हादसे नहीं, हमारी सामूहिक विफलता का आईना हैं ये मौतें
Stampede Crisis : देश की बढ़ती आबादी, सिकुड़ती जगहें और बेकाबू होती भीड़ शायद हमें एक ऐसे मोड़ पर ले आई हैं, जहां खतरा हमारे चारों ओर मौजूद है, लेकिन हम उसे देखने की संवेदनशीलता खोते जा रहे हैं।
जब भी किसी आगजनी या भगदड़ की तस्वीर सामने आती है, मन भीतर तक कांप उठता है। धुएं में घुटती सांसें, मदद के लिए चीखते लोग और कुछ ही मिनटों में उजड़ते परिवार—ये दृश्य केवल समाचार नहीं होते, ये किसी समाज के चरित्र की परीक्षा होते हैं।
दुर्भाग्य यह है कि भारत बार-बार ऐसी त्रासदियों की खबरों में लौट आता है। कभी धार्मिक आयोजन में भगदड़, कभी रेलवे स्टेशन पर अफरा-तफरी, कभी राजनीतिक रैली में जानलेवा भीड़, कभी खेल के जश्न में मौत का तांडव और कभी किसी होटल, क्लब या कोचिंग सेंटर में आग का कहर। स्थान बदलते रहते हैं, लेकिन कहानी वही रहती है—लापरवाही, अव्यवस्था और शून्य जवाबदेही।
हाथरस की भगदड़ में 123 लोगों की मौत, कुंभ मेले की त्रासदी, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर जान गंवाने वाले लोग, बेंगलुरु और तमिलनाडु की भीड़ दुर्घटनाएं, गोवा और दिल्ली की आगजनी—ये अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं। ये एक ही बीमारी के अलग-अलग लक्षण हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि हर हादसे के बाद कुछ दिनों तक शोक मनाया जाता है, जांच बैठती है, बयान आते हैं और फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। अगले हादसे तक।
आखिर ऐसा क्यों है कि हमारे यहां भीड़ प्रबंधन को गंभीरता से नहीं लिया जाता? क्यों क्षमता से अधिक लोगों को प्रवेश दिया जाता है? क्यों निकास मार्ग बंद या अपर्याप्त होते हैं? क्यों अग्निशमन उपकरण केवल कागजों में मौजूद रहते हैं? और सबसे बड़ा प्रश्न—जब लोग मरते हैं, तब जिम्मेदार कौन होता है?
सच यह है कि समस्या केवल व्यवस्था की नहीं है, बल्कि मानसिकता की भी है।
हमने विकास को ऊंची इमारतों, बढ़ती जीडीपी और चमकदार आंकड़ों तक सीमित कर दिया है। लेकिन किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति इस बात से मापी जाती है कि वह अपने नागरिकों की सुरक्षा कितनी सुनिश्चित करता है।
भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने का दावा कर रहा है। लेकिन यदि एक होटल में लोग धुएं से दम घुटने से मर जाएं, यदि किसी आयोजन में भीड़ इंसानों को कुचल दे, यदि सुरक्षा नियम पैसे और प्रभाव के आगे बौने साबित हो जाएं, तो फिर विकास का यह मॉडल किसके लिए है?
दुनिया के कई देशों में भीड़ प्रबंधन, अग्नि सुरक्षा और आपदा निकासी के लिए बेहद सख्त मानक हैं। वहां नियम केवल बनाए नहीं जाते, उनका पालन भी कराया जाता है। हमारे यहां अक्सर नियमों को कागज पर पूरा कर दिया जाता है और जमीन पर उनकी हत्या कर दी जाती है।
एक होटल अतिरिक्त कमरे बना लेता है। एक आयोजन क्षमता से कहीं अधिक टिकट बेच देता है। एक कोचिंग सेंटर सुरक्षा मानकों की अनदेखी करता है। एक अधिकारी आंखें मूंद लेता है। और अंततः इसकी कीमत आम नागरिक अपनी जान देकर चुकाता है।
इन त्रासदियों को दुर्घटना कहना भी कई बार वास्तविकता से आंखें चुराना है। क्योंकि जहां खतरे की जानकारी पहले से मौजूद हो, नियम पहले से बने हों और चेतावनियां पहले से दी गई हों, वहां मौतें केवल हादसा नहीं, बल्कि मानव निर्मित विफलता बन जाती हैं।
आज जरूरत केवल संवेदना व्यक्त करने की नहीं है। जरूरत है राष्ट्रीय स्तर पर कठोर सुरक्षा कानूनों की। हर होटल, मॉल, क्लब, कोचिंग सेंटर, धार्मिक स्थल और सार्वजनिक आयोजन के लिए क्षमता, निकास मार्ग, अग्नि सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के स्पष्ट मानक अनिवार्य किए जाएं। नियमित निरीक्षण हो। उल्लंघन पर लाइसेंस तत्काल रद्द हो। और किसी भी मौत की स्थिति में जवाबदेही सीधे तय हो।
क्योंकि जब तक मानव जीवन को लाभ से अधिक मूल्यवान नहीं माना जाएगा, तब तक ये मौतें जारी रहेंगी।
और तब तक हम हर बार इन्हें ‘दुर्घटना’ कहकर भूलते रहेंगे, जबकि सच यह होगा कि ये हमारे सिस्टम, हमारी कार्य संस्कृति और हमारी सामूहिक उदासीनता का आईना हैं।
एक ऐसा आईना, जिसमें दिखाई देने वाली तस्वीर बेहद डरावनी है।