Political Satire : मनगढंत चिंतन… रामम् शरणं गच्छामि

Bindash Bol

बिनोद सिंह गहरवार

Political Satire : वैसे तो चिंतानंदजी सदैव किसी न किसी चिंता से ग्रसित रहते हैं। नाम के अनुरूप चिंता करना उनका जन्म सिद्ध अधिकार है। इसलिए लोग लाख उपदेश दें , ” चिता जलाती मुर्दे को जिंदे चिंता जलाती है  ,” चिंतानंदजी पर इसका कोई असर नहीं पड़ता।

आज जब वे मेरे घर आए तो कुछ ज्यादा ही चिंतित थे। जलपान का समय था, इसलिए मैं उनके सामने प्लेट में गर्मागर्म पकोड़े रखकर कहा,” महात्मन आतिथ्य स्वीकार कीजिये। मुझे विश्वास है कि इसको खाने के बाद आप अयोध्या के राम की पैड़ी के पकोड़े भूल जाएंगे।” अयोध्या का नाम सुनते ही महात्मन भड़क गए।मुझे डपट कर बोले, ” तुम मुझे अयोध्या का याद दिलाकर मेरे क्रोध को भड़का रहे हो। कृपाकर मेरे सामने अयोध्या का नाम मत लो। “

मैनें कहा महत्मन अयोध्या के बारे तो कहा गया है कि चौदहों भुवन में अयोध्या जैसी कोई जगह ही नहीं है। यह ऐसी जगह है जहाँ रिद्धि – सिद्धि की नदियाँ अनवरत बहती रहतीं हैं ।”
“रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई।
उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई ॥”
“ये बात ठीक कि यहाँ सुकृत की बारिश होती रहती। रिद्धि – सिद्धि की नदियाँ बहती रहती हैं। पर ये नदियाँ इसलिए बहतीं हैं कि यहाँ के लोग खुशहाल हों, कड़ोरो राम भक्तों के चेहरे पर मुस्कान हो और संसार में अयोध्या की अपनी एक पहचान हो। रिद्धि-सिद्धि की नदियाँ इसलिए थोड़े बहती हैं कि कोई चपत शिरोमणि बन के अपनें चेलों को इनमें  चोरी-छुपे डुबकी लगाना का छूट दे?”

मैनें कहा महात्मन , ” इसमें क्या बुराई है ? ये बेचारे राम  नाम जपना, पराया माल अपना के सिद्धांत पर चलकर चढ़ावे में चढ़े पैसे और गहनों को अपना ही समझ रहें हैं। यही सोचकर ये लोग जब सारा भारत कुंभ में डुबकी लगा रहा था तो ये लोग चढ़ावे में डुबकी लगा रहे थे । “
इस पर चिंतानंदजी चेतावनी भरे लहजे में बोले, ” अच्छा तो अब आया है ऊंट पहाड़‌ के नीचे।रामजन्मभूमि को‌ चर कर रेगिस्तान बनाना चाहता हैं। चर लिया सो चर लिया। अब इसे हमलोग कांजी-हाउस में डाल कर हीं रहेंगे । “
मैने कहा, “महात्मन! भले हीं लोग चपत शिरोमणि को दोषी ठहराएं पर मैं उनकी निष्ठा पर कभी अंगुली नहीं कर सकता।नौकरी को लात मार तिजोरी पर घात करवाने वाला कभी दोषी हो ही नहीं सकता ।”

