Teejan Bai : पद्म विभूषण तीजन बाई नहीं रहीं: पंडवानी की अमर आवाज़ हुई खामोश, लेकिन उनकी गूंज सदियों तक रहेगी
Teejan Bai : छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को दुनिया के सबसे बड़े मंचों तक पहुंचाने वाली सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का रविवार तड़के निधन हो गया। वह 70 वर्ष की थीं। एम्स रायपुर के अनुसार उन्होंने सुबह करीब 3:15 बजे अंतिम सांस ली। पिछले कुछ समय से वह अस्वस्थ थीं और अस्पताल में उनका उपचार चल रहा था।
उनके निधन के साथ भारतीय लोक कला का एक ऐसा युग समाप्त हो गया जिसने महाभारत की कथाओं को सिर्फ सुनाया नहीं, बल्कि उन्हें अपनी आवाज़, अभिनय और अद्भुत अभिव्यक्ति से जीवंत कर दिया।
गांव की बेटी से विश्व मंच तक का सफर
छत्तीसगढ़ के भिलाई के निकट गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई का बचपन बेहद अभावों में बीता। उनका जन्म लोकपर्व तीज के दिन हुआ था, इसलिए उनका नाम ‘तीजन’ रखा गया।
मां के लोकगीत, पिता की बांसुरी और नाना के मुख से सुनी पंडवानी ने बचपन में ही उनके मन पर ऐसी छाप छोड़ी कि उन्होंने मात्र नौ साल की उम्र में अपने चचेरे नाना बृजलाल पारधी से पंडवानी सीखना शुरू कर दिया।
जब समाज ने ठुकराया, लेकिन कला नहीं छोड़ी
उस दौर में पंडवानी केवल पुरुषों की विधा मानी जाती थी। एक लड़की का मंच पर महाभारत गाना समाज को स्वीकार नहीं था।
तीजन बाई को विरोध झेलना पड़ा, सामाजिक बहिष्कार सहना पड़ा, यहां तक कि उन्हें घर से भी निकाल दिया गया। पंडवानी गाने की वजह से उनकी पहली शादी टूट गई और दूसरी शादी भी अधिक समय तक नहीं चल सकी।
लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उनका विश्वास था कि “पंडवानी ही मेरा बेड़ा पार लगाएगी।” यही विश्वास उन्हें गांव की चौपाल से लेकर दुनिया के प्रतिष्ठित मंचों तक ले गया।
13 साल की उम्र में पहला मंच, फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा
महज 13 वर्ष की आयु में उन्होंने चंदखुरी गांव में पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी। उनकी दमदार आवाज़, अभिनय और कथा कहने की शैली ने लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
इसके बाद भिलाई, रायपुर, भोपाल और फिर पूरे देश में उनकी पहचान बनने लगी।
हबीब तनवीर ने पहचानी प्रतिभा, इंदिरा गांधी भी हुईं प्रभावित
भोपाल के भारत भवन में प्रस्तुति के दौरान मशहूर रंगकर्मी हबीब तनवीर उनकी कला से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने प्रस्तुति का अवसर दिलाया। प्रस्तुति के बाद इंदिरा गांधी ने मुस्कुराते हुए कहा—
“आप बहुत अच्छा महाभारत करती हैं।” तीजन बाई ने तुरंत जवाब दिया…
“महाभारत नहीं करती हूं, महाभारत की कथा सुनाती हूं।”
यह जवाब आज भी उनकी सादगी और कला के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
कापालिक शैली की पहली महिला कलाकार
पंडवानी की दो प्रमुख शैलियां हैं… वेदमती और कापालिक।
वेदमती शैली में कलाकार बैठकर कथा कहते हैं, जबकि कापालिक शैली में मंच पर चलते हुए अभिनय और संवादों के साथ कथा प्रस्तुत की जाती है। तीजन बाई कापालिक शैली में पंडवानी प्रस्तुत करने वाली पहली महिला बनीं। उन्होंने अपनी ऊर्जावान प्रस्तुति से इस शैली को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
महाभारत को मंच पर जीती थीं तीजन बाई
उनकी प्रस्तुति केवल गायन नहीं होती थी। वह भीम का क्रोध, अर्जुन का संकल्प, द्रौपदी का अपमान, कृष्ण की नीति और युद्ध का रोमांच अपने अभिनय से दर्शकों के सामने जीवंत कर देती थीं। उनकी आवाज़ में गर्जना भी थी और करुणा भी।
‘भारत एक खोज’ से घर-घर तक पहुंची पहचान
मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल उनकी प्रतिभा से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने चर्चित धारावाहिक ‘भारत एक खोज’ में महाभारत प्रसंग के लिए उन्हें आमंत्रित किया। यहीं से उनकी कला देश के करोड़ों लोगों तक पहुंची।
सम्मानों से भरा शानदार सफर
भारतीय लोक संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मान मिले…
1988 – पद्मश्री
1995 – संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
2003 – पद्म भूषण
2018 – फुकुओका पुरस्कार (जापान)
2019 – पद्म विभूषण
वह पद्म विभूषण प्राप्त करने वाली छत्तीसगढ़ की पहली महिला कलाकार थीं। इसके अलावा बिलासपुर विश्वविद्यालय और पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डी.लिट्. की उपाधि भी प्रदान की।
संघर्षों से भरा निजी जीवन
तीजन बाई का जीवन केवल सफलता की कहानी नहीं था।
उन्होंने गरीबी देखी, सामाजिक तिरस्कार झेला, तीन जीवनसाथियों का साथ छूटा, दो बेटों और एक दत्तक पुत्री को खोया। फिर भी उन्होंने कभी पंडवानी का साथ नहीं छोड़ा।
वे कहा करती थीं… “मैंने पंडवानी को वैसे ही पकड़ रखा है, जैसे बंदर का बच्चा अपनी मां को पकड़ता है। पंडवानी ही मेरा बेड़ा पार लगाएगी।”
पंडवानी क्या है?
पंडवानी छत्तीसगढ़ की एक प्राचीन लोकगायन परंपरा है, जिसमें महाभारत की कथाओं को गायन, अभिनय और संवादों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। मुख्य कलाकार तंबूरा हाथ में लेकर पूरी कथा सुनाता है, जबकि साथी कलाकार हारमोनियम, तबला, मंजीरा, बैंजो और खंजड़ी जैसे वाद्ययंत्रों से संगत करते हैं। तीजन बाई ने इस लोक कला को गांव की चौपाल से उठाकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया।
एक युग का अंत, लेकिन विरासत अमर रहेगी
तीजन बाई का निधन केवल एक कलाकार की विदाई नहीं, बल्कि भारतीय लोक परंपरा के एक स्वर्णिम अध्याय का समापन है। उन्होंने साबित किया कि प्रतिभा न जाति देखती है, न गरीबी और न ही सामाजिक बंदिशें।
आज उनकी आवाज़ भले ही शांत हो गई हो, लेकिन महाभारत की हर कथा में, पंडवानी की हर प्रस्तुति में और भारतीय लोक संस्कृति के हर मंच पर तीजन बाई हमेशा जीवित रहेंगी।