* ममता के गढ़ में संघ की बिसात
* बंगाल रण 2026: RSS का ‘साइलेंट स्ट्राइक’—ममता के दुर्ग में सेंध लगाने की जमीनी तैयारी!
* “बड़े-बड़ों की कुर्सी हिलाने आ रही है RSS की 1.75 लाख बैठकों की गूंज!”
Bengal Election 2026 : 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) भाजपा के लिए एक बड़ी गेम चेंजर के रूप में उभर रहा है। यह सक्रियता पारंपरिक चुनावी रैलियों से हटकर जमीनी स्तर पर (Grassroots level) की जा रही है, जिसका उद्देश्य हिंदू मतदाताओं का ध्रुवीकरण और वोट प्रतिशत में वृद्धि करना है।
पश्चिम बंगाल की सत्ता का रास्ता अब केवल बड़ी रैलियों और चुनावी शोर से तय नहीं होगा। 2026 के विधानसभा चुनाव में असली खेल परदे के पीछे ‘निलय’ और ‘शाखाओं’ में रचा जा चुका है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) इस बार केवल एक सहयोगी की भूमिका में नहीं, बल्कि भाजपा के लिए सबसे बड़े ‘गेम चेंजर’ के रूप में उभरा है। 23 अप्रैल को पहले चरण के मतदान से ठीक पहले, संघ की ‘लो प्रोफाइल’ लेकिन ‘हाई इम्पैक्ट’ रणनीति ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।
1. ‘लोक मत परिष्कार’: ड्राइंग रूम से लेकर देहरी तक दस्तक
संघ की कार्यशैली का सबसे धारदार हथियार है—’लोक मत परिष्कार’। यह कोई चुनावी रैली नहीं, बल्कि जनमानस का शुद्धिकरण अभियान है।
* अदृश्य सेना: लगभग 1.75 लाख छोटी बैठकें अब तक 250 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में की जा चुकी हैं।
* ड्राइंग रूम रणनीति: संघ के स्वयंसेवक ड्राइंग रूम बैठकों के जरिए सीधे मध्यम वर्ग और प्रबुद्ध वर्ग से संवाद कर रहे हैं। बिना शोर-शराबे के ‘पब्लिक ओपिनियन’ को मोड़ने की यह कला दिल्ली के बाद अब बंगाल में अपना रंग दिखा रही है।
2. अभूतपूर्व विस्तार: 15 साल में 900 से 4,300 शाखाएं
बंगाल में संघ की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 15 वर्षों में इसकी शाखाओं में करीब 500% की वृद्धि हुई है।
* प्रांतवार शक्ति: मध्य बंग प्रांत में शाखाओं का ग्राफ सबसे तेजी से बढ़ा है। उत्तर से दक्षिण तक, बंगाल के हर जिले में संघ ने अपना नेटवर्क बिछा दिया है।
* 2026 का संकल्प: 2021 की गलतियों से सीख लेते हुए, 2026 में संघ ‘साइलेंट और सैवी’ (Silent & Savvy) मोड में है, जो आक्रामक तरीके से बूथ प्रबंधन संभाल रहा है।

3. ‘एक बूथ, दस यूथ’ और ‘दुर्गा ब्रिगेड’ का सुरक्षा चक्र
भाजपा के कमजोर बूथों को अभेद्य किला बनाने के लिए संघ ने ‘एक बूथ दस यूथ’ का फॉर्मूला जमीन पर उतारा है।
* महिला सुरक्षा: सबसे बड़ा प्रहार: आरजी कर कांड के बाद बंगाल की महिलाओं में उपजे आक्रोश को संघ ने चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि ‘अस्तित्व की रक्षा’ का विषय बना दिया है। भाजपा के ‘दुर्गा ब्रिगेड’ के वादे को संघ घर-घर जाकर महिलाओं के बीच सुरक्षा की गारंटी के तौर पर पेश कर रहा है।
* भ्रष्टाचार पर घेराबंदी: शिक्षक भर्ती घोटाले (SSC Scam) को लेकर संघ से जुड़े शिक्षक संगठन सीधे युवाओं और परिवारों को बता रहे हैं कि कैसे उनके हक पर डाका डाला गया।

4. हिंदुत्व और डेमोग्राफी: अस्मिता की जंग
संघ इस चुनाव को केवल सत्ता परिवर्तन के तौर पर नहीं, बल्कि ‘सांस्कृतिक पुनर्जागरण’ के रूप में देख रहा है।
* घुसपैठ और डेमोग्राफी: सीमावर्ती इलाकों में बदलती डेमोग्राफी और घुसपैठ को संघ ने ‘हिंदू सुरक्षा’ के साथ जोड़ दिया है। यह संदेश साफ है—अगर आज नहीं जागे, तो भविष्य घातक होगा।
* आश्रमों का संगम: 38 से अधिक धार्मिक संगठन और स्थानीय आश्रम संघ के साथ कदमताल कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य हिंदू मतों का शत-प्रतिशत ध्रुवीकरण करना है।
5. ग्राउंड इंटेलिजेंस: हिंसा और धांधली पर नजर
केवल वोट मांगना ही संघ का काम नहीं है। स्वयंसेवक जमीन पर ‘इंटेलिजेंस यूनिट’ की तरह काम कर रहे हैं….
* वे संभावित हिंसा और बूथ कैप्चरिंग की सूचनाएं भाजपा के रणनीतिकारों तक पहुंचा रहे हैं।
* ‘नोटा’ (NOTA) के खिलाफ अभियान चलाकर संघ यह सुनिश्चित कर रहा है कि एक भी हिंदू वोट व्यर्थ न जाए।
क्या बदलेगा परिणाम?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि RSS का यह जमीनी गणित सटीक बैठता है, तो भाजपा के वोट प्रतिशत में 4 से 5% की सीधी वृद्धि हो सकती है। यह वह अंतर है जो बंगाल की सत्ता की कुर्सी को हिलाने के लिए पर्याप्त है।
ममता बनर्जी के ‘मा-माटी-मानुष’ के नारे के सामने संघ का ‘लोक मत परिष्कार’ और ‘राष्ट्रवाद’ का साइलेंट अभियान कितना कारगर होगा, इसका एग्जांपल 23 अप्रैल को हुए प्रथम चरण की मतदान में देखने को मिला।
बंगाल की राजनीति लंबे समय से हिंसा, ध्रुवीकरण और वैचारिक संघर्ष की प्रयोगशाला रही है। अब सवाल सिर्फ इतना है…
क्या संघ का यह साइलेंट ग्राउंड ऑपरेशन सच में बंगाल की सत्ता का खेल बदल देगा?
4 मई के नतीजे तय करेंगे कि यह रणनीति केवल संगठन विस्तार थी या सचमुच चुनावी इतिहास लिखने वाली चाल।