Taslima Nasreen : सत्ता बदलते ही कितना कुछ बदल गया….

Bindash Bol

सर्वेश श्रीमुख
Taslima Nasreen : पश्चिम बंगाल में सत्ता बदलते ही बांग्लादेशी मूल की लेखिका तसलीमा नसरीन के ‘अच्छे दिन’ आ गए हैं । वह करीब 22  साल बाद बंगाल पहुंच रही हैं । कोलकाता में 1 अगस्त को एक आयोजन में वह हिस्सा लेंगी । करीब 2 दशक पूर्व तसलीमा नसरीन के खिलाफ बंगाल में विरोध प्रदर्शन हुए थे इसके बाद उन्हें बंगाल छोड़कर निकलना पड़ा था ।
   
अब सोचिए कि तस्लीमा ने ऐसा क्या कर दिया था कि बंगाल की सरकारों ने राज्य में उनके प्रवेश पर हमेशा के लिए रोक लगा दी थी? जिस बंगाल में हजारों की हत्या करने वाले कुख्यात नक्सलियों तक के लिए संवेदना के पुष्प उछाले जाते रहे, वहां एक लेखिका के प्रवेश पर बैन लगा दिया गया? इतना भय?
   
तस्लीमा नसरीन ने अपने देश बंगलादेश में हिंदुओं पर होने वाले अत्याचार पर एक किताब क्या लिख दी, भारतीय बुद्धिजीवियों की सटक गई। हम उसको बोंगाल में नोहीं घुसने डेगा… जबकि उसी बंगाल में बैठ कर दर्जनों लेखकों ने भारत और भारत के सबसे बड़े समुदाय के विरुद्ध सैकड़ों किताबें लिखी हैं, पर कभी उनसे प्रश्न नहीं पूछा गया। लेकिन तस्लीमा को रोका गया। पहले वामियों ने रोका, फिर ममता ने… स्वयं को सभ्यता और समानता के ठेकेदार मानने वाले अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता सेनानी उस एक अकेली महिला के डर से कांप उठे थे।
    
भारत में रह कर जिन लोगों ने सदैव नफरत की खेती की, चाइनीज भीख पर पल कर जीवन भर नक्सलवादी आतंक को बढ़ावा दिया, वे उस लेखिका को नफरती बताने लगे जिसने अपने देश में एक पूरे समुदाय पर हो रहे अत्याचार पर एक किताब भी लिख दी थी।
     
वामपंथी लोग नारीवाद की बातें करते हैं, तस्लीमा नारीवादी होने के बाद भी उन्हें पसंद नहीं। भारतीय वामपंथी भारत में सदैव अल्पसंख्यक हितों का रोना रोते हैं, तस्लीमा अपने देश के अल्पसंख्यक हिंदुओं की बातें करती हैं तब भी उन्हें पसंद नहीं। यहां आ कर भारतीय बुद्धिजीवी अरब देशों के गुलाम सिद्ध होते हैं। जिसने भी मालिक की कम्युनिटी के विरुद्ध बोला, उसका बायकॉट…
     
ममता स्त्री थीं, स्त्री होने के नाते भी वे तस्लीमा के साथ हो रहे भेदभाव को रोक सकती थीं। पर वोट का लोभ उन्हें भी था। न्याय वह भी नहीं कर सकीं…
     
खैर! बंगाल के लोगों ने अब बंगाल को बदला है। और इसी का असर है कि तस्लीमा बंगाल आ रही हैं। सच्चे मायनों में बंगाल अब जा कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता स्थापित हुई है। यह केवल सत्ता बदलने से संभव हुआ है।
       
ऐसा नहीं है कि तस्लीमा का आना भारत के लिए बहुत जरूरी हो, या उनके आने से राष्ट्र की प्रतिष्ठा बढ़ जा रही हो। मुझे उनसे कोई आशा नहीं। लेकिन जिस कारण से उन्हें रोका गया था, वह एक लोकतांत्रिक देश के लिए लज्जाजनक था। सुखद है कि अब इस गलती को सुधार लिया गया है।
     
वैसे आपने तस्लीमा नसरीन की पुस्तक लज्जा पढ़ी है? मुझे लगता है, हर भारतीय को वह पुस्तक जरूर पढ़नी चाहिए।

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