इसपर चिंतानंदजी आगबबूला होकर बोले, “दूध की पहरेदारी बिल्लियों पर छोड़ने वाले को दोषी नहीं तो क्या कहा जाएगा?  मैने कहा ,” महात्मन! आप भी क्या हाथ धोकर एक भले इनसान  के पीछे पड़ पर गए हैं ?  मैं तो कहूँगा आप मीडिया के बकवास में मत पड़िए। ये सब अफवाह है। और हां इस इन्सान पर तो  रामलला भी आरोप लगाएं तो मैं नहीं मानूँगा।”
“क्या बात करते हो? इसे तो सरयू में जल समाधि ले लेनी चाहिए।अगर ये जल समाधि नहीं लेगा तो बुलडोजर बाबा इसे नहीं छोड़ेंगे।वो दूध का दूध‌ और‌ पानी का पानी करके हीं छोड़ेंगे।”
मैने कहा, ” वो तो इसी ताक में रहते हैं कि कब उनको बुलडोजर चलाने को मिले। दूध, दूध रहे तब तो दूध का दूध और पानी का पानी कीजियेगा? इस दूध में तो इतना न पानी मिला हुआ है कि‌ बुलडोजर बाबा ही पानी – पानी हो जाएंगे।इंहा ना लगिहें राउर माया। “

“क्या मतलब”?
“मतलब साफ है। चढ़ावा चपत के साथ संघ है। संघे शक्ति कलियुगे। संघ के सामने एक संन्यासी की क्या विसात? इतना ही नहीं उसके साथ विश्व हिन्दू परिषद्  है। इसका मतलब उसके साथ पूरा विश्व है। फिर उसके पीछे छप्पन इंच के सीना का बल है। और फिर चढ़ावा चोरी के आरोपों में क्या दम है ?”
“तुम तो चपत लगाने वालों‌ की चापलूसी कर रहे हो। अब तो तुमपर भी शक हो रहा है।”
महात्मन ये सब कह ही रहे थे तभी उनकी नजर मेरे आई फोन पर पड़ी।वे आई फोन देखकर बोले, ” दौ कौड़ी के लेखक! अब समझ में आया कि तू चढ़ावा चोरों के सेनापति का स्तुतिगान क्यों कर रहे हो। लगता है ये आई फोन भी चढ़ावा चोरों ने  ……..”
इतना कह‌कर चिन्तानंदजी अचानक रूक गए। मैनें कहा, ” महात्मन एक बात मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं‌ उनका स्तुतिगान बिलकुल नहीं कर रहा हूँ। और यदि करूँ भी तो इसमें कोई बुराई नहीं “।
इसपर चिन्तानंदजी एकदम बिफर पड़े और बोले ” बुराई नहीं है ? क्यो? “
“बुराई इस लिए नहीं है क्यों कि अगर वो चढ़ावे की चपत नहीं कराते तो सायकिल वाले,झाड़ू वाले और हाथ वाले तजिया छोड़ आज रामम्‌ शरणं गच्छामि को अहमियत नहीं देते। जो लोग अभी तक रामलला से दूरी बनाए हुए थे वो‌ एकाएक रामभक्त नहीं बनते। जो लोग अभी तक राम को काल्पनिक बता रहे थे वो राम का कीर्तन नहीं करते। जो लोग राम मंदिर के विरोध में अदालतों वकिलों की फौज खड़ा करते थे वे आज रामजी के पक्ष में वकालत नहीं करते। मैं तो कहता हूँ चपत शिरोमणि ने जो भी जाने – अनजाने में किया वो रामहि‌त में किया। पापियों को राम के शरण में लाकर राम के अस्तित्व को स्वीकारने के लिए उनको मजबूर किया। इसलिए आज की तारीख में वो‌ राम के सबसे प्रिय भक्त है। उनके विरुद्ध एक शब्द भी बोलने वाला राम द्रोही है।  तुलसी बाबा स्वयं कहते हैं, “भगत विरोधी मम द्रोही कहावा “। आप चढ़ावा चपत महान राम भक्त के विरुद्ध बोल रहे हैं तो फिर समझ लीजिये कि आप मेरे लिए क्या हो सकते हैं “?शायद मेरी बात चिंतानंद जी महाराज को समझ में आ गई वह मेरे यहां से तुरंत अंतर्धान  हो गए।

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