Bengal Election 2026 : पश्चिम बंगाल की राजनीतिक बिसात पर शह और मात का खेल अब उस मुकाम पर पहुँच गया है जहाँ नतीजों के औपचारिक ऐलान से पहले ही ‘सफेद झंडा’ लहराने लगा है। चुनावी पंडित और गलियारों में चर्चा गरम है कि 4 मई के आधिकारिक परिणाम तो महज एक औपचारिकता हैं, असली स्क्रिप्ट तो मतदाताओं ने पोलिंग बूथ पर ही लिख दी है।
कुर्सी से ‘मोहभंग’ या हार का पूर्वाभास?
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का ताजा बयान कि “मुझे कुर्सी की भूख नहीं है”, राजनीति के जानकारों को ईसप की उस कहानी की याद दिला रहा है जिसमें लोमड़ी छलांग लगाने के बाद कहती है— “अंगूर खट्टे हैं।” कल तक जो दीदी “पहली बाजी जीत चुके” होने का दम भर रही थीं, अचानक उनका लक्ष्य ‘दिल्ली फतह’ हो जाना, उनके भीतर के राजनीतिक लचीलेपन (या कहें तो मजबूरी) को दर्शाता है।
शायद हार की स्थिति में एक ‘सेफ एग्जिट’ का बहाना पहले ही तैयार कर लिया गया है.. ”ईवीएम में घोटाला हो गया! अब जन-आंदोलन से केंद्र को हिला देंगे।”
गुरु का ज्ञान और चेली का ‘लचीलापन’
ममता जी के राजनीतिक गुरु प्रणव मुखर्जी में गजब का लचीलापन था—इतना कि वह संघ मुख्यालय से होते हुए राष्ट्रपति भवन तक जा पहुँचे। अब चेली भी उसी राह पर है। कभी कहती हैं, “मोदी का चेहरा नहीं देखना”, तो कभी प्रधानमंत्री को प्रेम से कुर्ते और मिठाई भेजती हैं। यह “गालीबाज समर्थकों” और “कलम-कम्प्यूटर जीवी” बुद्धिजीवियों के लिए एक कड़ा सबक है कि राजनीति में कोई स्थायी दुश्मन नहीं होता। आज की गाली, कल की मिठाई बन सकती है।
नारी शक्ति: आतंक और ‘गजवा-ए-हिंद’ पर प्रहार
इस बार की सबसे बड़ी कहानी बंगाल की महिलाओं ने लिखी है। भारी सुरक्षा के बीच निडर होकर निकली इन महिलाओं ने उसी तरह ‘आतंक राज’ की संभावनाओं को ध्वस्त कर दिया है, जैसा बिहार चुनाव में हुआ था।
* नतीजा: यदि बंगाल से ‘ममता राज’ का अंत होता है, तो केंद्र के लिए घुसपैठ और जेहादी अभियानों से लड़ना बच्चों का खेल हो जाएगा।
* सुरक्षा: किशनगंज में सेना की छावनी की जरूरत अब केवल विचार नहीं, बल्कि केंद्र की प्राथमिकता बन गई है।
“सब दिन होत न एक समाना”
इस्लामपुर की सभा में ममता जी का यह कहना— “अगर तृणमूल बनी रहती है, तो हम फिर मिलेंगे”—किसी विदाई भाषण से कम नहीं लगता। बंगाल की हवाएं बता रही हैं कि जेहादी एजेंडे और घुसपैठ की राजनीति पर अब ‘राष्ट्रवाद’ का ताला लगने वाला है।
देखना दिलचस्प होगा कि 4 मई के बाद दीदी दिल्ली की ओर कूच करती हैं या अपने ‘लचीलेपन’ का कोई नया अध्याय लिखती हैं। फिलहाल तो बंगाल की महिलाएं देश को एक बड़े खतरे से उबारने के लिए साधुवाद की पात्र हैं।