनाथ राम दिल्ली के दरबार में झारखंड की बुलंद आवाज बन पाते हैं। इसका अंतिम फैसला तो वक्त के गर्भ में है, लेकिन तात्कालिक तौर पर झामुमो ने इस नैरेटिव की बाजी जीत ली है।

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