UN : किस दमनकारी देश में युवा सरकार से सवाल पूछ सकते हैं?’—UN में भारतीय राजनयिक ने दो टूक सुनाया, खारिज की भारत विरोधी रिपोर्ट

Bindash Bol

UN : संयुक्त राष्ट्र (UN) के मंच पर भारत ने दोहरे मानदंडों और आधारहीन रिपोर्टिंग को लेकर तीखा प्रहार किया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा की थर्ड कमेटी की बैठक में भारतीय राजनयिक अनुज स्वरूप ने UN की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए ‘शांतिपूर्ण सभा की स्वतंत्रता’ पर आई विशेष प्रतिवेदक जीना रोमेरो (Gina Romero) की रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया है। भारत ने दोटूक कहा कि सुनी-सुनाई और अप्रमाणित बातों पर आधारित ऐसी मनमानी रिपोर्टें संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्था की विश्वसनीयता को धूमिल कर रही हैं।

प्रमुख बिंदु एक नजर में…

* ​भारतीय राजनयिक का कड़ा रुख: अनुज स्वरूप ने कहा कि दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी के खिलाफ गुमनाम और अनवेरिफाइड इनपुट्स के आधार पर व्यापक निष्कर्ष निकालना संस्था की जिम्मेदारी के साथ सरासर अन्याय है।

* ​’कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का जिक्र: रिपोर्ट में युवाओं द्वारा खड़े किए गए व्यंग्यात्मक राजनीतिक आंदोलन (CJP प्रदर्शन) का हवाला देकर उठाए गए सवालों पर भारत ने करारा जवाब दिया।

* ​लोकतंत्र और संवाद की मिसाल: भारत ने स्पष्ट किया कि यदि यहाँ युवाओं को आवाज उठाने की स्वतंत्रता न होती, तो वे राजधानी तक मार्च करने और देश के शीर्ष नेतृत्व से संवाद करने में कभी सक्षम नहीं होते।

UN की रिपोर्ट और भारत का करारा जवाब

​विशेष प्रतिवेदक जीना रोमेरो की रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि भारत में कुछ युवाओं को मानसिक स्वास्थ्य और लैंगिक न्याय जैसे मुद्दों पर मुखर होने के कारण सामाजिक कलंक या विरोध का सामना करना पड़ा। हालांकि, रिपोर्ट में इस दावे का कोई पुख्ता स्रोत या आधार नहीं था, बल्कि इसे केवल एकतरफा ‘सबमिशन’ बताया गया था।
​इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए भारतीय राजनयिक अनुज स्वरूप ने सवाल किया..

​“अगर भारत में युवाओं को अपनी बात रखने और सरकार से सवाल पूछने की आजादी नहीं है, तो फिर वे राजधानी तक मार्च कैसे कर रहे हैं और देश के वरिष्ठ नेताओं से बातचीत कैसे कर रहे हैं? किस दमनकारी देश का युवा समूह सरकार से इस तरह खुलकर सवाल पूछ सकता है?”

​उन्होंने कहा कि जब कोई जिम्मेदार पदाधिकारी महज गुमनाम सूचनाओं के आधार पर 1.4 अरब लोगों के सबसे बड़े लोकतंत्र के बारे में सामान्य और पूर्वाग्रह से ग्रसित निष्कर्ष निकालता है, तो इससे पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता पर आंच आती है।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर UN का दोहरा रवैया

​यह इसी सप्ताह का दूसरा मौका था जब भारत ने मानवाधिकार मामलों पर UN के दोहरे मापदंडों को बेनकाब किया। इससे पहले भारतीय राजनयिक ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क (Volker Türk) की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए थे। भारत ने रेखांकित किया कि पश्चिमी देशों और पड़ोसी देशों में होने वाली हिंसक कार्रवाइयों और प्रदर्शनों पर कई बार रिपोर्टों में चुप्पी साध ली जाती है, जो लोगों का वैश्विक संस्थाओं से भरोसा कम करती है।

भारत ने अपने पक्ष में संयुक्त राष्ट्र के ही एक अन्य बयान का हवाला दिया। पिछले महीने 7 सितंबर को वोल्कर तुर्क ने खुद स्वीकार किया था कि “भारत में हालिया प्रदर्शनों ने यह साबित किया है कि युवा-नेतृत्व वाले आंदोलनों का सबसे बेहतरीन जवाब पुलिसिया बल प्रयोग नहीं, बल्कि सार्थक संवाद है।”

सकारात्मक बदलाव और लोकतंत्र की जीवंतता

भारतीय राजनयिक ने देश में लोकतांत्रिक संवाद की मिसाल देते हुए सार्वजनिक परीक्षाओं (पेपर लीक) में गड़बड़ियों के खिलाफ हुए छात्र आंदोलनों का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि सरकार ने इन प्रदर्शनों पर दमनकारी रुख अपनाने के बजाय युवाओं के साथ रचनात्मक बातचीत की।
इसका परिणाम यह रहा कि कुछ ही हफ्तों के भीतर संसद ने सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम में संशोधन कर दिया, जिसके तहत…

* ​पेपर लीक के मामलों में कड़े दंड और सजा का प्रावधान बढ़ाया गया।

* ​परीक्षा प्रणाली में व्यापक ढांचागत सुधार किए गए।

* ​धोखाधड़ी से जुड़े मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतें गठित की गईं।

​भारत की आपत्तियों और तर्कों के सामने आने के बाद, विशेष प्रतिवेदक जीना रोमेरो को आखिरकार यह स्वीकार करना पड़ा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहाँ युवाओं की आवाज़ को नीतिगत और संस्थागत स्तर पर शामिल करने के लिए पुख्ता व्यवस्थाएं मौजूद हैं।
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